लगभग 13 वर्ष पहले 26 अगस्त, 2006 को उज्जैन के माधव कॉलेज में राजनीति-विज्ञान के प्रोफेसर हरभजन सिंह सभरवाल के साथ एक पार्टी विशेष से जुड़े छात्र संगठन ने बदसलूकी और मारपीट की. इस दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई. प्रो सभरवाल के दो सहयोगियों प्रो नाथ और प्रो मित्तल के साथ भी छात्रों ने मारपीट कर उनके मुंह पर काला रंग पोत दिया था. इनमें से प्रो नाथ इतने घायल हो गए थे कि उन्हें इंदौर के एक बड़े अस्पताल में ले जाना पड़ा था. ये सारे शिक्षक छात्र संघ चुनाव की प्रक्रियाओं से जुड़े थे. पुलिस ने इस मामले में जिन छात्रों को अभियुक्त बनाया उन्हें नागपुर की अदालत ने 2009 में बरी कर दिया. मामला अब भी संभवतः सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है. प्रो सभरवाल की हत्या के मुख्य आरोपियों में से रहे एक छात्र विमल तोमर ने ग्वालियर में नवंबर 2011 में जहर खाकर आत्महत्या कर ली.

नौ मार्च, 2011 को उसी दल विशेष (यही दल अभी केन्द्र और ज्यादातर राज्यों में सत्ता में है) से जुड़े छात्र संगठन के सदस्यों ने खंडवा के भगवंत राव मंडलोई कृषि महाविद्यालय के एक प्रोफेसर सुंदर सिंह ठाकुर के साथ हाथापाई की. इसके बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और तीन दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई. प्रो ठाकुर अपने एक सहयोगी प्रो अशोक चौधरी को बचाने गए थे जिनके मुंह पर ये छात्र काला रंग पोत रहे थे. 22 फरवरी, 2017 को इसी छात्र संगठन के विद्यार्थियों ने दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर प्रशांत चक्रवर्ती के साथ इस कदर मारपीट की कि उनकी जान जाते-जाते बची.

26 जून, 2018 को इसी छात्र संगठन के सदस्यों ने गुजरात स्थित कच्छ विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव के प्रभारी प्रोफेसर गिरीन बख्शी के मुंह पर काली स्याही पोतकर उन्हें पूरे कॉलेज परिसर में घुमाया. ठीक एक साल पहले मंदसौर के एक डिग्री कॉलेज के प्रो डीसी गुप्ता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ था जिसमें वे इसी छात्र संगठन के छात्रों के पैर पकड़-पकड़कर माफी मांगते और गिड़गिड़ाते देखे गए थे.

इसी तरह जुलाई, 2017 में एक दूसरी राष्ट्रीय पार्टी से जुड़े छात्र संगठन की एक छात्रा ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन के दौरान राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रो रामनारायण शर्मा को थप्पड़ मार दिया. इस साल जुलाई में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के नोबोग्राम हीरालाल पॉल कॉलेज के प्रोफेसर सुब्रतो चट्टोपाध्याय पर एक अन्य छात्र संगठन के छात्रों ने हमला कर दिया, क्योंकि वे उन छात्रों को बचाने गए थे जिनसे जबर्दस्ती कहा जा रहा था कि वे राज्य के मुख्यमंत्री और उनके दल की जयकार करने वाले नारे लगाएं. 12 साल पहले जब इसी प्रदेश में किसी अन्य पार्टी की सरकार थी, तब भी सत्ताधारी पार्टी से संबंध रखने वाले छात्र-संगठन के सदस्यों ने मालदा के कलियाचक कॉलेज के अध्यापक राजेन हेम्ब्रम के साथ मार-पीटकर उन्हें गंभीर रूप से जख्मी कर दिया था. राजेन हेम्ब्रम ने इन छात्रों को परीक्षा में नकल करने से रोका था.

इसी महीने केरल उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश पीके शम्सुद्दीन ने राज्य सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केरल के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ‘टॉर्चर रूम्स’ या ‘यातना कक्ष’ होते हैं जिनमें वहां के राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठन उन छात्रों का उत्पीड़न करते हैं जो उनकी राजनीति के हिसाब से नहीं चलते. केरल से भी शिक्षकों पर हमलों की खबरें आती रही हैं.

लेकिन सबसे हाल की जो घटना राष्ट्रीय समाचारों में छाई रही है, वह है कोलकाता के यादवपुर विश्वविद्यालय में यादवपुर विश्वविद्यालय में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ छात्रों द्वारा हुई धक्का-मुक्की और दुर्व्यवहार की. यह घटना अब दलों और सरकारों के आपसी राजनीतिक दोषारोपण का शिकार होकर हमेशा की तरह मूल मुद्दे से भटक चुकी है, इसलिए इस पूरी परिघटना पर साफ नज़रिए से सोचने की जरूरत होगी.

