भाजपा सरकार के दूसरी बार सत्ता में आने के कुछ दिनों बाद ही एक विवाद सुर्खियों में आया था जो वित्त मंत्रालय में होने वाली प्रेस कान्फ्रेंसों से संबंधित था. वित्त मंत्रालय कवर करने वाले पत्रकारों का आरोप यह था कि उनसे कहा गया कि मंत्रालय में होने वाली प्रेस कान्फ्रेंस में वे सवाल नहीं पूछ सकते. खैर, यह विवाद तो आया-गया हो गया, लेकिन पिछले कुछ दिनों से वित्त मंत्री की प्रेस कान्फ्रेंसों के ही चर्चे हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में निर्यात, रियल एस्टेट से लेकर कॉरपोरेट जगत के लिए कई घोषणाएं की हैं. ये घोषणाएं बताती हैं कि मोदी सरकार ने आधिकारिक तौर पर मंदी की बात भले न मानी हो लेकिन वह इससे निपटने के लिए फिलहाल फायर फाइटिंग मोड में है.

इन सबमें एक और खास बात यह है कि बजट के बाद जब उसके कुछ प्रावधानों पर सवाल उठे थे और उनके वापस लिए जाने की मांग की गई थी तो वित्त मंत्रालय ने इन्हें लगातार खारिज किया था. जैसे बजट में सुपर रिच टैक्स जैसे प्रावधानों के बाद जब शेयर बाजार गिरने लगा था और मांग की जा रही थी कि इससे विदेशी निवेशकों को बाहर किया जाए तो वित्त मंत्री ने इससे साफ इनकार कर दिया था.

लेकिन, जैसे-जैसे मंदी से जुड़ी सुर्खियां बढ़ने लगी वैसे-वैसे सरकार का रूख बदलने लगा. खुद को ‘रोल बैक’ सरकार कहलाने से परहेज करने वाली मोदी सरकार अब हर बार की अपनी घोषणा में बजट के कुछ न कुछ प्रावधानों में ढील दे रही है या उन्हें वापस ले रही हैं. पहले कॉरपोरेट जगत के लिए सख्त रवैया अपनाया गया लेकिन, इसके थोड़े दिन बाद ही नए प्रोत्साहन पैकेजों का दौर शुरु हो गया. वित्त मंत्री की हर प्रेस कान्फ्रेंस मिनी बजट जैसी रही. आर्थिक विशेषज्ञ मजाक में अब यहां तक कहने लगे हैं कि जून से अब तक मोदी सरकार पांच बजट ला चुकी है और असली वाले बजट को शीर्षासन करा दिया गया है.

नीतियों पर फैसले लेने का अधिकार हर सरकार को है, इससे किसको इनकार हो सकता है. लेकिन सवाल यह है कि बजट में जो घोषणायें की गई थीं या जो नीतिगत सोच रखी गई थी, वह इतनी जल्दी क्यों बदलने लगी? इसका जवाब यही हो सकता है कि अर्थव्यवस्था मेें मंदी जैसे हालात के कारण सरकार को अपनी सोच और नीतियों की दिशा बदलनी पड़ी. लेकिन मंदी तो पिछले साल से ही दस्तक दे रही थी. ऐसे में उसने पहले तो सुपर रिच टैक्स जैसी घोषणा ही क्यों की? जो अब किया जा रहा है, वह बजट में क्यों नहीं किया? और सुपर रिच टैक्स को निवेशकों के लाखों करोड़ रूपये डूबने से पहले ही क्यों नहीं हटाया? क्या पहले मोदी सरकार मंदी को गंभीरता से नहीं ले रही थी? अगर प्रोत्साहन पैकेज, कर में छूट जैसे घोषणायें बजट में ही कर दी जातीं तो शायद अब तक इनका कुछ फायदा मिलना शुरु भी हो गया होता. फिलहाल तो मंदी के चलते बाजार के सेंटीमेंट्स ऐसे हो चुके हैं कि इनका कितना असर होगा, कहना मुश्किल है. ऊपर से इनमें से कई सही दिशा में जाते हुए भी नहीं दिख रहे हैं. यानी देर से आने के बाद भी सरकार पूरी तरह से दुरुस्त नहीं आ पाई है.

