झारखंड में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इन चुनावों में अब दो-तीन महीने का ही वक्त बचा है. 2014 में यहां रघुबर दास के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी. झारखंड के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि प्रदेश के लोगों में भाजपा के प्रति गुस्सा हो या न हो लेकिन रघुबर दास की सरकार के खिलाफ गुस्सा है. लेकिन इसके बावजूद प्रदेश की विपक्षी पार्टियां विधानसभा चुनावों में इसका लाभ लेने की स्थिति में नहीं दिख रही हैं.

12 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड की राजधानी से कुछ प्रमुख योजनाओं की शुरुआत की. इस मौके पर उन्होंने रांची में एक जनसभा भी की. इस जनसभा को झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है. अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ केंद्र सरकार की कामयाबियों का जिक्र किया बल्कि झारखंड की राज्य सरकार के कामकाज की भी सराहना की.

लेकिन झारखंड सरकार के पिछले पांच सालों के कामकाज की जमीनी स्थिति उतनी ठीक नहीं बतायी जाती है. जब रघुबर दास को 2014 में मुख्यमंत्री बनाया गया था तो उस वक्त भी पार्टी के अंदर से ही उन्हें यह जिम्मेदारी दिए जाने पर विरोध के स्वर उठे थे. अब उन्हें पांच साल मुख्यमंत्री के रूप में देखने के बाद भाजपा से सहानुभूति रखने वाले कई लोगों का भी कहना है कि रघुबर दास उतने सक्षम मुख्यमंत्री साबित नहीं हुए जितने होने चाहिए थे. उनकी सरकार से झारखंड के लोगों की मुख्य शिकायत यह है कि बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर जैसा दूसरे राज्यों की सरकारें कर रही हैं, उस तरह का काम रघुबर सरकार ने पिछले पांच सालों में नहीं किया. लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली जैसे मोर्चे पर इस सरकार को नाकाम मान रहे हैं.

झारखंड के पलामू जिले के निवासी सत्येंद्र सिंह इस बारे में कहते हैं, ‘जब बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना था तो उस वक्त कहा गया था कि यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है और इसके विकास के लिए अलग राज्य बनाया जा रहा है. लेकिन आज स्थिति यह है कि बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर बिहार की स्थिति झारखंड से बेहतर होती जा रही है. सड़कों के मामले में भी बिहार झारखंड से बेहतर दिख रहा है. झारखंड में इससे पहले अस्थिर सरकार रही थी. इसलिए लगता था कि विकास नहीं हो रहा है. रघुबर दास को स्थिर सरकार चलाने का अवसर मिला लेकिन इसके बावजूद उन्होंने प्रदेश का विकास नहीं किया.’

पिछले पांच साल में कुछ अवसर ऐसे भी आए जब प्रदेश भाजपा के नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व से प्रदेश में सरकार का नेतृत्व बदलने की मांग की. कम से कम दो मौके ऐसे आए जब लगा कि झारखंड में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है. इस संबंध में झारखंड के प्रमुख भाजपा नेताओं से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मंत्रणा भी की. लेकिन इसके बावजूद रघुबर दास मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे.

जाहिर है कि अगर किसी चुनावी राज्य में ऐसी स्थिति हो तो इसका फायदा विपक्ष को मिलना चाहिए. लेकिन झारखंड में वह स्थिति बनती हुई नहीं दिख रही है. झारखंड की मुख्य विपक्षी पा​र्टी है झारखंड मुक्ति मोर्चा. इसके अलावा कांग्रेस और बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा भी विपक्ष में हैं. लोकसभा चुनावों में ये तीनों पार्टियां एक साथ चुनाव लड़ी थीं. इनके साथ राष्ट्रीय जनता दल को भी होना था लेकिन आखिरी वक्त पर सीटों के बंटवारे को लेकर बात नहीं बन सकी. लेकिन तीनों पार्टियों के एक होकर लड़ने के बावजूद लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ी कामयाबी मिली. प्रदेश की 14 लोकसभा सीटों में से इस गठबंधन को सिर्फ दो सीटें ही मिलीं.

झारखंड की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में वोट नरेंद्र मोदी के नाम पर डाले गए इसलिए इस गठबंधन को खास सफलता नहीं मिली लेकिन विधानसभा चुनावों में अगर विपक्ष एकजुट रहे तो स्थितियां अलग हो सकती हैं. लेकिन चुनाव नजदीक होने के बावजूद न सिर्फ इस गठबंधन में दरार पड़ती दिख रही है बल्कि कांग्रेस में भी आंतरिक कलह खुलकर सामने आ रही है. इस वजह से यह माना जा रहा है कि रघुबर दास सरकार की अलोकप्रियता का फायदा उठाने का अवसर विपक्ष गंवा रहा है.

लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद उस वक्त झारखंड प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे अजय कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. वे अब कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी में शामिल हो चुके हैं. भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे अजय कुमार की जगह कांग्रेस ने इसी सेवा के अधिकारी रहे रामेश्वर उरांव को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. झारखंड कांग्रेस में किस तरह की आंतरिक खींचतान चल रही है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी को इतने छोटे राज्य में भी पांच कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति करनी पड़ी है. प्रदेश की यह नई टीम बनाते वक्त यह ध्यान में रखा गया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक वर्ग और सामान्य वर्ग का उसमें प्रतिनिधित्व दिखे.

झारखंड में विपक्ष की इस स्थिति के बारे में प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्याग्रह से कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सबसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ी थी. उस वक्त बात यह हुई थी कि विधानसभा चुनावों में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर जेएमएम को मिलेगा. प्रदेश स्तर पर कांग्रेस का नेतृत्व परिवर्तन होने के बाद सीटों के बंटवारे को लेकर क्या स्थिति रहेगी, कहा नहीं जा सकता. स्थिति जटिल इसलिए भी है क्योंकि झारखंड कांग्रेस के कुछ नेता जरा सी वजह मिलते ही पार्टी छोड़कर भाजपा का रुख कर सकते हैं.’

विपक्ष की दूसरी चुनौतियों का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में आरजेडी अलग हो गई थी. विधानसभा चुनावों में अगर विपक्ष को अच्छा प्रदर्शन करना है तो आरजेडी को भी अपने खेमे में लाना चाहिए. कुछ सीटों पर वामपंथी पार्टियां नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं. उन सीटों पर उनके साथ समझौता होना चाहिए. लेकिन इन पार्टियों से बातचीत की पहल नहीं की जा रही है. जबकि समय काफी कम बचा है. विपक्ष की एक चुनौ​ती बिहार की सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड भी है. कुछ सीटों पर उसका प्रभाव है. जेडीयू ने घोषणा कर दी है कि वो झारखंड विधानसभा चुनावों में अकेले उतरेगी. जेडीयू के साथ अगर औपचारिक गठबंधन नहीं भी हो तो रणनीतिक तालमेल की कोशिश विपक्ष की ओर से होनी चाहिए. इन सभी कोशिशों के लिए कांग्रेस और जेएमएम को खुद अपने स्तर पर पहल करनी होगी लेकिन दोनों में से कोई पार्टी ऐसा करते हुए नहीं दिख रही है. जाहिर है कि अगर विपक्ष एकजुट नहीं होता है तो इसका लाभ सत्ता पक्ष को चुनावों में मिलेगा.’