इन दिनों हमारे चंद्रयान के चंद्रमा पर न पहुंचने के कारण जो तकनीकी विफलता सामने आयी है वह ज़ेरे-बहस है. आम तौर पर विफलता की निंदा होती है या अवहेलना. पर इस बार अंतत: विफल हो जाने को कुछ परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है. लगभग पहुंच ही गये थे, सिर्फ़ आखि़र में कुछ गड़बड़ हो गयी! एक महत्वाकांक्षी अभियान था जो कुल मिलाकर सफल था बस अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका. अगर यही दृष्टि हम अपने आसपास हो रही अनेक विफलताओं को समझने में लगा सकें तो विफल होने का अर्थ व्यर्थ हो जाना बंद हो जायेगा जो ज़्यादातर होता रहता है.

सफल होने की भयानक और तेज़ होड़ है. उसमें सफल होने के लिए राजनीति, धर्म, मीडिया आदि दिनरात साधनों की या नैतिकता की परवाह किये बिना लगे रहते हैं. जैसे भी हो वैसे सफल होना एकमात्र लक्ष्य बन गया है. जो ऐसे सफल नहीं होता उसे हाशिये पर ढकेल दिया जाता है. ज़्यादातर एक बार विफल होने के बाद लोग फिर दृश्य से ओझल ही हो जाते हैं. पर ऐसे भी कम नहीं हैं जो फिर कोशिश करते हैं, फिर हिम्मत जुटाते हैं, अपनी भूलचूकों को दुरुस्त कर फिर होड़ लगाते हैं और सफल हो जाते हैं. एक बार सफल हुए कि आपकी पिछली विफलता भुला दी जाती है. जब सफल सो सदा सफल!

कुछ बेहद सफल लगते-दिखते-माने गये लोग अंतत: विफल भी होते हैं. मार्क्स और गांधी ऐसी ही विफलता की महान शबीहें हैं. मार्क्स की दृष्टि और विचार ने सारे संसार को गहरे प्रभावित किया, उनसे प्रेरित महान साहित्य और कलाएं सम्भव हुए. लेकिन जो शोषणहीन समतामूलक मुक्त समाज उनका असली लक्ष्य था वह संभव नहीं हुआ. उसके नाम पर नरसंहार, समता और मुक्ति का भीषण हनन हुआ. गांधी ने जिस भारत का सपना देखा था वह उनके अन्तरिम लक्ष्य देश की आज़ादी हासिल करने के बाद से ही भारत ने उसकी राजनीति, धर्म, सामाजिक आचरण ने तजना शुरू कर दिया था और अब हम गांधी से जितना अधिकतम दूर हो सकते थे केन्द्रीकरण, हिंसा-हत्या, घृणा, अभद्रता आदि के बढ़ते वर्चस्व में, झूठ की लगभग दिग्विजय में, उतना दूर हो गये हैं. कई अर्थों में गांधी-150 गांधी की विफलता का अनुष्ठान है.

साहित्य और कलाओं में ऐसे महान लोगों की क़तार है जो अपने समय में विफल माने गये. पर उनकी विफलता कभी उनकी सार्थकता और प्रासंगिकता को क्षत-विक्षत नहीं कर सकी. शायद सर्जनात्मकता ही वह एकमात्र क्षेत्र, अब तक बचा हुआ है, जहां विफल होकर भी सार्थक रहा जा सकता है. उसका एक कारण शायद यह भी है कि सर्जनात्मकता से परिसर में समय और समयातीत दोनों साथ रहते हैं और एक अधिक लंबा परिप्रेक्ष्य संभव हो पाता है.

लोकतंत्र और सत्याग्रह

एक ऐसे लोकतंत्र में जिसका नया आप्त वाक्य हो गया है ‘असत्यमेव जयते’, सत्याग्रह की बात करना सत्य की बढ़ती अल्पसंख्यकता का एहतराम करते हुए भी उसकी संघर्ष-शक्ति को जगह देना और उद्दीप्त करना है. आज सत्याग्रह अभी कोई सामाजिक आन्दोलन नहीं है हालांकि कई क्षेत्रों में जैसे पर्यावरण, शिक्षा आदि में जो छोटे-छोटे अक्सर स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध की और विकल्प की खोज की जो गतिविधियां हैं उन्हें सत्याग्रह के नये संस्करण कहा जा सकता है. महात्मा गांधी के समय में सत्याग्रह का अनिवार्य संबंध सविनय अवज्ञा, सिविल नाफ़रमानी और साध्य-साधन की एकता और शुद्धता से जोड़ा जाता है. हमारे समय में अवज्ञा, राज्य और सत्ता द्वारा पोषित तबकों द्वारा, बहुत बढ़ गयी है. विनय का तत्व उसमें सिरे से ग़ायब है. ऐसी क़ानून स्थापित संस्थाओं की संख्या बढ़ गयी और बढ़ती जाती है जो क़ानून का धड़ल्ले से दिनदहाड़े उल्लंघन करती हैं क्योंकि वे आश्वस्त हैं कि उनका बाल भी बांका नहीं होगा. ज्ञान, परम्परा, इतिहास, संस्कृति, धर्म आदि अनेक क्षेत्रों में झूठ तेज़ी से घुसपैठ कर चुके हैं और उन सबके बारे में झूठ को तकनालजी की मदद से, हेकड़ी-अकड़-अभद्रता, हिंसा और गालीगलौज का सहारा लेकर इस क़दर बढ़ाया जा रहा है कि वे सच लगने लगें. जनविवेक, जिस पर लोकतंत्र टिका होता है, इतना दूषित और दुर्बल पहले कभी नहीं रहा.