मंदी से निपटने के लिए सरकार ने जो घोषणाएं की हैं उनमें सबसे ज्यादा चर्चा में है कॉरपोरेट टैक्स में एकमुश्त कटौती. यह एक ऐसी घोषणा हैं, जिसने खुद कॉरपोरेट जगत को भी चौंका दिया है. कॉरपोरेट टैक्स कम करने की मांग बहुत पुरानी है. लेकिन वह मंदी के समय में की जाएगी इसकी उम्मीद तो कंपनियों को भी नहीं थी. इसकी वजह यह है कि सरकार की स्थिति राजस्व वसूली के मोर्चे पर पहले से ही काफी पतली है.

यह फैसला इसलिए भी चौंकाता है क्योंकि बजट पेश करते समय सरकार को अपना राजस्व बढ़ाने की इस कदर चिंता थी कि अमीरों पर सुपर रिच टैक्स लगा दिया. जबकि इससे उसे सिर्फ कुछ हजार करोड़ रुपयों की ही आय होने वाली थी. लेकिन, चार महीने में ही सरकार का रवैया ऐसा बदला कि विदेशी निवेशकों पर सुपर रिच टैक्स तो खत्म किया ही, एक ही झटके में कॉरपोरेट टैक्स की दर भी सीधे 30 से 22 फीसदी कर दी. इस घोषणा से सरकार के राजस्व में सीधे-सीधे एक लाख पैंतालीस हजार करोड़ रुपयों की कमी आएगी. यानी राजस्व को लेकर सरकार की धारणा 180 डिग्री पर घूम गई है. नीतिगत सोच के इतनी तेजी से बदलने की वजह से आर्थिक जानकार सवाल उठा रहे हैं कि या तो बजट पेश करते समय अर्थव्यवस्था में मंदी के बारे में ठीक से नहीं सोचा गया था या अब बिना सोचे-समझे फैसले लिए जा रहे हैं?

फिलहाल कॉरपोरेट टैक्स में कमी की घोषणा ने कंपनियों और शेयर बाजार को तो खुश कर ही दिया है. इस घोषणा के बाद काफी दिनों से मंथर गति से चल रहा सेंसेक्स एक ही दिन में 1900 से ज्यादा अंक उछल गया. शेयर बाजार भी अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतकों में से एक होता है. फिलहाल मंदी को लेकर आलोचना झेल रही सरकार को इस बदले सेंटीमेंट्स से काफी राहत मिली होगी. लेकिन, अर्थव्यवस्था जिन वजहों से मंदी का सामना कर रही है क्या उन मोर्चों पर इस वजह से कोई दीर्घकालिक मदद मिलने वाली है?

आर्थिक जानकार कहते हैं कि मौजूदा समय में भारत में मंदी की जो वजह है, वह है खपत का कम होना. बाजार में उत्पादन तो पर्याप्त है, लेकिन, लोग खरीददारी नहीं कर रहे हैं. इसीलिए ऑटो से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं तक की बिक्री लगातार कम हो रही है. आर्थिक जानकारों का मानना है कि फिलहाल सरकार को ऐसे उपाय करने चाहिए थे, जिससे उपभोक्ताओं के हाथों में पैसे आता. लेकिन, उसने कॉरपोरेट टैक्स कम करके इस समय कंपनियों को राहत दी है, उपभोक्ताओं को नहीं. इससे बाजार में बिक्री बढ़ेगी इसकी संभावना बहुत ज्यादा नजर नहीं आती.

ऑटोमोबाइल सेक्टर के जानकार अमित जैन कहते हैं कि सरकार अगर कॉरपोरेट टैक्स घटाने के बजाय कारों या अन्य चीजों पर जीएसटी घटा देती तो उनकी कीमतें घटती और तब उसका बाजार पर ज्यादा असर पड़ता. अकादमिक आर्थिक जानकारों का भी एक खेमा मानता है कि सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स घटाने का फैसला गलत समय पर लिया है. इस समय सरकार को ऐसे कदम उठाने चाहिए थे जिससे चीजों की कीमतें घटतीं. या फिर उसे आयकर में कटौती या निवेश-बचत पर लाभ की घोषणा करनी चाहिए थी. इससे कम से कम मध्यम वर्ग और वेतनभोगी वर्ग में एक उम्मीद बंधती. और वे अपना खर्च बढ़ाने के बारे में सोचते.

