गृहमंत्री अमित शाह द्वारा हिंदी दिवस के मौके पर देश की साझा भाषा के तौर पर हिंदी की वकालत ने तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में राजनीतिक रंग ले लिया है. इन दक्षिणी राज्योंं की कई सियासी पार्टियों ने अमित शाह के बयान को दूसरी भाषाओं पर हिंदी थोपने जैसा बताया है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनर्जी ने भी इशारों में अमित शाह के बयान पर सवाल उठाए हैं.

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कन्नड़ में ट्वीट कर कहा, ‘हिंदी के राष्ट्रभाषा होने का झूठ बंद किया जाना चाहिए. यह सभी को जानना होगा कि यह कन्नड के जैसी ही है. भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक.’ उन्होंने लिखा, ‘आप झूठ और गलत जानकारी फैलाकर एक भाषा का प्रचार नहीं कर सकते. भाषाएं एक दूसरे के प्रति स्नेह और सम्मान से समृद्ध होती हैं.’ कांग्रेस नेता ने कहा कि वह हिंदी के खिलाफ नहीं हैं लेकिन भाषा को थोपे जाने के प्रयास के खिलाफ हैं. जद(एस) नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने भी हिंदी दिवस पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जानना चाहा कि देश भर में ‘कन्नड दिवस’ कब मनाया जाएगा. उन्होंने ‘हिंदी थोपना बंद करो’ का हैशटैग भी चलाया.

तमिलनाडु में डीएमके नेता एमके स्टालिन ने भी ट्वीट कर गृह मंत्री अमित शाह के बयान का विरोध जताया. उन्होंने कहा, ‘हम हिंदी थोपे जाने का विरोध कर रहे हैं. आज अमित शाह द्वारा दिए गए बयान से हमें झटका लगा है. इससे देश की एकता पर फर्क पड़ेगा. हम मांग करते हैं कि वह अपने इस बयान को वापस लें.’ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हिंदी दिवस पर बधाई देते हुए कहा कि लोगों को सभी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए लेकिन अपनी मातृभाषा की कीमत पर नहीं.

गृहमंत्री अमित शाह ने हिंदी दिवस पर किये गए कई ट्वीट में कहा था कि भारत में कई भाषाएं हैं और प्रत्येक भाषा का अपना महत्व है, लेकिन यह आवश्यक है कि पूरे देश के लिए एक भाषा होनी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय तौर पर भारत की पहचान बने. अमित शाह ने कहा कि आज देश को यदि कोई भाषा एकजुट कर सकती है तो वह हिंदी है जो कि सबसे अधिक बोली जाती है. उनके इस ट्वीट के बाद ही गैर हिंदी भाषी राज्यों के कई नेताओं ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया जताई है.