हमारा समय प्राचीन ग्रंथ को मूल या अनुवाद में पढ़े-गुने बिना, उनसे तरह-तरह की अतर्कित हिंसा और अनाचार का औचित्य प्रतिपादित करने का है. पवित्र वेद या गीता इसका अपवाद नहीं है. वेद शब्द का तो अर्थ ही ज्ञान होता है जबकि हम हर दिन अज्ञान को शिखर से बोलने और ललकारने का तमाशा देख रहे हैं. अज्ञान द्वारा ज्ञान को इस तरह निरी सत्ता के आधार पर अपमानित करने या ललकारने का उदाहरण भारतीय परंपरा में दूसरा याद नहीं आता. अब तो यह दावा भी किया जाना बंद हो गया कि हम एक ज्ञान-आधारित समाज बनने जा रहे हैं. ज्ञान में हमारी बढ़ती गिरावट का एक प्रमाण यह है कि संसार के श्रेष्ठ 300 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है. शायद हम अज्ञान में विश्वगुरु बनने जा रहे हैं क्योंकि विश्वगुरु बनना तो हमारी आकांक्षा है ही!

अथर्व वेद के ‘पृथिवी सूक्त’ का हिंदी अनुवाद कवि-दार्शनिक मुकुंद लाठ ने किया है जो रज़ा पुस्तक माला के अंतर्गत सेतु प्रकाशन से आ रहा है. मंगलमयी, हिरण्यवक्षा, विश्वंभरा पृथिवी, की इस सूक्त में, अद्भुत स्तुति है जो स्तुति की पारंपरिक सीमाओं का इस आदि कविता में अतिक्रमण करती है. इस सूक्त में कहीं कहा गया है कि ‘कभी पृथ्वी को/पीड़ा न दें’ तो यह अपेक्षा भी की गयी है कि ‘पृथिवी, मुझे गिरने से रोक लेना.’

यह सूक्त यह सहज स्वीकार है कि ‘अन्न और मनीषा से/जीते हैं/मर्त्य मानव यहां।’

कुछ और अंश देखें:

तुम्हारी गंंध

है पृथिवी,

जो पौधों में है,

जल में है,

गन्धर्वों, अप्सराओं में है

उससे मुझे महकने दो।

कोई हमसे द्वेष न करे।

या यह अंश:

हम खड़े हों

या बैठे हों,

स्थिर हों

या चंचल हों,

अपना दायां पैर

या बायां पैर उठाकर

कहीं जा रहे हों,

कभी पृथ्वी को

पीड़ा न दें।

पिता की बरसी

आज जब मैं अपने स्तंभ की अगली क़िस्त लिख रहा हूं तब 13 सितंबर है और आज ही के दिन 46 वर्ष पहले मेरे पिता की मृत्यु हुई थी. मुक्तिबोध की मृत्यु 11 सितंबर 1964 को हुई और काका 13 सितम्बर 1973 को गये. यह भी संयोग ही है कि मुक्तिबोध जिस हमीदिया अस्पताल भोपाल से अचेत दिल्ली लाये गये थे उसी अस्पताल में मेरे पिता भी भरती थे और वहीं उन्होंने आखि़री सांस ली. मुक्तिबोध पहले व्यक्ति थे जिनको मैंने अपनी 23 से कुछ अधिक उमर में अपनी आंखों के सामने मरते देखा था. काका दूसरे व्यक्ति थे जिन्हें मैंने फिर अपनी आंखों के सामने मरते देखा.

अपने पिता से मैं बहुत डरता था. आज सोचता हूं कि उनसे अधिक मैं किसी से नहीं डरा. कई विषम स्थितियां आयीं, आरोप-लांछन लगे और अब भी लगते रहते हैं पर मैं कभी डरा नहीं. पर उनसे डरता था हालांकि उन्होंने मुझे सागर से बाहर दिल्ली आकर सेंट स्टीवेंस कालेज में पढ़ने की थोड़ी खर्चीली सुविधा उत्साह से दी. एक जैन व्यक्ति से विवाह करने की अनुमति भी उन्होंने बिना किसी ननु नच के दी जबकि उनकी कीर्ति एक कट्टर कान्यकुब्ज ब्राह्मण की थी. वे बदमिजाज़ और तुनुकमिजाज़ दोनों ही थे. लेकिन उसके पीछे दूसरों की किसी भी हद तक जाकर मदद करने का उनका जज़्बा अदम्य था. साधारण किसान के बेटे होने के कारण उनमें ग़जब का स्वाभिमान था और वे किसी दूसरे का उपकार लेने से बचते थे.

