ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन जितने महत्वाकांक्षी हैं, उतने ही अधीर और अड़ियल भी. महत्वाकांक्षी इतने कि मान बैठे थे कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से तलाक़ दिलाने का जो काम उनकी पूर्ववर्ती टेरेसा मे तीन साल में नहीं कर पायीं, उसे वे चुटकी बजाते हुए तीन महीनों में ही निपटा देंगे. अधीर इतने कि गत 24 जुलाई को ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनते ही कहने लगे, ‘मैं क़ब्र में जाना पसंद करूंगा, पर ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ के मुख्यालय) से यह नहीं कहूंगा कि हमें कुछ और समय चाहिये.’ और अड़ियल इतने कि रट लगाए हुए हैं कि तलाक़ के व्यवस्थित (सॉफ्ट) या अव्यवस्थित (हार्ड) स्वरूप के बारे में यूरोपीय संघ के साथ कोई सहमति हो या न हो, 31 अक्टूबर 2019 ही उसकी अंतिम तारीख़ रहेगी.

बोरिस जॉन्सन की ज़िद और रूखेपन से त्रस्त होकर उनके अपने ही भाई जो जॉन्सन सहित कई मंत्रियों और सांसदों ने उनका साथ छोड़ दिया. 21 सांसदों को खोकर संसद में अपनी पार्टी का बहुमत खोना उन्हें पसंद था लेकिन अपनी ज़िद से टस से मस होना स्वीकार नहीं था. अपने मन की मनवाने के लिए उन्होंने जो भी चालें चलीं, वे उलटी पड़ीं और अपने झांसों में वे खुद ही फंसते चले गये. दुनिया उनकी और उनके ‘बर्तानिया महान’ (ग्रेट ब्रिटेन) की आज चटखारे ले-लेकर खिल्लियां उड़ा रही है.

बोरिस जॉन्सन अब तक अपनी एक ही मनमानी कर पाये हैं - संसदीय बैठक की पांच हफ़्तों के लिए ‘ज़बर्दस्ती छुट्टी.’ हालांकि इसे भी कई अदालती चुनौतियां दी गयी हैं. 75 सांसदों की शिकायत पर स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरॉ के न्यायालय ने 11 सितंबर के अपने फ़ैसले में इस बलात अवकाश को ‘अवैध’ और ‘संसद को बाधित करने वाला’ बताया. लंदन में ब्रिटेन का सर्वोच्च न्यायालय भी इस पर 17 सितंबर को अपना फ़ैसला सुनाने वाला है.

इस बलात अवकाश से पहले, सोमवार नौ सितंबर को, संसद की अंतिम बैठक हुई. जॉन्सन की अपनी ही पार्टी के 21 विद्रोही सांसदों के विपक्ष के साथ मिल जाने से संसद में विपक्ष का बहुमत हो गया था. इससे नये संसदीय चुनाव करवाने के बोरिस जॉन्सन के कुटिल प्रयास एक बार फिर से विफल हो गये. बैठक में तय हुआ कि प्रधानमंत्री महोदय, 19 अक्टूबर तक, यूरोपीय संघ के साथ या तो किसी नयी सहमति (नये डील) पर पहुंचें या फिर अगले सत्र में संसद को विश्वास दिलायें कि बिना इसके ही यूरोपीय संघ से तलाक़ अपरिहार्य क्यों है. यानी कि बोरिस जॉनसन भी उसी मुद्दे पर विफल होते दिख रहे हैं, जिस मुद्दे पर उनसे पहले टेरेसा मे भी दांत पीस कर रह गयी थीं.

उत्तरी आयरलैंड अब भी गतिरोधक रोड़ा

ब्रिटेन का एक समुद्रपारीय पड़ोसी देश है आयरलैंड गणराज्य. दोनों के बीच 30 से 490 किलोमीटर चौड़ा अयरिश सागर है. स्वतंत्र देश आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन का उत्तरी आयरलैंड प्रदेश एक-दूसरे से सटे हुए एक ही आयरिश द्वीप पर स्थित हैं. इस समय दोनों देश, यानी ब्रिटेन और आयरलैंड गणराज्य, यूरोपीय संघ के सदस्य हैं. इसलिए संघ के नियमों के अनुसार आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड प्रदेश के बीच की साझी सीमा हर प्रकार के बेरोकटोक आवागमन के लिए खुली हुई है. लेकिन जब ब्रिटेन यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं रह जायेगा, तब क्या हो, यही यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच किसी नयी सहमति का वह गतिरोधक रोड़ा है, जो हट नहीं पा रहा है.