सत्याग्रह का एक और पहलू है निडरता. उसमें हर रोज़ कटौती हो रही है क्योंकि डर का राज, झूठ का सुराज लगातार अद्भुत गति से बढ़ और फैल रहे हैं. शायद बहुतों ने अपनी निडरता को एक आन्तरिक शक्ति बनाकर उसका सार्वजनिक उपयोग या इज़हार करना बंद कर दिया है. अगर यह एक समयानुकूल रणनीति है तो समझ में आती है पर यह आशंका बनी रहती है कि सब ओर निडरता, अहिंसा और अवज्ञा अगर भूमिस्थ ही बने रहेंगे तो उनसे कोई सामाजिक हित नहीं सध पायेगा. तब यह विडंबना होगी कि हम लोकतंत्र में डरे हुए होंगे लेकिन आत्मतंत्र में निडर!

भले उसमें आन्तरिकता बेहद ज़रूरी है, सत्याग्रह निरा अध्यात्म या आन्तरिक सक्रियता भर नहीं हो सकता. उसे सामाजिक रूप लेना ही चाहिये. न सुने जायें पर निडर लोगों को बोलने की हिम्मत करना चाहिये. ये सब बातें सूझीं छठवें क्रिएटिव थ्योरी कोलोक्वियम के दौरान जो इस बार ‘लोकतंत्र और सत्याग्रह’ पर व्यापक विचार-विमर्श पर एकाग्र था. अनेक पक्षों पर कई अकादेमिक विशेषज्ञों ने राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन आदि के सन्दर्भ में बहुत सार्थक प्रस्तुतियां दीं और उन पर प्रश्नोत्तर भी हुए. इन दिनों अकादेमिक दुनिया पर लगातार हमले हो रहे हैं. उसके बावजूद गांधी-दृष्टि पर इतना विशद और गहरा विचार सम्भव है इस बात ने विद्वत्ता की शक्ति, प्रतिबद्धता और ज्ञान-सम्पन्नता तथा उसमें संभव नवाचार के प्रति आश्वस्त किया. गांधी विचार और सर्जनात्मक कर्म में ज़िंदा है और यह उनका सार्थक उत्तर जीवन है.

नाम नहीं

सत्तर पार की आयु के गिरधर राठी उन कवियों में से हैं जिन्होंने असाधारण रूप से इस निहायत ऊजलूल मगर बेहद दिलक़श दुनिया में अपनी व्यर्थता का थोड़ा-बहुत अर्थ अपनी कविता से ही पाने की कोशिश की है. उनकी कविता अगर एक ओर आत्मान्वेषण है तो दूसरी ओर वह दुनिया की भयावहता और क्रूरता को भी दर्ज़ करती रही है. उसका अधिकांशतः शांत स्वर उसकी अचूक नैतिक हिस्सेदारी के भाव के साथ हमारे बेहद बड़बोले समय में थोड़ा अलग रहा हैं उन्होंने ‘जितना दिखा है/समझना उतना ही’ पर इसरार किया है क्योंकि कई गहरे अर्थों में वे एक निराकांक्षी कवि हैं. रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत उनकी सम्पूर्ण कविताएं एकत्र कर सम्भावना प्रकाशन ने उन्हें ‘नाम नहीं’ शीर्षक से प्रकाशित किया है. तीन सौ से भी कुछ कम पृष्ठ हैं. कुछ कविताएं-

चुप्पी

और भी बहुत कुछ है,

थोड़े में, लेकिन, यही

कि पहले डर था

और अब लालच है।

अटकल

सब कुछ

अन्त में ख़त्म होता है अटकलों में

तुम हवा के सहने का मक़सद नहीं जान सकते

न ही

अचानक उदास हो जाने का

कोई फूल हमेशा वही वही रंग क्यों ओढ़ता है?

खून

एकदम सफ़ेद क्यों नहीं हो जाता?

खून

एकदम सफ़ेद....

खून

जाना, फिर जाना

तब भी मिल जायेगा

कोई बहाना...

पृथिवी सँवारो

फिर मंगल तक जाना।