बीते हफ़्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक ट्वीट किया. हिंदी दिवस की सुबह किए गए इस ट्वीट में लिखा था, ‘भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है परन्तु पूरे देश की एक भाषा होना अत्यंत आवश्यक है जो विश्व में भारत की पहचान बने. आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वो सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा ही है (ज्यों का त्यों).’

इस ट्वीट के साथ ही गृह मंत्री ने दूसरा ट्वीट करते हुए लिखा, ‘आज हिंदी दिवस के अवसर पर मैं देश के सभी नागरिकों से अपील करता हूं कि हम अपनी-अपनी मातृभाषा के प्रयोग को बढाएं और साथ में हिंदी भाषा का भी प्रयोग कर देश की एक भाषा के पूज्य बापू और लौह पुरूष सरदार पटेल के स्वप्प्न को साकार करने में योगदान दें (ज्यों का त्यों).’

हिंदी भाषा को बढ़ावा देने की अपील करते कुछ अन्य ट्वीट भी अमित शाह ने इस दिन किए जिसके बाद ट्विटर पर ‘हैशटैग वन लैंग्वेज’ ट्रेंड करने लगा. देश भर में यह बहस छिड़ गई कि सरकार हिंदी को राजभाषा बनाने की दिशा में विचार कर रही है और ग़ैर-हिंदी राज्यों में इसका जमकर विरोध भी होने लगा. हालांकि कुछ दिन बाद अमित शाह ने स्पष्ट किया कि उन्होंने हिंदी को थोपे जाने की बात नहीं की बल्कि सिर्फ़ लोगों से हिंदी को दूसरी भाषा के तौर पर सीखने का आग्रह किया है. लेकिन उनके इस स्पष्टीकरण से पहले ख़ुद भाजपा नेताओं द्वारा ही हिंदी का विरोध शुरू हो चुका था. कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने ट्वीट करते हुए लिखा था, ‘हमारे देश में सभी आधिकारिक भाषाएं समान हैं. हालांकि, जहां तक कर्नाटक की बात है, कन्नड़ यहां की प्रमुख भाषा है. हम कभी भी इसके महत्व से समझौता नहीं करेंगे. हम कन्नड़ भाषा और हमारे राज्य की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’

बीएस येदियुरप्पा दक्षिण भारत में भाजपा से सबसे बड़े नेता हैं. उनके ट्वीट से स्पष्ट था कि भाषा के सवाल पर वे भी ‘एक भाषा’ वाले तर्क से सहमत नहीं हैं और दक्षिण भारतीय समाज इस मामले में किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं है. मशहूर अभिनेता कमल हसन ने भी अमित शाह के ट्वीट के बाद एक वीडियो सार्वजनिक किया. इसमें उनका कहना था कि, ‘जब हमने भारत को एक लोकतंत्र बनाया तो हमने अनेकता में एकता का वादा किया था. अब कोई शाह, सुल्तान या सम्राट अचानक ये वादा नहीं तोड़ सकता है. हम हर भाषा की इज्ज़त करते हैं लेकिन हमारी मातृ भाषा हमेशा तमिल रहेगी. जल्लीकट्टू महज़ एक विरोध प्रदर्शन था लेकिन भाषा के लिए हमारी लड़ाई उससे कहीं ज़्यादा बड़ी होगी.’

यह पहली बार नहीं है जब हिंदी भाषा को राजभाषा बनाने की बात उठी हो और दक्षिण भारत में इसका ज़बर्दस्त विरोध हुआ हो. विख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा की चर्चित किताब ‘इंडिया आफ़्टर गांधी’ में उस घटनाक्रम का दिलचस्प विवरण मिलता है जब 1965 में हिंदी विरोध का आंदोलन अपने चरम पर पहुंचा था और सरकार को देश भर में हिंदी लागू किए जाने के फ़ैसले से हाथ खींचने पड़े थे. इस पर चर्चा करने से पहले इसकी पृष्ठभूमि पर एक नज़र डालते हैं.

