वो चार जनवरी मुझे रह-रहकर याद आती है.

तय हुआ था कि चार तारीख़ को ही बम्बई में मिलना है और तीन की शाम बस पकड़कर चल दिया था मायावी नगरिया.

गुज़रे ज़माने की उस आलातरीन हरदिलअज़ीज़ अभिनेत्री से मुझे मिलना था. वो एक किताब लिख रही थीं, उस पर उनसे मशविरा करने का हक़ उन्होंने मुझे मेरी ज़हीन और दानिशमंद बातों से मुतास्सिर होकर दे दिया था. उस भरोसे से मैं भींज गया था.

तीन को ही उनकी सालगिरह थी. दो की रात ग्यारह बजकर पचपन मिनट पर विश करने की गरज से मैंने फ़ोन मिलाया था और अचरज कि फ़ोन इंगेज नहीं था. गजर ने जब बारह बजाए, तो मैंने सालगिरह की मुबारकबाद दी. एक अनौपचारिक शुक्रिया उधर से लौटकर आई.

तब मुझे महसूस हुआ कि एक सितारा जितना उजला, जितना दिलअफ़शा होता है, उतना ही वो अकेला भी होता है.

तीन और चार की दरमियानी रात मेरी आंखों में नींद कहां?

अभी सेंधवा गया, अभी धुळे, अभी नाशिक. राह के हर मोड़ पर नींद में छेद होते रहे. तड़के पांच बजे बस कल्याण जाकर रुकी तो फिर सोने का सवाल नहीं था.

पूरी रात धूजते हुए कटी थी किंतु बम्बई में घुसते ही तपिश का सा एहसास हुआ. बोरीवली में जाकर बस ने मुझे इमारतों के उस जंगल में छोड़ दिया. जूठे मुंह चाय पीकर मैं बेइरादा यहां-वहां देर तलक टहलता रहा, यह समझने की कोशिश करता कि यह सब सच है.

एक वक़्फ़े के बाद एक मददगार दोस्त को फ़ोन लगाया और ग़ुसल करने की ग़रज़ से अंधेरी में उसके फ्लैट पर जा पहुंचा.

मैं बासी बदन और गंधाती बग़लें लिए इतनी बड़ी एक्ट्रेस से मिलने नहीं जा सकता था.

अलस्सुबह का ही मैसेज: बम्बई पहुंच गए हो न?

जवाब: अंधेरी वेस्ट में हूं, वर्सोवा यहां से हाथभर की दूरी पर है. मैं किसी भी लम्हा पहुंच जाऊंगा.

मेरे पास पूरा पता था. वर्सोवा की उस बहुमंज़िला इमारत पहुंचकर मैंने मिलने वालों के रजिस्टर में नाम दर्ज किया और सीधे लिफ्ट में सवार हो गया. किसी ने मुझे रोका नहीं. मैंने मन ही मन सोचा, यह सब इतना आसान नहीं होना चाहिए, हरगिज़ नहीं, हरगिज़ नहीं.

काश के उस इमारत के बाहर नेज़े लिए सिपाही खड़े होते और मुझे वहीं पर रोक लेते तो मेरे दिल को सुकून मिलता, क्योंकि तब वो एक रवायत के मुताबिक़ होता न.

आठवें माले पर जाकर मैं उस फ्लैट के ऐन बाहर खड़ा था. वहां कोई नाम तख़्ती नहीं लगी थी. मैंने घंटी बजाई. अभिनेत्री ने दरवाज़ा खोला.

-तो तुम आ ही गए.

-जी, और मुझे किसी ने रोका भी नहीं.

यह उनसे मेरी आमने-सामने की पहली तकल्लुफ़ भरी बातचीत थी, जिनके लिए दर्जनों कविताएं लिख चुका था और जिनको लेकर सैकड़ों मनसूबे अपने मन में बांध चुका था.

जनवरी के उजास में नहाया चेहरा, जिसमें जहां-तहां झुर्रियां. कितनी बार उन्हें परदे पर देखा है, कितनी यादें हैं, कितनी शाइस्ता तमन्नाओं का सामान मेरे वास्ते वो चेहरा बना रहा था, कितने अरसे से. अब वो मेरे सामने थीं. एक दिन पहले ही उन्होंने अपना पैंसठवां जन्मदिन मनाया था, लेकिन चेहरे पर नूर था. पैंसठ की उम्र में तो हमारी मौसियां-काकियां ख़ासी बुढ़ा जाती हैं.

मैं भीतर दाख़िल हुआ. उस घर की हरेक चीज़ से जैसे मैं वाबस्ता था.

आबनूस का पियानो, ओह, बीस बरस पुरानी उस बारिश में यही फूल गया था न?

सलीब की पेंटिंग, ओह उस गिरजाघर के मलबे से यही सलीब बरामद हुई थी न?

