निर्देशक: अभिषेक शर्मा

लेखक: अनुजा चौहान, प्रद्युमन सिंह

कलाकार: दुलकर सलमान, सोनम कपूर, संजय कपूर, सिकंदर खेर, अंगद बेदी

रेटिंग: 2/5

हमारे देश में क्रिकेट को एक अलग धर्म माना जाता है और इसके बाद जिस चीज पर लोगों का सबसे अधिक प्यार बरसता है, वह सिनेमा है. ऐसे में जब क्रिकेट और सिनेमा कहीं मिलते हैं तो उम्मीदें कई गुना बढ़ जाती हैं. फिर चाहे वह अखबारों में गॉसिप वाला कॉलम हो या सिनेमाघर में 70 एमएम का परदा. ‘द ज़ोया फैक्टर’ के साथ बुरा यह है कि फिल्म इन उम्मीदों के ढेर पर चढ़कर धड़ाम से मुंह के बल गिर जाती है.

‘द ज़ोया फैक्टर’ की कहानी एक ऐसी लड़की की है जिसे भारतीय क्रिकेट टीम अपना लकी चार्म मानने लगती है. यह लड़की 25 जून, 1983 को जन्मी ज़ोया सोलंकी है. उसके जन्म की तारीख में खास यह है कि उसकी पैदाइश के दिन भारत ने अपना पहला क्रिकेट वर्ल्डकप जीता था. खुद अपने लक से अपने लिए कुछ खास न कर पाने वाली ज़ोया, एक एड एजेंसी में काम करती है. इसके जरिए वह भारतीय क्रिकेट टीम से मिलती है और बाद में, ज़ोया के लक के चलते भारतीय टीम अपने मैच जीतने लगती है.

फिल्म दिखाती है कि ज़ोया के लक का फायदा पहले क्रिकेट टीम उठाती है, फिर मीडिया और आखिर में विज्ञापन कंपनियां भी इसमें शामिल हो जाती हैं. इन सबके जरिये फिल्म क्रिकेट, मीडिया और कॉरपोरेट के आपसी समीकरण दिखाने की कोशिश भी करती है लेकिन सिर्फ ऊपर-ऊपर से. ‘द ज़ोया फैक्टर’ के पास एक मौका यह भी था कि वह क्रिकेट के लिए भारतीयों के पागलपन की झलक दिखाती और अंधविश्वास की उनकी प्रवृत्ति पर तीखा तंज भी करती. इसके लिए फिल्म में ज़ोया को देवी की तरह पूजे जाने वाला सीक्वेंस भी रखा गया है लेकिन उसे सटैरिकल की जगह इमोशनल टच देने के चलते, फिल्म यह मौका भी चूक जाती है. यहां तक कि लक पर मेहनत को तरजीह देने वाली बात भी फिल्म बस चलते-फिरते अंदाज में ही करती है.

द ज़ोया फैक्टर में जो बात सबसे ज्यादा चुभती है, वह फिल्म में मौजूद क्रिकेट मैच वाले दृश्य हैं. इन महत्वपूर्ण दृश्यों में की गई अति-बनावटी और कॉमिक कमेंट्री इनका सारा प्रभाव मटियामेट कर देती है. लेकिन अच्छा यह है कि इस दौरान स्टेडियम के दृश्य और क्राउड का शोर, यह भरोसा दिलाने में कामयाब होते हैं कि टीम इंडिया ही मैदान पर है.

अभिनय पर आएं तो सोनम कपूर को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने उनकी पिछली कई फ्लॉप फिल्मों की कतरनें काटकर यहां पर चिपका दी हों. सोनम के पास एक स्टैंडर्ड एक्सप्रेशन है - क्लूलेस और कन्फ्यूज्ड लड़की का. इसे देखकर उनके खुश या दुखी होने का अंदाजा लगा पाना बेहद मुश्किल है. द ज़ोया फैक्टर में वे इस एक्सप्रेशन का भरपूर इस्तेमाल करती हैं और उकताहट की हद तक बोर करती हैं. इसके अलावा क्लम्जी-डम्ब-ब्यूटी के किरदार वे इतनी बार दोहरा चुकी हैं कि कई बार ऐसा लगने लगता है कि वे खुद भी शायद ऐसी ही हैं.

सोनम कपूर के अपोजिट नज़र आ रहे मलयालम फिल्मों के सुपरस्टार दुलकर सलमान इस फिल्म में देखने लायक एकमात्र चीज हैं. उनकी चार्मिंग और ग्रेसफुल स्क्रीन प्रजेंस न सिर्फ आपको खुश करती है बल्कि फिल्म को और देखे जाने की इच्छा भी बनाए रखती है. हालांकि दुलकर थोड़ा संभलकर हिंदी बोलते हैं लेकिन अपने अभिनय से इस कमी को वे पूरी तरह से पूरा कर देते हैं. लेकिन यहां पर उन्हें एक सलाह - अगर दुलकर सलमान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम जमाने के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं तो उन्हें ऐसी फिल्में करने से बचना चाहिए. उनके अलावा फिल्म में संजय कपूर, सिकंदर खेर, कोयल पुरी और अंगद बेदी खास तौर पर हमारा ध्यान खींचते हैं. वैसे, सोनम कपूर से लेकर सिकंदर खेर तक को खुद में शामिल करने वाली यह फिल्म नेपोटिज्म को आगे बढ़ाने के लिए भी कोसी जा सकती है. दुलकर सलमान भी साउथ के मेगा स्टार ममूटी के बेटे हैं.

बीते साल ‘परमाणु’ जैसी महाबोर एक्शन फिल्म देने वाले अभिषेक शर्मा ने इस बार अनुजा चौहान की किताब ‘द जोया फैक्टर’ को रॉम-कॉम की शक्ल देने की कोशिश की है. जाहिर है यह बहुत सफल नहीं कही जा सकती है. ऐसा तब है जब उनकी पहली और सबसे बढ़िया फिल्म ‘तेरे बिन लादेन’ कॉमेडी जॉनर की फिल्म ही थी. फिलहाल जरूरत से ज्यादा ग्लैमरस नज़र आ रही उनकी इस फिल्म में कई दृश्य और सीक्वेंस इतने डिस्कनेक्टेड से हैं कि वे जहां हैं उनके वहां होने का कोई मतलब ही समझ नहीं आता. ज़ोया फैक्टर के संवाद उन्हीं अनुजा चौहान ने लिखे हैं जिनकी इसी शीर्षक वाली किताब पर यह फिल्म बनी है. लेकिन कई बार ये कुछ इस तरह से लिखे गए लगते हैं मानो कलाकारों से कह दिया गया हो कि जो मन में आए बोल देना! इसके अलावा, जोया फैक्टर में गाने कब आकर चले जाते हैं, आपको पता ही नहीं चलता.

कुल मिलाकर, कमजोर निर्देशन, बहकी हुई पटकथा, ओवर द टॉप ड्रामा और ज्यादातर कलाकारों का बुरा अभिनय ‘द ज़ोया’ फैक्टर को एक अझेल फिल्म बना देता है.