नियमानुसार होना तो यह चाहिये कि यूरोपीय संघ की ब्रिटिश सदस्यता का अंत होते ही आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड के बीच की सीमा पर पासपोर्ट, वीसा और सीमाशुल्क (कस्टम ड्यूटी) वाले वे सारे नियम लागू हो जायें, जो दो स्वतंत्र देशों के बीच हुआ करते हैं. किंतु यूरोपीय संघ और आयरलैंड गणराज्य यह नहीं चाहते. उन्हें डर है कि तब ब्रिटिश उत्तरी आयरलैंड के वे निवासी जो आयरलैंड गणराज्य से जुड़े रहना चाहते हैं, उससे कट जायेंगे. उत्तरी आयरलैंड के रोमन कैथलिक (41 प्रतिशत) आयरिश गणराज्य के साथ विलय चाहते रहे हैं, जबकि वहां के प्रोटेस्टैंट (19 प्रतिशत) व अन्य अल्पसंख्यक ब्रिटेन का अंग बने रहना चाहते हैं.

दूसरी ओर ब्रिटेन को डर है कि इस सीमा को ब्रेग्ज़िट के बाद भी खुला रखने (इस व्यवस्था को ‘बैकस्टॉप’ का नाम दिया गया है) का अर्थ होगा उत्तरी आयरलैंड के प्रश्न पर अपनी प्रभुसत्ता के साथ सौदेबाज़ी करना. इससे उत्तरी आयरलैंड उसके बजाय आयरलैंड गणराज्य के ज्यादा करीब हो जाएगा. इसे ब्रिटेन कतई स्वीकार नहीं कर सकता. बोरिस जॉन्सन और उनके समर्थक यह भी कहते फिरते हैं कि आयरिश सीमा को खुली रखने के बहाने से, यूरोपीय संघ ब्रिटेन के विदेश-व्यापार पर अपनी पकड़ बनाये रखना चाहता है.

सांसदों को नौ सितंबर वाले जिस दिन पांच सप्ताह की छुट्टी देदी गयी, उसी दिन बोरिस जॉन्सन आयरलैंड गणराज्य के प्रधानमंत्री, अर्धभारतवंशी लेओ वरादकर से मिलने डब्लिन पहुंचे. वरादकर ने उनसे दो टूक कहा, ‘बैकस्टॉप के बिना हम कोई डील नहीं कर सकते.’ उन्होंने जॉन्सन से यह भी कहा कि वे यूरोपीय संघ के विरोधियों के इस भुलावे में न रहें कि ब्रिटेन यदि 31 अक्टूबर या 31 जनवरी को यूरोपीय संघ से बाहर हो गया, तो ब्रेग्ज़िट से जुड़ा सारा किस्सा ख़त्म हो जायेगा.

वरादकर का कहना था कि तलाक़ हो या न हो, वह आपसी सहमति से हो या असहमति से हो, दोनों पक्षों को बातचीत करते रहना पड़ेगा. वरादकर ने इस बारे में कोई संदेह नहीं छोड़ा कि वे अपने देश आयरलैंड और उससे सटे ब्रिटिश उत्तरी आयरलैंड की सीमा को किसी भी हालत में बंद होते नहीं देखना चाहते.

यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि भारत की तरह आयरलैंड गणराज्य भी 120 वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहने के बाद छह दिसंबर 1922 को स्वतंत्र हुआ था. उसकी जनसंख्या इस समय क़रीब 50 लाख है. स्वतंत्र देश आयरिश गणराज्य और 19 लाख की जनसंख्या वाले ब्रिटिश प्रदेश उत्तरी आयरलैंड का 1921 में हुआ बंटवारा कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसा भारत- पाकिस्तान और कश्मीर का बंटा होना है. उत्तरी आयरलैंड को कश्मीर जैसा मान सकते हैं.

दोनों बड़े समुदायों के बीच 1960 से 1990 वाले दशक तक खूब सिर-फुटौवल हुई है. इसमें सवा तीन हज़ार लोग मरे हैं. 50 हज़ार से अधिक घायल हुए हैं. क़रीब 37 हज़ार बार गोलियां चली हैं. 16 हज़ार बम-धमाके हुए हैं. ब्रिटिश पुलिस और सेना पर वहां उसी तरह के दमन और अत्याचारों के आरोप लगे हैं, जैसे ब्रिटिश व अन्य पश्चिमी मीडिया, कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों पर लगाते रहे हैं. वही ब्रिटेन, जिसने उत्तरी आयरलैंड को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं दिया, भारत को कश्मीर में इसी अधिकार के आदर का उपदेश दिया करता है. अब डर यह है कि सीमाएं बद होने पर उत्तरी आयरलैंड में पहले जैसी स्थिति फिर न हो जाए. इसके कुछ संकेत अभी से देखने को मिलने लगे हैं.