निवेश सलाहकार पंकज गोयल कहते हैं कि सरकार ने कंपनियों को यह लाभ इसलिए दिया है क्योंकि वह चाहती है कि कंपनियां अपना निवेश बढाएं. पंकज के मुताबिक, कॉरपोरेट टैक्स कम होने से कंपनियों की बैलेंसशीट सुधरेगी और वे बाजार में निवेश करेंगी, जिससे नए अवसर सामने आएंगे और लोगों को रोजगार मिलेगा. जो आखिरकार मंदी के दुष्चक्र को तोड़ेगा. लेकिन, अर्थशास्त्र के शोधार्थी आशीष चौरसिया पंकज की इस बात से सहमत नहीं दिखते. वे कहते हैं, ‘बाजार में कंपनियां निवेश तब करती हैं, जब उन्हें लाभ की संभावना दिख रही होती है. फिलहाल कंपनियां अति-उत्पादन से परेशान हैं. उनके बाजार में मौजूद उत्पाद नहीं बिक रहे हैं तो वे नया निवेश क्यों करेंगी?’ आशीष आगे कहते हैं, ‘ हां, इससे कंपनियों का मुनाफा जरूर बढ़ जाएगा. आने वाली तिमाही में कंपनियों के रिजल्ट थोड़े बेहतर हो जाएंगे और उनके शेयर्स अच्छे रहेंगे. लेकिन, जब लोगों की आय और रोजगार पर फर्क नहीं पड़ेगा तो बाजार में कैसे तेजी आएगी.’

अवध विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर एनसी तिवारी कॉरपोरेट टैक्स कम होने के एक दूसरे पहलू पर बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘इसकी मांग तो बहुत लंबे समय से की जा रही थी क्योंकि दुनिया के कई देशों में कम कॉरपोरेट टैक्स के कारण कंपनियां वहां निवेश कर रही है. इस लिहाज से तो यह काफी दिनों से लंबित सुधार है.’ लेकिन प्रोफेसर प्रोफेसर तिवारी के मुताबिक ऐसा करना इस वक्त सही नहीं है क्योंकि ‘कॉरपोरेट टैक्स में कटौती के बाद पूरी संभावना है कि सरकार का राजस्व घाटा बेलगाम हो जाए और आज जो शेयर बाजार खुशी में उछल रहा है, वही राजकोषीय घाटा बढ़ने पर फिर लुढ़क जाए. कॉरपोरेट टैक्स में कमी सिद्धांत के तौर पर सही है, लेकिन फिलहाल यह गलत समय पर उठाया गया गलत कदम हो गया है.’

यानी राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखना अब एक नई समस्या होगा. क्योंकि वैसे ही सरकार को अब तक तय लक्ष्य से काफी कम राजस्व प्राप्त हुआ है. ऊपर से कॉरपोरेट टैक्स में कटौती के बाद सरकार ने राजकोषीय घाटा 3.3 फीसद रखने का जो लक्ष्य रखा है, वह पूरा होगा इसकी संभावना भी अब न के बराबर है.

अब आसान कर्ज की बात. सरकार आसान कर्ज देने को बतौर मुहिम शुरु करना चाहती है. लेकिन, क्या यह वाकई में उतना फर्क डालने में सक्षम होगा जितना सरकार सोच रही है. आर्थिक जानकारों का मानना है कि असंगठित क्षेत्र के उद्योगों को आसान कर्ज की जरूरत हमेशा रहती है, लेकिन इस समय कर्ज से ज्यादा उनकी दूसरी जरूरतें हैं, जिन्हें सरकार ठीक से समझ नहीं पा रही है. मेरठ के एक लघु उद्यमी सत्य प्रकाश शर्मा कहते हैं कि सरकार को कर्ज बांटने से ज्यादा ध्यान कारोबार को आसान करने में लगाना चाहिए. उनका कहना है कि आसान कर्ज के बाद भी अगर अनौपचारिक सेक्टर पर सरकारी डंडा चलेगा तो काम में क्या तेजी आएगी?

