आपने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) से इस्तीफा क्यों दिया? क्या आपका विरोध इस बात से है कि सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करके एक निर्णय लिया? सरकार द्वारा अपने संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल का विरोध क्यों कर रहे हैं आप?

मेरे इस्तीफे के संदर्भ में एक भ्रम की स्थिति यह बन गई है कि मैंने सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के तहत मिले अधिकारों के इस्तेमाल की वजह से इस्तीफा दिया है. जबकि ऐसा नहीं है. अनुच्छेद 370 पर सरकार ने जो निर्णय लिया, यह उसका संवैधानिक अधिकार है और यह नीतिगत निर्णय है. मेरा विरोध इस बात पर है कि सरकार ने जो निर्णय लिया, उस पर प्रतिक्रिया देने का अधिकार देश के आम नागरिकों को है लेकिन वह अधिकार हमसे छीना जा रहा है. 5 अगस्त, 2019 को यह निर्णय हुआ और उसके बाद से जम्मू-कश्मीर के प्रभावित लोगों से इस बारे में प्रतिक्रिया देने का हक छीन लिया गया. जहां हमारे संविधान का अनुच्छेद 370 सरकार को निर्णय का अधिकार देता है, वहीं हमारा संविधान अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का मौलिक अधिकार देता है. सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर के नागरिकों से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को छीन लिया है. मेरा विरोध इससे है और इस वजह से मैंने इस्तीफा दिया है.

जब आप प्रशासनिक सेवा में जाते हैं तो केंद्र सरकार की सेवा शर्तों से सहमत होकर ही जाते हैं. ऐसे में एक ब्यूरोक्रेट होने के नाते आपकी यह जिम्मेदारी बन जाती है कि आप सरकार की नीतियों का पालन करें और ऐसा करते हुए एक ब्यूरोक्रेट के पास सवाल उठाने और वह भी सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाने की सुविधा नहीं है. बहुत से लोग कह रहे हैं कि आप ये सब जानते हुए प्रशासनिक सेवा में गए और अब एक आंदोलनकारी की तरह आवाज उठा रहे हैं?

आपकी बात सही है कि ब्यूरोक्रेट की यह जिम्मेदारी है कि वह सरकार के नीतिगत निर्णयों का पालन सुनिश्चित कराए. अगर किसी ब्यूरोक्रेट की किसी नीति से असहमति है तो वह फाइल नोटिंग का सहारा लेकर अपनी बात कहता है. लेकिन सार्वजनिक तौर पर असहम​ति जताने की सुविधा नहीं है. फाइल नोटिंग के जरिए भी एक ब्यूरोक्रेट उन्हीं नीतियों के प्रावधानों पर असहमति जता सकता है जिससे संबंधित फाइल उसके पास आ रही हो या जिसके बनने की प्रक्रिया में वह शामिल हो. मैं आंदोलनकारी की तरह आवाज नहीं उठा रहा. ब्यूरोक्रेसी में रहने के बावजूद मैं एक नागरिक भी हूं. एक नागरिक के नाते भी मेरे कुछ दायित्व हैं. हमने ही जो सरकार चुनी है, वही चुनी हुई सरकार अगर हमारे देश के ही नागरिकों की अभिव्यक्ति और जीवन का अधिकार उनसे छीन रही है तो क्या एक नागरिक के नाते हमारा ये दायित्व नहीं बनता कि हम अपनी सरकार को कहें कि ये गलत हो रहा है, इसे ठीक करने की जरूरत है. सरकार को ये कहना आंदोलन क्यों माना जा रहा है. ये तो एक नागरिक के नाते हमारी जिम्मेदारी है. जब मैंने देखा कि कोई कुछ बोल नहीं रहा है तो एक नागरिक के नाते अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए मैंने इस्तीफा दे दिया ताकि मैं खुलकर बोल सकूं. आईएएस में रहते हुए मेरे पास यह सुविधा नहीं थी.

आपने ब्यूरोक्रेसी के अंदर रहते हुए इस निर्णय के खिलाफ आंतरिक स्तर पर कोई आवाज क्यों नहीं उठाई?

मैंने पहले ही बताया कि फाइल नोटिंग एक ब्यूरोक्रेट को असहमति जताने की सुविधा देता है. लेकिन हर निर्णय से हर ब्यूरोक्रेट जुड़ा नहीं होता इसलिए हर निर्णय पर असहमति जताने के लिए आपके पास यह सुविधा नहीं होती. जिस निर्णय से आप संबंधित नहीं हों, उस निर्णय पर असहमति जताने के लिए ब्यूरोक्रेसी के अंदर कोई आंतरिक मंच नहीं है.