बहुत पहले से भारत के छात्र गुस्से और तनाव में रहे हैं. लेकिन पिछले दो दशकों में यह तनाव और आक्रोश और भी बढ़ता गया है. यही हाल विश्वविद्यालयों के प्रशासकों और शिक्षकों का भी है. इन तीनों के बीच का संबंध इतना संकीर्ण, टकरावपूर्ण और द्वेषपूर्ण हो चुका है कि पूरी शिक्षा-व्यवस्था ही अपने उद्देश्य से भटक चुकी लगती है. और यह तब है जब हमारे यहां शिक्षा की गुणवत्ता पहले ही बहुत अच्छी नहीं थीं.

निजी विश्वविद्यालयों की भरमार होने के बाद से प्रशासक, शिक्षक और शिक्षार्थी का संबंध अधिकारी, सेवा-प्रदाता और उपभोक्ता का-सा होता गया है. यहां के शिक्षक निहायत ही डरे हुए कर्मचारी की तरह व्यवहार करते हैं और उनका ज्यादातर समय प्रशासकों के अहं को तुष्ट करने में ही जाता है. प्रशासक प्रायः अपने संस्थान या विश्वविद्यालय की छवि और छात्रों की संख्या को लेकर चिंतित रहते हैं और इसलिए अपने पीआरओ के जरिए स्थानीय मीडिया संस्थानों को विज्ञापन देकर तुष्ट करने में और प्रचार कराने में लगे रहते हैं. जब जो भी पार्टी सत्ता में होता है वे उसे प्रसन्न करके कुछ सुविधाएं और छूट लेने के चक्कर में होते हैं.

वहीं सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रकट रूप से दलगत राजनीति का खुला-खेल चलता है. कुलपति, रजिस्ट्रार, डीन और विभागाध्यक्ष की नियुक्ति से लेकर अब तो शिक्षकों तक की भर्ती में दलगत राजनीति हावी होती है. इसकी चर्चा हम पहले भी एक लेख में कर चुके हैं. लेकिन सबसे हास्यास्पद स्थिति दलीय आधार पर बने छात्र संगठनों की है. अब तो ये कॉलेज से पहले की शिक्षा के स्तर पर ही अपनी पैठ बनाने लगे हैं. किशोरवय उम्र के छात्र अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टी के शीर्ष नेताओं के लठैत बने फिरते हैं.

आज विश्वविद्यालय का नौजवान केवल अपनी दलगत निष्ठा को साबित करने के लिए राजनेताओं के अनुचित कृत्यों को सही साबित करता है. खुद उनके जयकारे लगाता है और दूसरों को भी ऐसा करने पर बाध्य करने के लिए हिंसा और भय का सहारा लेता है. राजनेता इन भोले नौजवानों का इस्तेमाल अपने मोहरों और प्यादों के रूप में कर रहे हैं. और ऐसा करने के लिए छात्र-संघ चुनावों के दौरान प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर तक के नेता विश्वविद्यालय कैंपस के चक्कर लगाते नज़र आते हैं.

1971 में गुलज़ार द्वारा निर्देशित फ़िल्म मेरे अपने के दो युवा किरदार श्याम और छेनू इसी दलगत राजनीति का शिकार होकर आपस में लड़ते-मरते हैं और दुःख भोगते हैं. आज भी भारत में करोड़ों श्याम और छेनू इसी दलगत राजनीति की भेंट चढ़ रहे हैं. उनकी सहजता समाप्त हो रही है. दलवादी अंधता इन छात्रों की सत्य को स्वीकार करने की क्षमता खत्म कर देती है. किसी भी विषय-वस्तु को खासकर सामाजिक मुद्दों को उसकी संपूर्णता में देखने की उनकी दृष्टि इतनी दूषित हो जाती है कि वे कट्टर और उन्मादी की तरह व्यवहार करने लगते हैं. निरपेक्ष सत्यान्वेषण तो वे क्या ही कर पाएंगे, धीरे-धीरे वे निहायत ही भीरू, असुरक्षित,परमुखापेक्षी और भीड़वादी, बनने लगते हैं.

बहुत पहले विनोबा भावे ने अपनी पुस्तक ‘शिक्षण-विचार’ में लिखा था - ‘विद्यार्थी जब आज यूनियन बनाते हैं, तो हमें बड़ा आश्चर्य होता है. यूनियन तो भेड़ों का होता है, शेरों का नहीं. विद्यार्थियों को भेड़ नहीं शेर बनना चाहिए. ...यह ठीक है कि राजनीति का मैं चिंतन करूंगा, विचार करूंगा. लेकिन अपना मत पक्का नहीं बनाऊंगा. ...इसका मतलब यह नहीं कि आपस में सहयोग नहीं होना चाहिए. सेवा के लिए सहयोग की जरूरत होती है. पर यूनियन ढांचे में ढालने वाला होता है…आज तक हर हुकूमत (स्टेट) की यह कोशिश रही है कि बने-बनाए विचार विद्यार्थियों के दिमाग में ठूंस दिए जाएं, फिर चाहे वह स्टेट सोशलिस्ट (समाजवादी) हो, कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) हो, कम्यूनलिस्ट (सांप्रदायिकतावादी) हो या और भी कोई ईष्ट या अनिष्ट हो.’