इसके अलावा भी कर्ज बांटने में तेजी के निर्देश तो दे दिए गए हैं, लेकिन जमीन पर बैंक क्या इसके लिए तैयार हैं. सिंडीकेट बैंक के एक बड़े अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘सरकार एक तरफ आसान कर्ज देने के निर्देश दे रही है, दूसरी तरफ बैंकों के मर्जर की घोषणा कर दी गई है. ऐसे में मर्जर से जुड़े काम देखे जाएंगे या कर्ज बांटे जाएंगे.’ वे कहते हैं कि मर्जर की घोषणा के बाद कर्मचारियों को अपनी नौकरी पर संकट दिख रहा है और आने वाले महीनों में तो जब-तब बैंक हड़ताल भी होती रहेंगीं.

कुछ आर्थिक जानकार यह भी मानते हैं कि कर्ज देने के साथ सरकार को बचत को भी प्रोत्साहित करना चाहिए. एफडी या किसान विकास पत्र जैसी योजनाओं में ब्याज दरें बढ़ानी चाहिए लेकिन इसके उलट उन पर ब्याज कम हो रहा है क्योंकि बैंकों पर लगातार कर्ज सस्ते करने का दबाव है. इसके अलावा खपत तब बढ़ेगी, जब आम उपभोक्ता कर्ज लेनेे और उसे खर्च करने में तेजी दिखाएंगे. केवल कारोबारियों को सस्ते कर्ज देने से बात पूरी तरह नहीं बनने वाली.

डीलर्स को ट्रैक्टर्स की एक्सेसरीज सप्लाई करने वाले अभिषेक जैन कहते हैं, ‘सरकार भले ही नोटबंदी जैसे कदमों को काला धन के खिलाफ लड़ाई बताए, लेकिन इससे बहुत बड़ा नुकसान ये हुआ है कि छोटे कारोबारियों के पास एक ऐसी रकम होती थी जो अनएकाउंटेड भले हो, लेकिन वह कारोबार में ही लगी रहती थी. नगद पैसे के उस प्रवाह से लोग अपना काम बढ़ा लेते थे. ज्यादा प्रोडक्शन कर लेते थे, ज्यादा कारीगर रखते थे. लेकिन, अब तो जितनी डिमांड होती है उतना ही काम करते हैं. कारीगर घटा दिए हैं’. अभिषेक कहते हैं कि कारोबार में चलने वाली सारी नगदी काला धन नहीं थी, लेकिन नोटबंदी के बाद वह प्रवाह टूट गया है. हालांकि, सरकार ने इनकम टैक्स से लेकर जीएसटी तक में नरमी बरतने का संकेत दिया है, लेकिन इन्हें लेकर जमीन पर छोटे कारोबारियों मेंं ज्यादा उत्साह नहीं है. उनका मानना है कि सरकार अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने पर अभी भी बहुत जोर दे रही है जो दरअसल छोटे उद्योग को तबाह कर रहा है जो रोजगार के सबसे बड़े साधन हैं.

सरकार मंदी से निपटने के लिए फायर फाइटिंग मोड में है. इन योजनाओं का देर-सवेर कुछ असर दिखेगा भी. लेकिन, सरकार के फैसलों लेने में कुछ स्पष्ट सोच भी दिखनी चाहिए. सुपर रिच टैक्स पहले ही खत्म कर दिया जाता और फिलहाल कॉरपोरेट टैक्स घटाने के बजाय उपभोक्ताओं के हाथ में कुछ पैसे दिए जाते तो ज्यादा बेहतर रहता. इसके अलावा अर्थव्यवस्था मेंं ग्रामीण क्षेत्रों से मांग क्यों घटी है और अनौपचारिक सेक्टर को नुकसान होने से कितने रोजगार खत्म हुए, इसके सटीक विश्लेषण के बगैर अर्थव्यवस्था की सुस्ती की वजह को ठीक से नहीं समझा जा सकता.