साल 1949 में ही संविधान सभा ने हिंदी को देश की आधिकारिक भाषा के रूप में चुन लिया था. लेकिन इस फ़ैसले को तत्काल लागू करना संभव नहीं था. लिहाज़ा तय यह हुआ कि संविधान लागू होने के 15 सालों तक केंद्र और राज्यों के बीच होने वाले संचार में हिंदी के साथ ही अंग्रेज़ी का भी इस्तेमाल किया जाता रहेगा. 1965 में ये 15 साल पूरे होने जा रहे थे लिहाज़ा दक्षिण भारतीय नेताओं के लिए यह बड़ी चिंता का विषय बन गया था.

ग़ैर-हिंदी राज्यों और विशेष तौर से दक्षिण भारत को यह स्वीकार्य नहीं था कि हिंदी को ही एकमात्र राजभाषा बना दिया जाए. लिहाज़ा इन क्षेत्रों में 1965 से पहले ही हिंदी विरोध की आवाज़ें उठने लगी थी. ‘अकैडमी ऑफ़ तमिल कल्चर’ 1956 में ही एक प्रस्ताव पारित कर चुकी थी जिसमें मांग की गई थी कि अंग्रेज़ी को केंद्र और राज्यों के बीच संपर्क और संचार के लिए आधिकारिक भाषा बना रहने दिया जाए. इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वालों में सीएम अन्नादुरई, ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ और सी राजगोपालाचारी जैसे दिग्गज भी शामिल थे. हिंदी लागू किए जाने के विरोध में जो आंदोलन खड़ा हो रहा था उसकी मुख्य कमान डीएमके (द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम) के हाथों में थी.

चीन से हुए युद्ध के बाद डीएमके अपनी अलगाववादी मांगें भुला चुकी थी. उसे अब अलग देश नहीं चाहिए था लेकिन तमिल संस्कृति और भाषा से कोई भी समझौता उसे मंज़ूर नहीं था. डीएमके के सबसे बड़े नेता सीएम अन्नादुरई का मानना था कि हिंदी वैसी ही एक क्षेत्रीय भाषा है जैसी सैकड़ों अन्य भी हैं, इसमें कुछ भी विशेष नहीं है, यह तमाम अन्य भारतीय भाषाओं से भी कम विकसित है लिहाज़ा विज्ञान और तकनीकी विकास के दौर के लिए यह उपयुक्त भाषा नहीं है.

हिंदी के पक्ष में जब भी यह तर्क दिया जाता कि ‘देश में किसी भी अन्य भाषा की तुलना में हिंदी ही सबसे ज़्यादा बोली जाती है लिहाज़ा इसे ही राजभाषा होना चाहिए’ तो अन्नादुरई व्यंग्यात्मक जवाब देते हुए कहते, ‘संख्याबल के ही सिद्धांत को अगर स्वीकार्य माना जाए तो फिर हमारा राष्ट्रीय पक्षी मोर नहीं बल्कि कौआ होना चाहिए क्योंकि संख्या तो उनकी ही ज़्यादा है.’

जवाहरलाल नेहरु भाषा को लेकर दक्षिण भारतीय और पूर्वोत्तर के लोगों की संवेदनाओं को समझते थे. इसीलिए 1963 में जब उनके प्रधानमंत्री रहते ‘ऑफ़िशल लैंग्विज ऐक्ट’ पास किया गया तो उसमें प्रावधान था कि 1965 के बाद भी हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी का प्रयोग किया जा सकता है. लेकिन अंग्रेज़ी में लिखा यह ऐक्ट इस लिहाज से थोड़ा अस्पष्ट था कि इसमें लिखा गया था ‘इंग्लिश मे भी यूज़्ड’. लिहाज़ा इसका दूसरा अर्थ स्वतः ही बनता ‘इंग्लिश मे नॉट भी यूज़्ड’ यानी अंग्रेज़ी का उपयोग जारी रह भी सकता है और नहीं भी.