आज भारत के विश्वविद्यालयों में ज्ञान की संस्कृति लुप्तप्राय हो चुकी है. छात्र अपनी स्वतंत्रबुद्धि और अस्मिता खोते जा रहे हैं. स्वाध्याय और स्वतंत्र-चिंतन के जरिए विश्वमानुष बनने के बजाय वे संकीर्णबुद्धि वाले दलीय मोहरे बनते जा रहे हैं. ऐसे युवा कैसे देश और समाज का निर्माण करेंगे! जैसे ही इस विषय पर बात करने की कोशिश होती है तो इसे छात्रों को अराजनीतिक बनाने का प्रयास कहकर खारिज करने की कोशिश होने लगती है. जी नहीं, बात है छात्रों को दलीय चंगुल से अलग शुद्ध राजनीतिक बनाने की. जिस दिन ये युवा शुद्ध रूप से राजनीतिक होकर हर प्रकार के दलीय संगठनों और सरकारों से समाज और व्यवस्था से जुड़े मौलिक प्रश्न पूछने लगेंगे, उस दिन तमाम भ्रष्ट व्यवस्थाओं की चूलें हिल जाएंगी. अब कौन सा दल या सरकार चाहेगी कि ऐसा हो. इसलिए बने-बनाए विचार इन विद्यार्थियों के मन में ठूंस दिए जाते हैं. फिर ये छात्र आपस में ही लड़ने-मरने लगते हैं. छुरी-चाकू और बम-बंदूक तक चलने लगते हैं. उधर दलों और सरकारों में बैठे इनके आका और काका मूंछों पर ताव देते हुए कुटिल हंसी हंसते रहते हैं.

सहानुभूतिपूर्वक सोचने पर इस पूरी परिघटना का ठीकरा विद्यार्थियों के सिर फोड़ना भी उनके साथ अन्याय जैसा लगता है. कारण कि बचपन से ही ज्यादातर बच्चों की परवरिश जिस तरह से हो रही है, उसमें उनकी सहजता और आत्मविश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाता है. इसके बाद वे उधार के विचारों से लैस भीड़ और समूह का हिस्सा बन बन जाते हैं. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रशासन और शिक्षकों के स्तर पर जो राजनीति चलती है, उससे फिर वे अछूते नहीं रह पाते हैं. इस वजह से शैक्षणिक वातावरण प्रभावित होता है और दूसरे छात्र भी इसके ताप में झुलसने लगते हैं.

इन बच्चों में ऊर्जा का अभाव तो होता नहीं, लेकिन तरह-तरह के भटकावों के चलते वह सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों में नहीं लग पाती. उल्टा जाति, पंथ, क्षेत्र, भाषा और न जाने कितने ही विखंडनकारी विचार और पूर्वाग्रह उनके मन में बैठा दिये जाते हैं. फिर अलग-अलग दलों से जुड़े ये छात्र बिल्कुल दलीय नमूनों की तरह व्यवहार करने लगते हैं.

आज छात्र-शक्ति अपने आप में कोई स्वतंत्र-शक्ति नहीं है. इसलिए इनके द्वारा किए जा रहे महत्वपूर्ण आंदोलनों को भी अमुक दल का षड्यंत्र कहकर या राष्ट्र-विरोधी तक कहकर खारिज कर दिया जा रहा है. आगे ये छात्र अपनी परिस्थितियों और मनोदशाओं की वजह से और भी उग्र हो सकते हैं. पीआर एजेंसियों के प्रचारवादी अभियानों के जरिए काम कर रहे दल और सरकारें ब्रेन-वाशिंग के जरिए इन्हें और भी उग्र बना सकती हैं.

हालिया प्रकरण में खुद को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत कर रहे केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो ने अपने बाद के ट्वीट में उनके बाल खींचने वाले छात्र को अभयदान तो दे दिया, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि ‘वह छात्र जल्दी ही अपनी दिमागी बीमारी से उबरे’ (गेट वेल सून). मंत्री महोदय भूल गए कि हमारे छात्रों की यह दिमागी बीमारी इसी दलवादी राजनीति की उपज है. बात बस इतनी है कि इस बार यह उन पर भारी पड़ गयी तो उनसे अपनी पीड़ा और अपना द्वेष छिपाया न गया. बल्कि इसका भी राजनीतिक फायदा लेने की जुगत में इसे और नाटकीय रंग दे दिया गया.

एक जन-प्रतिनिधि और सरकार का मंत्री जब अपने ही छात्रों को दलीय नफे-नुकसान के आधार पर शर्मसार करने लगे या उनका बचाव करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था, शिक्षक और शिक्षार्थी इस दलवादी राजनीति की इस कदर भेंट चढ़ चुके हैं कि इस पर कोई स्वस्थ बहस भी दूर-दूर तक संभव नहीं दिखाई देती है.