सागर विश्वविद्यालय में वे एक किवंदंती भी थे. उपकुलसचिव होने के बावजूद उनका दबदबा बहुत था. किसी को अगर कुछ असंभव कराना होता था तो वह उनके पास ही जाता था. उनकी गालियां खाता था और उसका काम हो जाता था. नियमों को तोड़-मरोड़कर मदद करने का उनका हुनर बेजोड़ था. बनारस में अपने छात्र दिनों में उनका संपर्क जयशंकर प्रसाद से था और यह कहा जाता था कि ‘कामायनी’ का पहला प्रसाद-पाठ जब हुआ तो वे उस गोष्ठी में मौजूद थे. निराला जी को वे अपने बड़े भाई आनन्द मोहन वाजपेयी के हवाले से जानते थे और निराला जी उनके पिता से अच्छी तरह परिचित थे. उनका गांव गढ़ाकोला हमारे पैतृक गांव राजापुर गढ़ेवा के पास ही था.

इतने बरसों बाद उन्हें याद करना कभी-कभार ही हो पाता है. मुझे यक़ीन है कि उनसे डर कर मैंने उन्हें और उनकी अपार वत्सलता को समझने में अक्षम्य भूल की. जब मुझे अपनी समझ पर कुछ अभिमान सा होने लगता है, इस भूल को याद कर उसको संयमित करने की कोशिश करता हूं.

जो बचेगा कैसे रचेगा

श्रीकांत वर्मा ने सत्ता से दूर लेकिन नीति के नज़दीक तीसरे रास्ते की बात दशकों पहले की थी. आज हम जहां हैं वहां लगता है कि दूसरा रास्ता तक धुंधला रहा है और तीसरा तो नज़र में ही नहीं आता. ठीक ऐसे वक़्त हमें अपने कुछ पुरखे याद आते हैं जिन्होंने अपने भीषण समय में, सब कुछ निरर्थक होते जाने की दैनिक ट्रैजेडी के बावजूद, विकल्प की तलाश करने का उद्यम किया था. उनमें एक श्रीकांत वर्मा थे जिनकी स्मृति में दो दिनों का एक आयोजन 21-22 सितंबर को, ‘तीसरा रास्ता’ नाम से, रायपुर में रज़ा फ़ाउण्डेशन करने जा रहा है. इस अवसर पर श्रीकांत जी के उद्धरणों की राजेंद्र मिश्र द्वारा संपादित पुस्तक भी प्रकाशित होगी जिसे सेतु प्रकाशन ने ‘जो बचेगा कैसे रचेगा’ शीर्षक से छापा है.

श्रीकांत वर्मा अपने समय के सबसे नाराज़, चिढ़े हुए कवि थे. वे इस पूरी निमर्मता और बेबाकी से इसरार कर सकते थे कि ‘जो मुझसे नहीं हुआ/वह मेरा संसार नहीं.’ उन्हें यह स्वीकार करने में कभी संकोच नहीं हुआ‘...मेरी रचनाओं में वसंत कभी नहीं आया.’ वे शिद्दत से महसूस करते थे कि ‘मेरे चारों ओर हत्यारे हैं’.

श्रीकांत जी ने कहा था-

कोई भी जगह नहीं रही

रहने के लायक

न मैं आत्महत्या कर सकता हूंं

न औरों का ख़ून

तुम जाओ अपने बहिश्त में

मैं जाता हूं अपने जहननुम में.

अपने पहले कविता-संग्रह ‘भटका मेघ’ के द्वितीय संस्करण की भूमिका में उन्होंने लिखा था, ‘इस संसार को मैंने पूरी तरह से कभी भी स्वीकार नहीं किया, सिर्फ़ लड़ता रहा. लड़ाई अब भी जारी है... कभी भीतर, कभी बाहर. इसी तमाम लड़ाई की छाप, पंजों के चिह्न, रक्तस्थल गाथा मेरी बाद की कविताओं में है. ‘मैं अब घर जाना चाहता हूं.’ लेकिन घर लौट सकना नामुमकिन है, क्योंकि घर कहीं नहीं.’ उनमें यह हिम्मत भी थी कि कह सके-

मगर ख़बरदार। मुझे कवि मत कहो।

मैं बकता नहीं हूं कविताएंं

ईज़ाद करता हूंं

गाली

फिर उसे बुदबुदाता हूं।

‘कोसल अधिक दिन टिक नहीं सकता/कोसल में विचारों की कमी है.’ और ‘कोसल मेरी कल्पना में गण राज्य है/कोसल में प्रजा सुखी नहीं/क्योंकि कोसल सिर्फ़ कल्पना में गणराज्य’ जैसी अनेक मार्मिक पंक्तियां श्रीकांत जी की आज याद दिलाती हैं.