‘नेहरु एंड द लैंग्विज पॉलिटिक्स ऑफ़ इंडिया’ और ‘हिंदी अगेन्स्ट इंडिया: द मीनिंग ऑफ़ डीएमके’ जैसी किताबों के हवाले से रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि ‘हालांकि नेहरु ने स्पष्ट किया था कि ऐक्ट में लिखे गए ‘मे बी यूज़्ड’ का अर्थ ‘शैल बी यूज़्ड’ समझा जाए. लेकिन कांग्रेस के कई अन्य नेता ऐसा नहीं सोचते थे. उनका मानना था कि इसका मतलब ‘मे नॉट बी यूज़्ड’ ही है.’ 26 जनवरी 1965 के दिन जब संविधान में दिया गया 15 साल का समय पूरा हो रहा था तो नेहरु इस दुनिया से जा चुके थे. देश के प्रधानमंत्री अब लाल बहादुर शास्त्री थे.

26 जनवरी का यह दिन जैसे-जैसे क़रीब आ रहा था वैसे-वैसे हिंदी विरोध का आंदोलन भी तेज़ हो रहा था. अन्नादुरई ने इस गणतंत्र दिवस से क़रीब दस दिन पहले लाल बहादुर शास्त्री को एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने कहा कि अगर हिंदी को राजभाषा बनाया जाता है तो इस गणतंत्र दिवस को वे ‘शोक दिवस’ के तौर पर मनाएंगे. इस पत्र में उन्होंने यह भी मांग की कि अगर इस फ़ैसले को एक हफ़्ते के लिए भी आगे टाल दिया जाता है तो डीएमके भी पूरे देश के साथ गणतंत्र दिवस का जश्न ख़ुशी-ख़ुशी मना सकेगी.

लेकिन लाल बहादुर शास्त्री और उनका मंत्रिमंडल इस फ़ैसले पर टिका रहा कि 26 जनवरी से हिंदी को ही आधिकारिक भाषा बना दिया जाए. नतीजा यह हुआ कि डीएमके ने पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए. जगह-जगह हिंदी के पुतले जलाए जाने लगे, हिंदी की किताबों और संविधान के संबंधित पन्नों में आग लगाई जाने लगी और रेलवे स्टेशन से लेकर पोस्ट ऑफ़िस तक जहां भी हिंदी में कुछ लिखा था उस पर कालिख पोत दी गई या ऐसे बोर्ड/होर्डिंग गिरा दिए गए. प्रदेश के कई शहरों और क़स्बों में तो पुलिस और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच हिंसक घटनाएं भी हुईं.

प्रदेश भर में हिंदी के विरोध के चलते हड़ताल, चक्का जाम और बंद होने लगे. 26 जनवरी आते-आते मद्रास में दो लोगों ने ‘तमिल अस्मिता’ की रक्षा के लिए ख़ुद को आग लगा ली. इस घटना के तीन दिन बाद ही त्रिची में भी एक 21 साल के नौजवान ने आत्महत्या कर ली और अपने सुसाइड नोट में लिख छोड़ा कि वह तमिल लोगों के अधिकारों के लिए अपने प्राणों की आहुति दे रहा है. इन मौतों ने हिंदी के ख़िलाफ़ खड़े हुए आंदोलन को और भी उग्र कर दिया जिसके चलते कई जगह हिंसा भड़की और कई लोगों की जान चली गई. रामचंद्र गुहा अपनी किताब में एक तत्कालीन पुलिस अधिकारी का बयान कुछ इस तरह लिखते हैं - ‘नई दिल्ली में बैठे कुछ लोग जिसे सिर्फ़ संकीर्ण कट्टरवादियों का प्रदर्शन समझ रहे थे वो असल में स्थानीय राष्ट्रवादी आंदोलन था.’