सामने खिड़की के बाहर समंदर बेचैनी से करवटें बदल रहा था, यहीं न वो दलदल हुआ करता था, जहां सन पचासी में एक ऊंट धंसकर मर गया था और आपने उस पर अंग्रेज़ी में कविता लिक्खी थी.

तिस पर अभिनेत्री धीमे से बुदबुदाकर कहतीं:

-ओह तुम कितना कुछ जानते हो, कोई मेरा इंटरव्यू लेने आएगा तो तुम्हारे पास भेज दूंगी कि उसी से बात कर लो, उसे सब पता है.

लैपटॉप पर एक के बाद दूसरी वर्ड फ़ाइलें खुलती चली गईं, थकान के रेगिस्तान तक. इसी दरमियान बेबी कॉर्न और कैप्सिकम की इफ़रात से भरा ब्राउन राइस बुलवाया गया और ब्लैक कॉफ़ी पी गई. खाने के बाद मिलकर तश्तरियां धोई गईं. मैं यह सोचकर शर्म से भर गया था और उनका हाथ बंटाने चला गया था कि इतनी बड़ी एक्ट्रेस मेरी जूठी तश्तरी वॉश कर रही है.

-तुम्हें समंदर देखना है? वर्सोवा बीच बहुत गंदा है, तुम जुहू बीच चले जाओ.

-वही जुहू बीच न, जहां उस शाम चलते हुए आपने अंधेरे की वो तस्वीर भेजी थी?

-हां, हां, वही.

पांच जनवरी की सुबह लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स से ख़रीदी गई बहुत ही महंगी कपूचीनो कॉफ़ी कार में ही ढुलक गई, लेकिन उसे बुरा शगुन नहीं माना गया.

मढ आइलैंड पहुंचकर काम कम हुआ, तस्वीरें अधिक खींची गईं.

फ़िशिंग विलेज की सैर को निकले तो अंगुली के इशारे से बतलाया, देखो सुभाष घई का बंगला, सौदागर फ़िल्म की शूटिंग हमने यहीं पर की थी. इसके सामने मिथुन दादा रहते हैं. मुलुड में क़त्ल बहुत होते हैं, मढ में फ़िल्में बहुत शूट की जाती हैं. ये तमाम बंगले देख रहे हो न, ये फ़िल्मों की लोकेशन हैं.

जबकि मरी हुई मछलियों की गंध मेरे रोमकूपों में पैठ गई थी.

मढ रेज़ॉर्ट में पांच सितारा बैरे ने बड़ी बेरुख़ी से कहा, सी-फ़ेसिंग चेयर्स पर बैठकर चाय पीने का एक्स्ट्रा पैसा लगेगा. अभिनेत्री ने कहा, कोई परवाह नहीं.

मैं पेशाब करने गया तो किसी ने रोककर कहा, तुम्हारे साथ ये कोई बड़ी सेलेब्रिटी हैं न. मैंने कहा, जी हां.

मलाड में लालबत्ती पर गाड़ी रुकी तो एक मध्यवर्गी महाराष्ट्रीयन किशोरी ने तर्जनी के इशारे से आई को बतलाया: वो देखो, फलां फिल्म की हीरोइन.

लौट आने के बावजूद वर्सोवा और मढ की बालू मेरे जूतों और जुराबों में देर तक बनी रही थी, मेरे तलुओं को चुभती हुई.

बम्बई में मेहमान था, चंद रोज़ बाद इंदौर में मेज़बान बनने का मौक़ा मिला, जब वो एक प्ले करने मेरे शहर आईं.

जिस हॉल में उनका प्ले होना था, उसके दरवाज़े पर मुझे रोक दिया गया. टिकट मेरे पास था नहीं, और स्पेशल एंट्री पास भीतर ही मेरा इंतेज़ार कर रहा था. मुझे भीतर जाने की इजाज़त नहीं थी, और तब मैं मन ही मन मुस्करा दिया.

नेज़े वाले सिपाही आख़िरकार अपनी सही जगह पर पहुंचकर हरकत में आ गए थे और अब सबकुछ ठीक था. सबकुछ वैसा, जैसा होना चाहिए था.

ज़िंदगी इसलिए हसीन है, क्योंकि वो इस तरह के अफ़सानों का एक अलबम है.

मेरी वो ख़ूब अज़ीज़ अदाकारा अपनी ज़िंदगी की कहानी जब लिखकर पूरी कर लेंगी, उसके बाद मैं अपनी ज़िंदगी की दास्तान लिक्खूंगा, जिसमें तीन, चार और पांच जनवरी, दो हज़ार सत्रह के उन तीन दिनों के लिए एक पूरा चैप्टर मेहफ़ूज़ रहेगा.

और वो उसकी नायिका होंगी. हमेशा की तरह.