बीती छह सितंबर की रात को कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने, उत्तर कश्मीर के सोपोर में तीन सेब व्यापारियों और उनमें से एक की पांच साल की बेटी को गंभीर रूप से घायल कर दिया.

श्रीनगर के एक अस्पताल में इलाज करा रहे इन सेब व्यापारियों ने बताया कि बंदूकधारियों ने उन पर गोली यह कहकर चलायी कि वे लोग सोपोर की फल मंडी में अपनी दुकानें खुली रख रहे थे.

11 सितंबर की सुबह इन सेब व्यापारियों के घरों से कुछ ही दूरी पर सुरक्षा बलों ने लश्कर-ए-तैयबा के एक मिलिटेंट को मार गिराया. सुरक्षा बलों का कहना है कि आसिफ नाम के इसी मिलिटेंट ने सेब व्यापरियों पर गोलियां चलायी थीं.

पुलिस के लिए भले ही यह केस बंद हो गया हो लेकिन कश्मीर के सेब व्यापारियों की परेशानियां खत्म होती बिलकुल दिखाई नहीं दे रही हैं.

अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद से एक के बाद एक कई ऐसे मसले हैं जिनसे कश्मीर के सेब व्यापारी जूझ रहे हैं. हालात इतने खराब हैं कि चीज़ें ऐसी ही चलती रहीं तो यह साल कश्मीर के व्यापारियों और किसानों के लिए हालिया समय का सबसे खराब साल साबित हो सकता है.

इससे पहले कि इन लोगों के सामने खड़ी मुश्किलों की बात की जाये, यह बताना ज़रूरी है कि कश्मीर का सेब व्यापार इसकी अर्थव्यवस्था के लिए क्या मायने रखता है.

कश्मीर के कृषि विभाग के आंकड़ों के हिसाब से यहां हर साल करीब 20 से 22 लाख मीट्रिक टन सेब की पैदावार होती है. इतने सेब के व्यापार में हर साल करीब 13 से 14 सौ करोड़ रुपये का लेन-देन होता है. यह जम्मू-कश्मीर की जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है.

कश्मीर में 35 लाख से ज़्यादा लोग इस व्यवसाय से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं और भारत की कुल सेब पैदावार का 80 प्रतिशत हिस्सा यहां उगता है. इसके चलते भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सेब उत्पादक देश है. जाहिर सी बात है कि अगर कश्मीर से सेब आना बंद हो गया तो देश में सेब की किल्लत हो जाएगी और उसकी कीमत बहुत बढ़ जाएगी. ऐसा पिछले कुछ दिनों से देखने को भी मिल रहा है.

तो तर्क यही कहता है कि हालात चाहे जैसे भी हों, इस उद्योग पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए. अतीत में होता भी यही रहा है. 2016 में जब, बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी छह महीने तक बंद थी, सेब व्यापरियों और किसानों ने तब भी अपना काम बिना किसी रोक-टोक के किया था.

लेकिन इस बार हालात अलग हैं. इस बार सेब किसानों और व्यापारियों पर जो सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है वह मिलिटेंट्स द्वारा उन्हें दी गयी धमकियां हैं. अगस्त के आखिरी दिनों से ही, जो सेब की फसल उतारने के शुरुआती दिन होते हैं, खबरें आने लगी थीं कि मिलिटेंट्स सेब किसानों को उनका काम करने से रोक रहे हैं.

‘मैंने भी ऐसी कई घटनाओं के बारे में सुना था लेकिन इस चीज़ की कहीं से पुष्टि नहीं हो रही थी, और अतीत में ऐसा कभी नहीं हुआ है तो हम सब इन बातों को अफवाहें मानकर चल रहे थे’ दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के एक सेब व्यापारी, ज़ाहिद अब्दुल्लाह सत्याग्रह को बताते हैं.

लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें साफ होती गयीं. हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा जैसे मिलिटेंट गुटों ने जगह-जगह पोस्टर लगाकर इन किसानों और व्यापारियों को उनका काम करने से मना किया.

फिर सोपोर में हुए हमले से चीज़ें और स्पष्ट हो गयीं. इसके बाद से ज़ाहिद जैसे हजारों सेब व्यापारी फल मंडियों से और किसान अपने बागानों से दूर रहने लगे हैं. जिन सेब व्यापारियों से सत्याग्रह ने बात की उनकी समझ में ही नहीं आ रहा है कि मिलिटेंट्स ऐसा क्यों कर रहे हैं.

‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. ये लोग जो कर रहे हैं, हमारी समझ से बाहर है और इससे हम सड़क पे आ जाएंगे’ दक्षिण कश्मीर के ही शोपियां जिले के एक किसान, गुलज़ार अहमद कहते हैं कि उनका एक छोटा सा बगीचा है जिससे मुश्किल से उन्हें साल के दो-तीन लाख रुपये मिलते हैं, ‘और लोगों का नहीं पता लेकिन अगर मैं अपने सेब उतार के नहीं बेच पाया तो मेरे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगी.’

जो लोग गुलजार की तरह अपने घर पर नहीं बैठे हुए हैं और धमकियों के बावजूद अपने बगीचों में जा रहे हैं उनके सामने और मसले हैं.