जुलाई के अंत में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ब्रिटिश संसद में बोरिस जॉन्सन की जो छीछालेदर हुई है, उससे प्रेक्षक यही अनुमान लगाते हैं कि वे, 19 अक्टूबर से पहले, उत्तरी आयरलैंड की सीमा के नियमन (बैकस्टॉप) की गुत्थी सुलझाने के बारे में कोई चमत्कार नहीं कर पायेंगे. बोरिस जॉन्सन अपने आप को जितना तेज़-तर्रार और चतुर समझते हैं, उनकी समस्याएं उससे कहीं तेज़ी से बढ़ रही हैं और जटिल होती जा रही हैं. ऐसे में सबसे प्रबल संभावना यही दिखती है कि यूरोपीय संघ से तलाक लेने की तारीख़ 31 अक्टूबर, आगामी जनवरी तक के लिए, या यह भी हो सकता है कि हमेशा के लिए टाल दी जाये.

बोरिस जॉन्सन चाहते थे कि 31 अक्टूबर तक यूरोपीय संघ के साथ यदि कोई नयी सहमति नहीं बन पाती है, तो संसद या तो उन्हें बिना किसी समझौते के ही एकपक्षीय ढंग से यूरोपीय संघ से बाहर हो जाने का अधिकार दे दे, या 19 अक्टूबर से पहले नये संसदीय चुनाव करवाने के लिए हरी झंडी दिखा दे. संसद ने उनकी दोनों मांगे ठुकरा दीं. इससे जो नयी स्थिति पैदा हुई हैं, उसे देखते हुए वे ये चार विकल्प आजमाने की कोशिश कर सकते हैं:

पहला विकल्प

संसद की बैठक जब तक नहीं हो रही है, वे अपने क़ानूनी और राजनैतिक सलाहकारों की सहायता से ब्रिटेन के अलिखित संविधान में कोई ऐसा अनुच्छेद या यूरोपीय संघ की संधियों में कोई ऐसी कमी खोज निकालें, जिससे यूरोपीय संघ के साथ किसी समझौते के बिना ही उससे बाहर निकलने का रास्ता मिल जाये. समस्या यह है कि तब वे सांसद, जो बिना समझौते के बाहर निकलने के विरोधी हैं, बोरिस जॉन्सन को अदालत में घसीट सकते हैं. अदालत ने यदि यह पाया कि वे तिकड़में भिड़ा रहे और देश को झांसा दे रहे हैं, तो उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. तब वे यही कह कर संतोष कर सकते हैं कि मैं क़ानून के हाथों शहीद हो गया.

दूसरा विकल्प

बोरिस जॉन्सन यदि यह सोचते हैं कि वे अपने वचन के बहुत पक्के हैं पर 31 अक्टूबर तक अपना वादा पूरा नहीं कर पायेंगे, तो उससे पहले ही त्यागपत्र देकर कुर्सी ख़ाली कर सकते हैं. तब प्रश्न यह होगा कि नया प्रधानमंत्री कौन बन सकता है. उनकी अपनी ही मनमानी से उनकी टोरी पार्टी संसद में सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी अल्पमत में आ गई है. ऐसे में संभावना इसी बात की अधिक होगी कि दो-तीन विपक्षी पार्टियां मिलकर एक नयी सरकार बनायें और उन्हीं के बीच से कोई प्रधानमंत्री भी बनेगा.

तीसरा विकल्प

जॉन्सन यह भी कर सकते हैं कि वे संसद में किसी तरह दो-तिहाई बहुमत जुटा कर नये चुनावों की घोषणा कर दें. नये चुनावों को जनता के सामने ब्रेग्ज़िट के लिए एक नये जनमतसंग्रह के तौर पर पेश करें. चुनाव होने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहें. चुनाव जीत जाने पर इसे ब्रेग्ज़िट साकार करने का नया जनादेश बताते हुए यूरोपीय संघ के साथ कुछ ले-देकर तलाक़ की सहमति प्राप्त कर लें. चुनाव हार जाने पर निश्चित है कि ब्रिटेन अनिश्चित काल तक के लिए यूरोपीय संघ का सदस्य बना रहेगा. बोरिस जॉन्सन को तब ब्रिटेन के सबसे अल्पकालिक प्रधानमंत्री के तौर पर याद किया जायेगा.