इस आंदोलन की व्यापकता के चलते जल्द ही कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे को लेकर दो-फाड़ हो गए. जनवरी के अंत में ही कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने बैंगलोर में बैठक आयोजित की और तमाम हिंदी भाषियों से अपील की कि किसी भी ग़ैर-हिंदी क्षेत्र में हिंदी भाषा को ज़बरदस्ती न थोपा जाए क्योंकि ऐसा करना देश की एकता को कमज़ोर करना होगा. इन अपीलकर्ताओं में एस निजलिंगप्पा (मैसूर के मुख्य मंत्री), अतुल्य घोष संजीव रेड्डी और के कामराज भी शामिल थे.

एक तरफ़ कांग्रेस के कुछ नेताओं ने यह अपील जारी की तो दूसरी तरफ़ ठीक इसी दिन कांग्रेस के ही बड़े नेता मोरारजी देसाई ने तिरुपति में प्रेस को बयान दिया कि ‘हिंदी सीखने से तमिल लोग पूरे भारत में अपना प्रभाव बढ़ा सकेंगे. मद्रास के कांग्रेसी नेताओं को चाहिए कि वो लोगों को बताएं कि हिंदी का विरोध करके वो ग़लती कर रहे हैं.’ मोररजी देसाई ने अफ़सोस जताते हुए यह भी कहा कि हिंदी को 1950 के दशक में ही आधिकारिक राजभाषा बना देना चाहिए था क्योंकि तब तक इसके विरोध का आंदोलन इतना मज़बूत और संगठित नहीं हुआ था. देसाई का मानना था कि हिंदी ही पूरे भारत के लिए एक लिंक भाषा हो सकती है और अंग्रेज़ी इसका विकल्प कभी नहीं हो सकती क्योंकि वह हमारी भाषा नहीं है.

रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि लाल बहादुर शास्त्री के लिए अब बड़ी दुविधा वाली स्थिति हो गई थी. उनका दिल तो हिंदी के समर्थकों के साथ था लेकिन दिमाग़ कह रहा था कि वे दूसरे पक्ष को अनसुना नहीं कर सकते. हिंदी का विरोध लगातार बढ़ता ही जा रहा था और 11 फ़रवरी कोे मद्रास से आने वाले दो केंद्रीय मंत्रियों ने भी इस मुद्दे को लेकर मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया. अब शास्त्री समझ चुके थे कि हिंदी को ऐसे लागू करना संभव नहीं है लिहाज़ा इसी दिन शाम को उन्होंने ऑल इंडिया रेडिओ से घोषणा कर दी कि वे नेहरु के दिए आश्वासन का पूरा सम्मान करेंगे और अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल तब तक जारी रहेगा जब तक लोग ऐसा चाहते हैं.

इसके साथ ही लाल बहादुर शास्त्री ने चार आश्वासन और दिए:

1. हर राज्य को पूरी स्वतंत्रता होगी कि वह अपनी इच्छा की भाषा में अपना कार्य जारी रखे. यह कोई क्षेत्रीय भाषा भी हो सकती है और अंग्रेज़ी भी.

2. दो राज्यों के बीच में होने वाला संचार या तो अंग्रेज़ी में होगा या इस संचार के साथ अंग्रेज़ी अनुवाद संलग्न होगा.

3. ग़ैर-हिंदी राज्य स्वतंत्र होंगे कि वे केंद्र से अंग्रेज़ी में संवाद कर सकें और इस व्यवस्था में ग़ैर-हिंदी राज्यों की सहमति के बिना कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी.

4. केंद्रीय स्तर पर अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल जारी रहेगा.