कश्मीर में पांच अगस्त से सारे फोन, इंटरनेट और अन्य संचार सेवाएं बंद कर दी गयी थीं. तब से लेकर अभी तक सिर्फ लैंडलाइन्स ही खोली गयीं हैं. संचार की बाकी सभी सेवाएं यहां अभी भी बंद हैं. कश्मीर के मुठ्ठी भर लैंड्लाइन फोन्स से कॉल करना या उन पर कॉल आने की मुश्किलों की एक अलग कहानी है.

यानी कि मुश्किल हालात की वजह से देश के अन्य भागों से सेब के व्यापारी यहां पर नहीं आ पा रहे और कश्मीर के सेब व्यापारी उनसे संपर्क भी नहीं कर पा रहे हैं.

‘अब मसला यह है कि भेजें सेब भेजें भी तो किसके पास? पहले होता यह था कि बाहर से व्यापारी आकर दाम तय कर लेते थे और फिर हम माल भेज देते थे. अब दाम कौन तय करेगा?’ शोपियां के ही सेब व्यापारी, शकूर अहमद सत्याग्रह को बताते हैं.

वे कहते हैं कि किसी व्यापारी से संपर्क नहीं है और बिना बताए माल भेज देंगे तो पता नहीं दाम औऱ पैसों का क्या होगा.

‘अब रास्ता यह है कि खुद बाहर चले जाओ. लेकिन ऐसी स्थिति में यहां का काम कौन संभालेगा. दूसरा घरवालों से कोई संपर्क नहीं रहेगा वो परेशानी अलग’ शकूर अहमद कहते हैं.

अब अगर कोई मिलिटेंट्स की धमकियां, फोन का न चलना जैसी चीजों से जूझकर अपना माल पैक कर भी ले, तो एक और चुनौती है.

इस वक़्त कश्मीर में कई छोटे मोटे अलगाववादी संगठनों ने ‘सिविल कर्फ्यू’ घोषित कर दिया है और किसी भी गाड़ी को सड़क पर न चलने की सलाह दी है. उनकी धमकियों को लोगों ने गंभीर रूप से लेना तब शुरू किया जब हाल ही में अनंतनाग जिले के बिजबेहरा इलाक़े में पत्थरबाज़ी से एक ट्रक ड्राईवर की मौत हो गयी.

उसके फौरन बाद सरकार ने ट्रक चालकों के शाम के छह बजे से 11 बजे तक हाइवे पर चलने पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन कुछ ट्रक चालकों से सत्याग्रह ने बात की तो पता चला कि उनको सुरक्षा बल 11 बजे के बाद भी नहीं चलने देते.

‘वे कहते हैं कि दिन में क्यूं नहीं चलते. ये लोग चाहते हैं कि हम दिन में चलें और चीज़ें सामान्य होती दिखाई दें. लेकिन अपनी जान के साथ कौन खिलवाड़ करे’ एक ट्रक चालक ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

तो कुल मिलाकर बात यह है कि मिलिटेंट्स की धमकियों से ध्यान हटाएं तो संचार बंद होने का मसला और उससे जूझ लें किसी प्रकार तो परिवहन की समस्या.

‘ऐसे में सेब पड़े-पड़े सड़ रहे हैं और हम कुछ भी नहीं कर पा रहे’ शोपियां के व्यापारी शकूर अहमद कहते हैं. लेकिन वे अपने नुकसान से ज़्यादा चिंतित उन लोगों के लिए हैं जो मंडियों और सेब के बागों में दिहाड़ी पर काम किया करते हैं.

वे कहते हैं कि हजारों लोग ऐसे हैं जो इस इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं, कुछ सेब पैक करने वाले, कुछ ट्रकों में माल भरने वाले, कुछ पेटियां बनाने वाले और कुछ ट्रक चलाने वाले.

‘ऐसे लोग रोज़ कमाते हैं और रोज़ अपने परिवारों को खिलाते हैं. अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारा तो चलो भारी नुकसान होगा लेकिन इन लोगों के जीने के लाले पड़ जाएंगे’ शकूर अहमद कहते हैं.

इन सब परेशानियों में घिरे इन लोगों के लिए सिर्फ एक उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है और वह है सरकार का यह ऐलान कि इस बार के सेब उत्पाद का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा सरकार ही अच्छे दामों पर खरीदेगी.

यह फसल नेशनल एग्रीकल्चरल कोआपरेटिव मार्केटिंग फ़ैडरेशन ऑफ इंडिया (नैफेड) खरीदेगी. इसका ऐलान हाल ही में श्रीनगर के डेप्युटी कमिश्नर (डीसी), शहीद चौधरी, ने ट्विटर पर किया था.

‘सेब के किसानों के लिए अच्छी खबर है. नैफेड अब तीनों ग्रेड के सेब बहुत अच्छे दामों पर खरीदेगा. कमाई बढ़ जाएगी और परिवहन का भी कोई मसला नहीं होगा’ चौधरी ने अपने टिवीटर हैंडल पर लिखा.

अब किसानों तक यह बात अभी पहुंच पायी है या नहीं और जमीनी सतह पर यह फैसला कितना कारगर रहेगा यह देखने वाली बात होगी. फिलहाल कश्मीर घाटी के करीब 35 लाख लोग अपना भारी नुकसान होता हुआ देख रहे हैं और ज्यादा कुछ कर नहीं पा रहे हैं.