चौथा विकल्प

यूरोपीय संघ में नियम है कि संघ में किसी नये देश के आगमन या किसी सदस्य देश के निर्गमन जैसे बड़े निर्णय सभी सदस्य देशों की सर्वसम्मति से होने चाहिये. दूसरे शब्दों में, हर देश के पास ऐसे किसी निर्णय को रोकने का वीटो-अधिकार है. बोरिस जॉन्सन यह कर सकते हैं कि वे यूरोपीय संघ के शेष 27 सदस्यों में से किसी एक देश को पटा लें. वह ब्रिटेन का पक्ष लेते हुए संघ के अक्टूबर में होने वाले शिखर सम्मेलन में अपने वीटो अधिकार का प्रयोग करेगा. तब ब्रिटेन अपने बहिर्गमन के लिए उत्तरी आयरलैंड संबंधी ‘बैकस्टाप’ वाले बंधन से मुक्त हो सकता है. कहा जाता है कि यूरोपीय संघ से काफ़ी नाराज़ दिखने वाले हंगरी के प्रधानमंत्री विक्तोर ओर्बान इस काम के लिए सही व्यक्ति हो सकते हैं. हालांकि उन्होंने ब्रिटेन के प्रति ऐसी कोई सहानुभूति अभी तक नहीं दिखायी है.

यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रसेल्स में स्थित यूरोपीय संसद में 12 सितंबर को एक बहुदलीय प्रस्ताव पेश किया गया. सितंबर के तीसरे सप्ताह में उस पर मतदान होगा. प्रस्ताव में कहा गया है कि यूरोपीय संसद की भी सहमति के बिना ब्रेग्ज़िट संभव नहीं है. यूरोपीय सासंद ब्रिटेन के बहिर्गमन की अनुमति तभी देंगे, जब अन्य यूरोपीय देशों के वहां रहने वाले नागरिकों के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित किया जायेगा. प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि ब्रेग्ज़िट समझौते में आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड के बीच की सीमा को खुला रखने का तथाकथित ‘बैकसटॉप’ प्रवधान भी शामिल होना चाहिये.

भयावह परिदृश्य का पूर्वानुमान

12 सितंबर को ही ब्रिटिश सरकार का एक ऐसा आकलन मीडिया में लीक हो गया, जिसमें उस भयावह परिदृश्य का पूर्वानुमान लगाया गया है, जो यूरोपीय संघ के साथ बिना किसी समझौते के अलग होने पर ब्रिटेन में पैदा हो सकता है. स्वयं ब्रिटिश सरकार का अनुमान है कि तब ताज़े खाद्यपदार्थों और दवाओं की भारी कमी पड़ सकती है. इससे जनता में भारी असंतोष फैल सकता है.

इसके अलावा तब बंदरगाहों में जहाज़ों की लंबीं क़तारें लग सकती हैं, क्योंकि हर जहाज़ की सीमाशुल्क आदि के लिए जांच करनी पड़ेगी. इंग्लिश चैनल पार कर यूरापीय देशों से आने वाले ट्रकों को दो-तीन दिनों तक लाइन में खड़े रहना पड़ सकता है. यह भी हो सकता है कि लोग घबराहट में अंधाधुंध ख़रीददारी और जमाख़ोरी करने लगें. यूरोपीय संघ की सदस्यता त्यागने के समर्थकों और विरोधियों के बीच दंगे भी हो सकते हैं और देश में अराजकता फैल सकती है. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन और पुलिस तथा सुरक्षा विभागों के बीच संचार-संपर्क में भी बाधा पड़ सकती है.

दो अगस्त को लिखे गये और अब जाकर सामने आये इस सरकारी आकलन को नाम दिया गया है ‘ऑपरेशन येलो-हैमर’ (पीला हथौड़ा अभियान). इससे नौ दिन पहले ही बोरिस जॉन्सन ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री बने थे. इस आकलन के कुछ अंश ‘संडे टाइम्स’ ने 18 अगस्त को प्रकाशित किये थे. किंतु कई पृष्ठों का पूरा आकलन अब जाकर लीक हुआ है. जबकि प्रधानमंत्री बनने से पहले और उसके बाद भी बोरिस जॉन्सन यही सब्ज़बाग़ दिखाते रहे हैं कि यूरोपीय संघ को विदा कहने के बाद ब्रिटेन को न केवल अपनी संपूर्ण प्रभुसत्ता वापस मिल जायेगी, देश में सुख-चैन का राज होगा और दूध-दही की नदियां बहेंगी. फिलहाल जो नजर आ रहा है वह बोरिस जॉन्सन की महत्वाकांक्षा, अधीरता और अड़ियलपन की वजह से उनकी असफलता की मुनादी कर रहा है.