सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये भारतीय रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती कर दी है. इस कटौती के बाद रेपो रेट 5.15 प्रतिशत रह गया है. यह लगातार पांचवां मौका है जब रेपो रेट में कटौती की गयी है. अगस्त में हुई पिछली बैठक में इसमें 0.35 की कटौती की गई थी. इस तरह इस साल अभी तक आरबीआइ ने रेपो रेट में कुल 1.35 फीसद की कमी कर दी है. वहीं, रिवर्स रेपो रेट घटकर 4.9 फीसद हो गया है. केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 6.9 से घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया है.

यानी देखा जाए तो रिजर्व बैंक ने आर्थिक वृद्धि की गति बढ़ाने के मद्देनजर मौद्रिक नीति में समायोजन बिठाने वाला नरम रुख बरकरार रखा है. रेपो रेट में इस कटौती के बाद बैंकों पर कर्ज और सस्ता करने का दबाव बढ़ गया है. माना जा रहा है कि इसके चलते आने वाले दिनों में होम, कार और पर्सनल लोन पर ब्याज दर कम हो सकती है. रिजर्व बैंक ने बैंकों से लोन को रेपो रेट से लिंक करने को भी कहा है. आरबीआई से बैंकों को अब तक रेपो रेट में 1.35 फीसदी का लाभ मिल चुका है लेकिन, बैंक इसका पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दे रहे हैं. मतलब, बैंकों को तो सस्ती दर पर रिजर्व बैंक से लोन मिल रहा है, लेकिन आम लोगों को इसका ज्यादा फायदा नहीं मिला है. रिजर्व बैंक ने यह भी उम्मीद जताई है कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सरकार ने हाल में जो प्रोत्साहन उपाय घोषित किए हैं उनसे निजी क्षेत्र में खपत बढ़ेगी और निजी निवेश बढ़ाने में मदद भी मिलेगी.

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या होता है?

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर आरबीआई अन्य बैंकों को कर्ज देता है. इसी कर्ज से बैंक ग्राहकों को ऋण की सुविधा मुहैया कराते हैं. अगर रेपो रेट कम होता है तो इसका मतलब है कि बैंक से मिलने वाले सभी प्रकार के कर्ज सस्ते हो जाएंगे. वहीं, बैंकों को आरबीआई में धन जमा कराने पर जिस दर से ब्याज मिलता है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं.