इजरायल के मतदाता आज अपना अगला प्रधानमंत्री चुनने के लिए मतदान कर रहे हैं. इस चुनाव में हर किसी की नजरें तीन बार से लगातार प्रधानमंत्री पद पर बने हुए बेंजामिन नेतन्याहू पर लगी हैं. चुनाव का नतीजा अगर उनके पक्ष में आता है तो वे रिकॉर्ड पांचवीं बार देश के मुखिया बनेंगे.

लेकिन, बेंजामिन नेतन्याहू के लिए इस बार मुश्किलें पहले से काफी अलग हैं. इजरायल के अटॉर्नी जनरल भ्रष्टाचार के तीन मामलों में पुलिस जांच के बाद उनके खिलाफ मुकदमा चलाए जाने की इजाजत दे चुके हैं, जिसकी कार्रवाई अगले महीने शुरू की जाएगी.

इसके अलावा इस चुनाव में उनकी ‘लिकुड पार्टी’ के सामने एक बड़ी चुनौती मुख्य विपक्षी नेता बेनी गांट्ज़ भी हैं. इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख जनरल बेनी गांट्ज़ बेहद ईमानदार और साफ़ छवि के नेता हैं. बीते दिसंबर में ही वे ‘इजरायल रेसिलिएंस’ नामक पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में उतरे हैं. शुरुआत में उनकी पार्टी को बड़ी चुनौती नहीं माना जा रहा था, लेकिन जब बीती फरवरी में बेनी गांट्ज़ ने तीन पूर्व जनरलों को अपनी पार्टी से जोड़ा और देश की दो अन्य प्रमुख पार्टियां तेलेम और येश अतिद के साथ मिलकर ‘ब्लू एंड वाइट’ गठबंधन बनाया तो वे मुख्य लड़ाई में आ गए.

बीते अप्रैल में भी इजरायल में आम चुनाव हुआ था जिसमें लिकुड पार्टी कुल 120 में से 36 सीटें जीतकर सबसे आगे रही थी. ‘ब्लू एंड वाइट’ गठबंधन को 35 सीटें मिलीं थीं. इसके बाद बेंजामिन नेतन्याहू गठबंधन बनाने में कामयाब रहे और प्रधानमंत्री निर्वाचित किए गए. लेकिन बीते मई में एक सैन्य विधेयक को लेकर पैदा हुए गतिरोध के कारण एक पार्टी ने उनके गठबंधन में रहने से इंकार कर दिया जिसके बाद संसद भंग कर दोबारा चुनाव कराने का फैसला किया गया.

आज होने वाले चुनाव से पूर्व सर्वेक्षणों में चुनाव को लेकर स्थितियां लगभग वैसी ही बताई जा रही हैं जैसी अप्रैल में हुए चुनाव में थीं. इन हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक मंगलवार को होने वाले चुनाव में लिकुड पार्टी को 33 और ‘ब्लू एंड वाइट’ गठबंधन को 32 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है. इजरायल की राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह स्थिति काफी बेहतर मानी जा रही है. जानकारों का कहना है कि अगर असल परिणाम ऐसे ही रहे तो नेतन्याहू गठबंधन की सरकार बनाने में कामयाब हो जाएंगे.

हालिया सर्वेक्षणों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह पूछा जा रहा है कि आखिर वह क्या वजह है जिसके चलते भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे होने और कुल चार बार सत्ता का सुख भोगने के बाद भी स्थितियां बेंजामिन नेतन्याहू के पक्ष में बनी हुई हैं.

इजरायल की चुनावी प्रक्रिया

हालिया सर्वेक्षणों में अगर बेंजामिन नेतन्याहू के फिर प्रधानमंत्री बनने की बात कही जा रही है तो उसकी एक बड़ी वजह इजरायल की चुनावी प्रक्रिया भी है. यहां चुनाव ‘अनुपातिक-मतदान योजना’ के तहत होता है. इसमें वोटर को बैलेट पेपर पर प्रत्याशियों की जगह पार्टी को चुनना पड़ता है. किसी भी पार्टी को वहां की संसद (नेसेट) में पहुंचने के लिए कुल मतदान में से न्यूनतम 3.25 फीसदी वोट पाना जरूरी है. अगर किसी पार्टी का वोट प्रतिशत 3.25 से कम रहता है तो उसे संसद की कोई सीट नहीं मिलती. पार्टियों को मिले मत प्रतिशत के अनुपात में उन्हें संसद की कुल 120 सीटों में से सीटें आवंटित कर दी जाती हैं.

इजरायल की बहुदलीय प्रणाली और इस चुनावी प्रक्रिया के चलते ही बीते 70 सालों में कोई भी पार्टी चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं पा सकी है. इजरायल के चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी जरूरी नहीं कि सरकार भी बना ले. फिर जो पार्टी चुनाव के बाद गठबंधन करने में कामयाब हो जाएगी, वही सरकार बना पाएगी.

जानकारों की मानें तो इसी के चलते नेतन्याहू के एक बार फिर सत्ता में आने की संभावना है. नेतन्याहू की सरकार को इजरायल की अब तक की सबसे दक्षिणपंथी सरकार माना जाता है. वहीं सारी दक्षिणपंथी पार्टियां चुनाव नतीजे आने के बाद उन्हें ही अपना समर्थन देती रही हैं. हमेशा की तरह इस बार भी चुनाव में दक्षिणपंथी विचारधारा की पार्टियों की संख्या ज्यादा है, इसलिए माना जा रहा है कि बेंजामिन नेतन्याहू इनके समर्थन से फिर सरकार बना लेंगे.

दक्षिणपंथ के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश

इजरायली राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों की मानें तो अपने खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा उठता देख, बेंजामिन नेतन्याहू को दक्षिणपंथ का सहारा दिखा. इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान चुनाव को राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथ और फिलस्तीन विरोध पर केंद्रित करने पर लगा दिया. नेतन्याहू ने देश की एक ऐसी कट्टरपंथी यहूदी पार्टी को अपने गठबंधन में शामिल कर लिया जिसके नेता माइकल बेन-अरी पर अमेरिका तक ने अपने यहां आने पर प्रतिबंध लगा रखा है. ‘ज्यूइश पावर’ नाम की इस पार्टी के नेताओं पर फिलस्तीनियों के खिलाफ हिंसा भड़काने के कई मामले दर्ज हैं. अमेरिका और पश्चिमी देशों में बेंजामिन नेतन्याहू के इस फैसले की काफी आलोचना भी हुई है.

कूटनीति का पूरा इस्तेमाल

बेंजामिन नेतन्याहू ने चुनाव में फायदे के लिए अपने कूटनीतिक संबंधों का भी भरपूर इस्तेमाल किया है. उन्होंने चुनाव से करीब साल भर पहले अमेरिका से यरूशलम को इजरायल की राजधानी का दर्जा दिलवा दिया. अमेरिका ने अपना दूतावास भी तेल अवीव से यरूशलम स्थानांतरित कर दिया. इसके बाद ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों ने भी यरूशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी.

इस बड़ी कूटनीतिक जीत के बाद बीते अप्रैल में हुए चुनाव से एक महीने पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री की मांग को मानते हुए ‘गोलान हाइट्स’ क्षेत्र को इजरायल के इलाक़े के रूप में मान्यता दे दी. बेंजामिन नेतन्याहू को अमेरिका के इस फैसले का चुनाव में बड़ा फायदा मिला. इजरायल ने साल 1967 में युद्ध के दौरान सीरिया से गोलान क्षेत्र को छीन लिया था और साल 1981 में आधिकारिक तौर पर इस क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था. लेकिन, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इजरायल के इस कब्जे को अभी तक मान्यता नहीं दी है.

आज होने वाले चुनाव से कुछ पहले ही बेंजामिन नेतन्याहू ने फिर इसी तरह का दांव खेला है. उन्होंने बीते मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान साफ कहा कि अगर वे दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वेस्ट बैंक में इजराइली बस्तियां बसा देंगे. उनका कहना था, ‘अगर हम दोबारा सत्ता में आते हैं, तो इजरायल के संप्रुभ क्षेत्र में विस्तार होगा. इजराइल के विस्तार को जॉर्डन घाटी और नॉर्थ डेड समुद्र तक लेकर जाएंगे. अभी वहां पर जो यहूदी रह रहे हैं, उन्हें ज्यादा सुविधाएं दी जाएंगी.’ इसके अलावा इजराइली प्रधानमंत्री ने एक और बड़ा दावा किया. उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस मसले पर उनके साथ खड़े हैं. डोनाल्ड ट्रंप वैसे भी खुद को इतिहास में इजरायल का सबसे बड़ा समर्थक अमेरिकी राष्ट्रपति बताते हैं.

इजरायल और फिलीस्तीन के बीच दशकों से विवाद चल रहा है. वेस्ट बैंक की बात करें तो इजरायल की ओर से यहां पर लाखों यहूदियों को बसाया जा चुका है. लेकिन इसी हिस्से में 20 लाख से ज्यादा फिलीस्तीनी लोग भी रहते हैं. वेस्ट बैंक, पूर्वी यरूशलम और गाजा पट्टी पर फिलीस्तीन अपना दावा करता है. बेंजामिन नेतन्याहू यहां अब चार लाख यहूदियों की बस्ती का विस्तार कर इन क्षेत्रों को अपने अधिकार में लेना चाहते हैं.

जानकारों की मानें तो इस मसले पर बेंजामिन नेतन्याहू का नया बयान चुनाव में उन्हें बड़ा फायदा दिलवा सकता है. बीते रविवार को दिए एक साक्षात्कार में बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल की जनता को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘किसमें इतनी क्षमता है जो अमेरिका के दबाव के आगे खड़ा रहे. मैंने बिल क्लिंटन और बराक ओबामा के समय दबाव का समना किया....यह ऐतिहासिक मौका है, मैं इतिहास की दिशा मोड़ रहा हूं. हम पीछे हटने और दूसरों के आगे झुकने के बजाय मान्यता और अधिकार लेने जा रहे हैं...मैंने यरुशलम को राजधानी घोषित करवाया, गोलान क्षेत्र को आधिकारिक मान्यता दिलवाई और अब मैं जॉर्डन घाटी को इजरायली क्षेत्र के रूप में मान्यता दिलवाने के लिए कूटनीतिक प्रयास शुरू कर रहा हूं...और ये सब, मैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मिलकर करना चाहता हूं.’