ब्यूरोक्रेसी के अंदर राजनीतिक नेतृत्व के अनुच्छेद 370 जैसे बड़े निर्णयों को लेकर किस तरह की स्थिति होती है?

देखिए ब्यूरोक्रेट भी समाज से ही आए हैं. जिस तरह से समाज में हर निर्णय के समर्थक और विरोधी दोनों होते हैं, उसी तरह से ब्यूरोक्रेसी में भी होता है. लेकिन पद पर रहते हुए सार्वजनिक तौर पर अपनी बात कहने की आजादी नहीं होती. ब्यूरोक्रेसी में भी हर तरह के लोग हैं. कुछ लोग अपने फायदे के लिए हर निर्णय में हां में हां मिलाते हैं तो कुछ लोग पूछे जाने पर अपनी बेबाक राय देते हैं. कुछ लोगों को लगता है कि सरकार की हां में हां मिलाने से उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिलेगी, वे ताकतवर बने रहेंगे. आदर्श स्थिति तो ये है कि अपनी सरकारी जिम्मेदारियों और निजी राय को अलग-अलग करके देखने की परिपक्वता हमारे लोकतंत्र में विकसित हो. जहां एक सरकारी अधिकारी भी अपनी राय खुलकर दे सके लेकिन अपनी सेवा की जिम्मेदारियों का निर्वहन अपनी निजी राय से अलग रहकर कर सके. लेकिन ये परिपक्वता आने में अभी बहुत वक्त लगेगा.

अनुच्छेद 370 पर सरकार के निर्णय का एक बड़ा वर्ग समर्थन कर रहा है. ऐसे में आप जैसा कोई अधिकारी विरोध करते हुए आईएएस छोड़कर बाहर आता है तो उसे किस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है?

ईमानदारी से कहूं तो सरकार की तरफ से अब तक मुझे जरा सा भी परेशान नहीं किया गया है. एक दिन ऐसा जरूर हुआ था कि मैं घर पर नहीं था और मेरे इस्तीफे के बाद वापस ड्यूटी पर जाने से संबंधित निर्देश मेरे घर के बाहर कुछ अधिकारी चिपका गए थे. उस वक्त मेरे परिवार के लोग परेशान हो गए थे कि ये क्या हो रहा है. लेकिन ब्यूरोक्रेसी में रहने के नाते मैं यह जानता हूं कि वह एक प्र​क्रियागत कदम था. मुझे परेशान करने की कोशिश सरकार के बाहर से जरूर हुई. सोशल मीडिया पर बहुत सारे लोगों ने अनाप-शनाप लिखा, वहीं बहुत सारे लोगों ने समर्थन भी किया. फिर मीडिया के भी एक वर्ग ने बेबुनियाद खबरें कीं. देश की एक प्रमुख न्यूज एजेंसी है आईएएनएस. उसने मेरे बारे में एक खबर की. इससे यह बात निकल रही थी कि मुझे नोटिस दिया गया था और उसकी वजह से मैंने इस्तीफा दिया. जबकि उनके पत्रकार ने मुझसे बात करके मेरा पक्ष तक नहीं जाना. उलटा मैंने उनसे संपर्क करके, उन्हें अपनी बात बताई. एजेंसी से यह खबर आने के बाद यह और कई मीडिया संस्थानों में प्रकाशित हुई. जब आप बेबुनियाद खबरें करते हैं और अपने ही पेशे के नैतिक मूल्यों का ध्यान नहीं रखते हैं तो इससे परेशानी होती है.

आपके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात भी सामने आई है और इसमें आप पर कुछ आरोप भी लगाए गए हैं. उन आरोपों पर आप क्या कहेंगे?

मुझ पर आरोप नहीं लगे हैं बल्कि कुछ बातों पर जवाब मांगा गया था. जिन बातों पर जवाब मांगा गया था, उन्हें जब आप जानेंगे तो पता चलेगा कि वे प्रक्रियागत विषय हैं. मुझसे पूछा गया कि मैंने प्रधानमंत्री अवार्ड के लिए आवेदन क्यों नहीं दिया. दूसरी बात यह पूछी गई कि केरल में​ निजी तौर पर मैं बाढ़ राहत के लिए गया था उसकी यात्रा रिपोर्ट क्यों नहीं सौंपी. तीसरी बात ये थी कि फाइल आगे बढ़ाने में देरी हो गई. चौथी बात यह थी कि मैंने चेयरमैन को सीधे फाइल दी, एडवाइजर के जरिए नहीं दी. इसमें कोई आरोप न तो भ्रष्टाचार का है और न ही कार्यकुशलता में कमी का. इन बातों को आप आरोप नहीं कह सकते और ये नहीं कह सकते कि इस वजह से मैंने बतौर आईएएस अपनी 27 साल की बची हुई नौकरी छोड़ दी. अगर मैं इस नोटिस से डरकर नौकरी छोड़कर भागता तो कश्मीर का मुद्दा उठाता और सरकार से आंख मिलाकर कहता कि आपने गलत किया है? (तब मैं) आराम से रहता और केंद्र सरकार में सचिव होकर रिटायर होता.

