उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों एक के बाद एक कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होने पत्रकारिता से जुड़े लोगों को झकझोर दिया है. प्रदेश में नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ, झांसी, बलिया आदि जगहों पर एक के बाद एक ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें ‘पत्रकार’ कहे जाने वाले लोगों के विरूद्ध बड़े आपराधिक मामले दर्ज किये गए, उऩकी गिरफ्तारियां हुईं और उन पर गेंगस्टर एक्ट तक लगाए गए.

इन मामलों में कई ऐसे हैं जिनमें प्रथमदृष्टया ही यह दिखता है कि जिन लोगों पर आरोप लगे हैं वे निर्दोष नहीं हैं. आरोपों की डिग्री या अपराध की धाराओं को लेकर मामला उन्नीस-बीस हो सकता है लेकिन इनमें कानूनी कार्रवाई एकदम निराधार नहीं कही जा सकती.

नोएडा में 24 अगस्त को जिन पांच पत्रकारों को गेंगस्टर एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया उन पर आरोप है कि वे सभी अपने पोर्टल और न्यूज चैनलों के जरिए पुलिस प्रशासन व अधिकारियों के खिलाफ गलत और दुष्प्रचार करने वाली खबरें प्रसारित किया करते थे. इस मामले में शुरूआती जांच में ऐसी बातें भी सामने आई हैं कि ये लोग अधिकारियों को दबाव में लेकर अवैध उगाही किया करते थे. लाखों रूपए की इस उगाही में कुछ अधिकारियों को भी हिस्सा मिलता था. इस कमाई से खरीदी गई संपत्तियों की भी जानकारी पुलिस को मिली है.

बांदा में अवैध खनन के मामले में गिरफ्तार दो पत्रकारों के खिलाफ भी इसी तरह के आरोप हैं और सरसरी तौर पर इन्हें न तो बेगुनाह कहा जा सकता और न ही यह कहा जा सकता कि पत्रकारिता के आदर्शो और मूल्यों पर डटे रहने के कारण उत्तर प्रदेश पुलिस ने इनके खिलाफ कार्रवाई की है.

दरअसल ऐसे लोगों ने ही पत्रकारिता की गरिमा को खत्म किया है और उत्तर प्रदेश में ‘पत्रकार’ शब्द को एक गाली बना दिया है. ऐसे लोगों की संख्या दो-चार में नहीं बल्कि सैकड़ों में है. प्रदेश के ज्यादातर जिलों में अखबारों, न्यूज चैनलों और न्यूज पोर्टलों के नाम पर तथाकथित पत्रकारों की फौज खड़ी हो गई है तो राजधानी लखनऊ में पत्रकारों के नाम पर बड़ी दलाली करने वाले धंधेबाजों की पौ बारह है. लखनऊ के कई बड़े तथाकथित पत्रकार ऐसे हैं कि जब उनके घरों पर खुद के, पत्नी या बच्चों के जन्मदिन या विवाह की वर्षगांठ की पार्टियां होती हैं तो उनमें बड़े से बड़े राजनेता, मंत्री और सचिवों से लेकर तमाम अधिकारी तक मौजूद होते हैं. इन तस्वीरों को सोशल मीडिया में प्रसारित कर अपनी दुकान और धंधे का आकार बढ़ाना और आसान हो जाता है. इनमें से कई लोग किसी जमाने में पत्रकार हुआ करते थे लेकिन अब वे सिर्फ नेता हैं और पत्रकारिता के नाम पर अपनी ‘दुकानें’ चलाते हैं.

असल हैरानी तो उत्तर प्रदेश के मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची को देखकर होती है. इसमें आज करीब 1200 पत्रकारों के नाम शामिल हैं. कुछ वर्ष पहले तक इस सूची में सिर्फ 150-200 नाम ही हुआ करते थे. इस तरह के मान्यता प्राप्त पत्रकारों में जौनपुर में पेट्रोल पंप चलाने और ठेकेदारी करने वाले लोग भी शामिल हैं तो यौन अपराधों के आरोपी भी. इस सूची में राजनीतिक दलों के छुटभय्ये नेताओं की भी भरमार है और बिल्डरों तथा ठेकेदारों की भी. ऐसा तब है जब पत्रकारिता में राज्यस्तरीय मान्यता पाने के लिए कड़े नियम हैं. लेकिन सिफारिश अगर ऊपर से आए तो फिर नियमों की परवाह कौन करे!

इस तरह की मान्यता हासिल करने का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि इसके जरिए सचिवालय व मुख्यमंत्री कार्यालय में बिना किसी झंझट के प्रवेश मिल जाता है. वाहन पास मिल गया तो प्रदेश भर में टोल नाकों पर चुंगी का झमेला खत्म और जिलों के अधिकारियों पर धौंस जमाने की खुली छूट. साथ ही लखनऊ में सरकारी घर की सुविधा तथा ट्रेन किराए में भारी छूट आदि आदि. जाहिर सी बात है कि इस सबका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं और बहुत से ऐसे पत्रकार भी लखनऊ में हैं जो इस सरकारी मान्यता के बिना भी गंभीर किस्म की पत्रकारिता कर रहे हैं. लेकिन धंधा करने के लिए मान्यता मिलना जरूरी है.

पत्रकारिता का यह दागी चेहरा अचानक नहीं प्रकट हुआ है. हाल के वर्षों में प्रदेश की राजनीति में जो गिरावट देखी गई है उसका भी असर इस पर बहुत तेजी से हुआ है. जब अखिलेश यादव की सरकार गई थी उस वक्त योगी आदित्यनाथ की नई-नवेली सरकार ने घोषणा की थी कि वह मान्यता के नाम पर फैली गंदगी की छंटनी कर देगी. लेकिन ढाई साल बाद हुआ यह है कि इस सूची में 25 फीसदी से अधिक का इजाफा हो गया है.

लेकिन गलत लोगों को मान्यता मिल जाना या फिर पत्रकारिता के नाम पर धंधा करने वालों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई होना ही उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता की खराब हालत के संकेत नहीं हैं. यहां पर सिर्फ पत्रकारिता करने वालों के सामने हमेशा ही तरह-तरह की मुश्किलें पेश आती रही हैं. योगी सरकार भी अपनी तरह से इसमें अपना योगदान दे रही है. इसका प्रमाण प्रदेश के अलग-अलग जिलों में पत्रकारों पर लादे गए उन मुकदमों से मिलता है जिन्हें पहली नजर में देखने पर ही कहा जा सकता है कि वे दुर्भावना की वजह से या फिर पत्रकारों को अनुचित दबाव में लाने के लिए दर्ज किये गये हैं.

मिर्जापुर का ‘नमक रोटी प्रकरण’ ऐसा ही एक उदाहरण है. यहां के एक प्राइमरी स्कूल के मिड-डे मील में बच्चों को दाल सब्जी के बजाय नमक के साथ रोटी देने की खबर पत्रकार पवन जायसवाल के जरिए सामने आई थी. जिला प्रशासन ने इसका संज्ञान लेते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ निलंबन आदि की कार्रवाई भी कर दी. लेकिन जब बात बढ़ने लगी तो पवन जायसवाल पर ही प्रशासन के विरूद्ध षडयंत्र रचने का मुकदमा दर्ज करा दिया गया. मामले की गंभीरता का अंदाज़ा जिलाधिकारी के उस हास्यास्पद बयान से हो जाता है जिसमें वे कहते हैं कि ‘जब वो प्रिंट मीडिया का पत्रकार था तो उसने मोबाइल से वीडियो क्यों बनाया?’ प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में जिला प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय कहते हैं, ‘हां, राज्य में मीडिया में भ्रष्ट तरह के लोग हैं, इनके खिलाफ कार्रवाई जरूर होगी.’ हालांकि राज्य के डीजीपी ओपी सिंह कहते हैं कि ‘हम पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं करते. इस मामले की जांच चल रही है और कानून अपना काम करेगा.’

इस प्रकरण में योगी सरकार के तौर-तरीकों की खूब आलोचना हुई है. जिस स्कूल में यह वाकया हुआ था वहां के अभिभावकों ने पत्रकार के उत्पीड़न के विरोध में अपने बच्चों को कई दिनों तक स्कूल नहीं भेजा. देश भर के पत्रकार संगठनों से लेकर राजनैतिक दलों तक, सबने इस प्रकरण में सरकार की भर्त्सना की. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इसके चलते अपना एक जांच दल मिर्जापुर भेजने का फैसला किया है. वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान इस प्रकरण को एक खतरनाक संकेत मानते हैं. वे कहते हैं, ‘अगर सरकार यह सोचती है कि इस तरह पत्रकारों का उत्पीड़न करके वो सच को दबा देगी तो यह उसकी सरासर भूल है. इस तरह के कदमों से पत्रकारों की कलम और भी धारदार होगी. सोशल मीडिया में ज्यादा कड़वे सच सामने आने लगेंगे.’

शरत प्रधान ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस तरह का प्रकरण सिर्फ अकेले मिर्जापुर में ही नहीं हुआ है. पिछले कुछ समय से ऐसा लगातार देखने को मिल रहा है. बिजनौर के एक गांव में पांच पत्रकारों के खिलाफ फर्जी खबर बनाने का मुकदमा इसलिए दर्ज किया गया क्योंकि कथित तौर पर उन्होंने दलित समुदाय को पानी न लेने देने की खबर प्रकाशित की थी. इसी तरह आजमगढ़ में पुलिस दरोगा की बिना नंबर की स्कॉर्पियो गाड़ी की खबर दिखाने वाले पत्रकार के खिलाफ भी एक मुकदमा दर्ज करा दिया गया. लखनऊ में मोहर्रम की तैयारियों की खबर छपने से यहां का प्रशासन उसे लिखने वाले एक उर्दू पत्रकार से इतना नाराज हो गया कि एक सुबह अधिकारियों का पूरा लाव-लश्कर उन्हें धमकाने के लिए उनके घर पर पहुंच गया.

इस बात से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है कि झूठी, ब्लैकमेल करने वाली या समाज में वैमनस्य बढ़ाने वाली खबरों की छूट किसी भी पत्रकार को नहीं दी जा सकती. लेकिन ऐसा करने के तरीके मर्यादित ही होने चाहिए. यह ठीक है कि आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को पत्रकार बना दिया है. लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार सबको है और इस दायरे से बाहर जाने वालों से निपटने का अधिकार और जिम्मेदारी प्रशासन की है. लेकिन प्रशासन की एक जिम्मेदारी और है. उसे गलत से निपटने की अपनी जिम्मेदारी संवैधानिक दायरे में रहकर ही निभानी है. योगी सरकार को यह समझना चाहिए कि मीडिया प्रेशर कुकर की सीटी का काम करता है. वह धीरे-धीरे सरकार के प्रति जनता के गुस्से को बाहर निकालता है. अब अगर सरकार इस सीटी को ही काम करने से रोकेगी तो फिर कुकर का फटना तय है. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के पास अभी भी ढाई वर्ष का कार्यकाल बाकी है. इस समय का उपयोग अगर सच्चाई को दबाने के बजाय सकारात्मक कार्यों के लिए किया जाए तो इससे प्रदेश का भी हित होगा और सरकार का भी. जो असल पत्रकार हैं वे तो हर हाल में अपना काम करते ही रहेंगे.