पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ चल रही शांति वार्ता रोक दी. उन्होंने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में तालिबान द्वारा किए गए एक हमले को इसकी वजह बताया. इस हमले में एक अमेरिकी सैनिक सहित 12 लोगों की मौत हो गई थी. इससे पहले अमेरिका की ओर से राजनयिक जलमय खलीलजाद तालिबान के साथ नौ दौर की वार्ता कर चुके थे. बीते महीने यह वार्ता एक समझौते पर भी पहुंच गयी थी जिसकी घोषणा जल्द होने वाली थी.

भले ही डोनाल्ड ट्रंप का कहना हो कि तालिबान से चल रही बातचीत हमेशा के लिए दफन हो चुकी है, लेकिन, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने संकेत दिए हैं कि तालिबानी नेताओं के साथ बातचीत दोबारा हो सकती है. एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘मैं निराशावादी नहीं हूं. मैंने तालिबान को वह कहते और करते देखा है जिसकी पहले उससे उम्मीद नहीं की जा सकती थी.’ पोंपियो ने आगे कहा, ‘मैं उम्मीद करता हूं कि इस मामले पर तालिबान अपने बर्ताव में बदलाव लाएगा और उन बातों पर दोबारा प्रतिबद्धता जताएगा जिन पर हम कई महीनों से बात कर रहे थे.’

माइक पोंपियों के अलावा विदेश मामलों के कई जानकार भी कहते हैं कि अमेरिका जल्द ही तालिबान के साथ बातचीत फिर से शुरू कर सकता है. ये लोग ऐसा होने के पीछे कई कारण भी बताते हैं. इसकी पहली वजह यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में वादा किया था कि वे अगले चार सालों में अमेरिकी फ़ौज को अफगानिस्तान से वापस निकालेंगे. अमेरिका में अगले साल ही फिर राष्ट्रपति चुनाव है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप फिर मैदान में हैं. यही वजह है कि उन पर इस चुनाव से पहले ही अफगानिस्तान से निकलने का दबाव है.

बातचीत रुकने के बाद अमेरिका की ओर से कहा गया है कि वह अब तालिबान के खिलाफ अपने हमलों में तेजी लाएगा. लेकिन कुछ अमेरिकी पत्रकार कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से लेकर अमेरिका का रक्षा विभाग पेंटागन भी इस बात को अच्छे से जानता है कि इससे उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला है. इनके मुताबिक इस समय 14,000 अमेरिकी सैनिकों के जरिये तालिबान को शिकस्त देना नामुमकिन है. अमेरिका और नाटो की सेना तब भी इस संगठन का मुकाबला नहीं कर पाई थीं, जब उसका कब्जा अफगानिस्तान के 15 फीसदी हिस्से पर ही था. उस वक्त एक लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात थे.

अगर अमेरिका बातचीत न करके जंग जारी रखता है तो डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक मुसीबत और भी है. दरअसल, तालिबान ने कहा है कि अब वह अमेरिकी और अफगानी फ़ौज के खिलाफ अपने हमले में और तेजी लाएगा. जाहिर है कि वह अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए अब विशेष रूप से अमेरिकी फौजियों को निशाना बनाएगा. इसका नतीजा यह होगा कि आने वाले समय में ज्यादा अमेरिकी सैनिक अपनी जान गंवाएंगे. कुछ ही समय में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और उस वक्त इसका सीधा ठीकरा डोनाल्ड ट्रंप के सर पर फोड़ा जाएगा. इसका उन्हें चुनाव में नुकसान होना तय है.

कुछ जानकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक अगर डोनाल्ड ट्रंप अपना चुनावी वादा पूरा करने के लिए तालिबान से बिना समझौता किए ही अमेरिकी फौज को वापस बुलाते हैं तो यह स्थिति भी उनके और अमेरिका के आगे परेशानियां खड़ी कर देगी. इससे दुनिया भर में अमेरिका की साख को भारी नुकसान होगा. अफगान सरकार अमेरिका के समर्थन से चल रही है, ऐसे में अफगान सरकार को इस तरह बीच मंझधार में छोड़ने के बाद आगे कोई भी देश अमेरिका पर भरोसा नहीं करेगा.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के कई पूर्व अधिकारियों का मानना है कि बिना समझौते के अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद वहां गृहयुद्ध छिड़ना स्वाभाविक है. तालिबान अब इतना ताकतवर हो चुका है कि अमेरिका के वहां से निकलने के बाद, वह वर्तमान अफगान सरकार को चंद दिनों में ही हटाकर वहां पर अपना कब्जा जमा लेगा. इसका नतीजा यह होगा अफगानिस्तान फिर अमेरिका सहित दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन जाएगा क्योंकि फिर इसे अलकायदा जैसे संगठनों की शरणस्थली बनने से कोई नहीं रोक सकेगा.

अफगानिस्तान मामलों के जानकार कहते हैं कि यह स्थिति वैसी ही होगी जैसी 2001 के पहले थी, तब तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सरकार बना ली थी और अलकायदा जैसे संगठनों के लिए यह देश स्वर्ग बन गया था. उस समय अमेरिका को ही 11 सितंबर के आतंकी हमले के रूप में इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. इन जानकारों के मुताबिक अफगानिस्तान में दोबारा ऐसी स्थिति न बने इसीलिए अमेरिका 18 साल से वहां लड़ रहा है. अब अगर डोनाल्ड ट्रंप अफगानिस्तान से सेना को बिना किसी समझौते के वापस बुलाते हैं तो इसके पूरी दुनिया पर असर को समझना मुश्किल नहीं है.

यानी साफ है कि वर्तमान परस्थितियां ऐसी हैं जिनमें अमेरिका अफगानिस्तान में न तो लड़कर और न ही पीछे हटकर कुछ हासिल कर सकेगा. अब वह केवल और केवल तालिबान से बातचीत के जरिये ही अफगानिस्तान का एक अच्छा हल ढूंढ सकता है.

जर्मन न्यूज़ एजेंसी डायचे बेले के अफगानिस्तान मामलों के विशेषज्ञ फ्लोरियन वीगैंड अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि अगर तालिबान के नजरिये से देखें तो वह भी जल्द अमेरिका से बातचीत करना चाहता है. फ्लोरियन वीगैंड की मानें तो यह आतंकी संगठन भी 18 साल से लड़ते हुए अब थक चुका है. साथ ही उसे यह भी पता है कि उसने भले ही अफगानिस्तान के 60 फीसदी से ज्यादा हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया हो, लेकिन जब तक अमेरिकी फ़ौज अफगानिस्तान में मौजूद है वह किसी कीमत पर वहां की सत्ता पर कब्जा नहीं कर सकता. यही वजह है कि तालिबान अब हर हाल में अमेरिका से बातचीत करके इस मामले को हल करना चाहता है. बातचीत टूटने के बाद इस संगठन ने कहा भी है कि वार्ता करने के लिए उसके दरवाजे हमेशा खुले हैं. अमेरिका के साथ बातचीत के लिए तालिबान के मुख्य वार्ताकार शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई ने हाल में ही यह बात कही है.