इसके अलावा तत्कालीन प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि अखिल भारतीय सिवल सेवा परीक्षा भी अंग्रेज़ी में जारी रहेगी, यह सिर्फ़ हिंदी भाषा में नहीं की जाएगी जैसा कि कई हिंदी भाषी चाहते हैं. इन घोषणाओं के बाद दक्षिण भारत में तो शांति हो गई लेकिन संसद में जमकर हंगामा शुरू हुआ. हिंदी की वकालत करने वालों का तर्क था कि इस भाषा का विरोध करने वाले संविधान के ख़िलाफ़ हैं और ‘एंटी नैशनल’ हैं. इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि हिंसा से डरकर क़दम पीछे खींच लेने से सरकार ऐसे हिंसक आंदोलनों को प्रोत्साहित कर रही है. दूसरी तरफ़ तमिल सदस्यों का कहना था कि वे पहले ही हिंदी नाम के इस ‘दैत्य’ के चलते बहुत कुछ खो चुके हैं. इन लोगों को बंगाल के कुछ सदस्यों का भी समर्थन मिला जिनका मानना था कि देश को जोड़ने के लिए भाषा नहीं बल्कि क़ानूनी और न्यायिक एकता ज़रूरी है.

संसद में इसी बहस के दौरान का एक दिलचस्प क़िस्सा भी ‘इंडिया आफ़्टर गांधी’ में मिलता है. बहस के दौरान जब इसके एंग्लो इंडियन सदस्य फ़्रैंक ऐन्थनी ने चिंता ज़ाहिर की कि हिंदी की उग्र वकालत करने वालों में असहिष्णुता और कट्टरपंथ बढ़ रहा है तो जेबी कृपलानी ने उन्हें इसका जवाब देते हुए कहा, ‘मिस्टर ऐन्थनी आप बेवजह ही अपनी मातृभाषा के भविष्य को लेकर परेशान हो रहे हैं. भारतीय बच्चे भी अब अम्मा-अप्पा की जगह मम्मी-पापा बोलते हैं और हम अपने कुत्तों से भी अब अंग्रेज़ी में बात करते हैं. अंग्रेज़ी इंग्लैंड से ग़ायब हो सकती है लेकिन भारत से ग़ायब नहीं होगी.’

1965 में आधिकारिक भाषाओं के लिए जो व्यवस्था तय हुई, लगभग वही व्यवस्था आज भी देश में बनी हुई है. हालांकि 1965 में लागू हुए ‘ऑफ़िशियल लैंग्वेज ऐक्ट’ में 1967 में कुछ संशोधन हुए हैं और फिर 1976 में इस ऐक्ट की धारा 8(1) के तहत कुछ नियम भी बनाए गए हैं. इन नियमों के तहत देश के तमाम राज्यों को तीन श्रेणियों में बांट दिया गया है. पहली श्रेणी में शामिल राज्यों से केंद्र सरकार हिंदी में संचार करती है, दूसरी श्रेणी के राज्यों से हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों में और तीसरी श्रेणी के राज्यों से अंग्रेज़ी में.

इस ऐक्ट में यह भी प्रावधान है कि तमाम केंद्रीय क़ानून, नियम, अधिनियम, आदेश आदि का प्रकाशन अंग्रेज़ी के साथ ही हिंदी में भी किया जाएगा. हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सरकार कई तरह के प्रयास करेगी और एक समिति - जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के मिलाकर कुल 30 सदस्य होंगे - समय-समय पर हिंदी भाषा के विस्तार में हुई प्रगति का आकलन करेगी. हिंदी भाषा को व्यापक बनाने के लिए कई तरह के अवार्ड दिए जाने का भी प्रावधान किया गया है. औपचारिकता निभाने के लिए इन तमाम प्रावधानों पर अमल भी किया जाता है.

संविधान निर्माताओं की यही मंशा थी कि हिंदी पूरे देश को जोड़ने वाली भाषा के रूप में विकसित हो सके. लेकिन यह भाषा हिंदी भाषी राज्यों में ही कितनी विकसित हो सकी, इसका आकलन पाठक स्वयं करें. ऐसा करने के लिए वे कोई भी ‘सरकारी हिंदी’ में लिखा गया दस्तावेज़ पढ़ सकते हैं.