अगर मैं अक्षम अधिकारी होता तो दिसंबर, 2018 में मुझे मेरे प्रदर्शन के लिए 10 नंबर में से 9.9 नंबर नहीं मिले होते. यह फाइल देश के गृह सचिव तक गई थी. जिस 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 का निर्णय हुआ, उसी दिन मुझे अतिरिक्त जिम्मेदारियां नहीं मिली होतीं. सरकार ने उस दिन मुझे दो स्मार्ट सिटी का सीएमडी बनाया. शहरी विकास, टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग का सचिव बनाया. बतौर आईएएस अधिकारी जिन पदों पर रहा हूं, उन पदों पर काम करते हुए मेरा क्या प्रदर्शन रहा है, इस बारे में सारे तथ्य सार्वजनिक हैं.

आपके इस्तीफे के बाद कर्नाटक कैडर के भी एक आईएएस अधिकारी ने इस्तीफा दिया है. क्या आप उन्हें और ऐसे दूसरे अधिकारियों को जोड़कर कोई मंच बनाने की कोशिश करेंगे ताकि आप जिन मुद्दों पर बोलना जरूरी समझते हैं, उन पर खुलकर बोल सकें?

मेरी ऐसी कोई योजना नहीं है. सवाल उठाने की जिम्मेदारी सिर्फ मेरी या किसी और की नहीं बल्कि हम सबकी है. आपकी भी उतनी ही है. सही-गलत पर सभी को सवाल उठाने होंगे. जहां तक मेरी बात है तो नौकरी के दौरान मैंने जो थोड़े पैसे बचाए हैं, वे अगले दो-तीन महीने तक चलेंगे. तब तक मुझे जहां भी मौका मिलेगा, वहां अपनी बात कहूंगा. इसके बाद जीवनयापन के लिए मुझे भी कोई नई नौकरी खोजनी पड़ेगी. लेकिन इस बार ऐसी नौकरी में जाने की कोशिश करुंगा जहां जरूरी विषयों पर खुलकर बोल सकने की आजादी हो. इस बीच मैं लोगों को यह बताना चाहूंगा कि सरकार से सवाल करना हम भूल गए हैं. हमें फिर से ये काम शुरू करना होगा. सरकार से सवाल उठाने को गद्दारी समझा जा रहा है. ये गलत है. सरकार और देश अलग हैं. सरकारें आएंगी और जाएंगी. देश को किसी सरकार या पार्टी से जोड़ना बहुत खतरनाक है.

क्या कन्नन गोपीनाथन भविष्य में खुद को राजनीति में देखते हैं?

ये सवाल मुझसे पहले भी कई लोग पूछ चुके हैं. मुझे लगता है कि इस सवाल का कोई औचित्य नहीं है. मेरे हिसाब से जो भी लोग मेरे राजनीति में जाने की बात कर रहे हैं, वे सुनियोजित ढंग से यह कोशिश कर रहे हैं कि मैं जिन मुद्दों को उठा रहा हूं, उन मुद्दों को उठाने की मेरी कोई विश्वसनीयता नहीं बचे. ऐसा करने वाले लोग एक हाइरार्की के तहत काम करते हैं. ये लोग पहले नेम कॉलिंग करते हैं. बोल देते हैं कि वो राष्ट्र विरोधी और आतंकवादी है. इसके बाद ये चरित्र हनन करते हैं. इसमें आपके कामकाज पर सवाल उठाया जाता है. मेरे मेमो को जो मुद्दा बनाया गया, वह इसका ही हिस्सा है. लोग कह रहे हैं कि जांच चल रही थी, इसलिए उसने इस्तीफा दिया. फिर अंत में ये लोग कहते हैं कि उसे ये करना है, इसलिए ऐसा कर रहा है. मेरे बारे में कहा जा रहा है कि राजनीति में जाना है, इसलिए ऐसा कर रहा है. मैं राजनीति में जाता हूं, बॉलीवुड में जाता हूं, क्या करता हूं, यह अभी मुद्दा कैसे है! पूरी बातचीत ‘कौन’ और ‘क्यों’ पर चल रही है और इसमें ‘क्या’ यानी मूल मुद्दा छूट जा रहा है. मेरे बारे में कहा जा रहा है कि कन्नन बोल रहा है और वो केरल का है तो कम्युनिस्ट ही होगा. मैं क्या बोल रहा हूं, इस पर बात नहीं हो रही है.