बीते रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी शहर ह्यूस्टन में 50,000 अमेरिकी भारतीयों को संबोधित किया. ‘हाउडी मोदी’ नाम से रखे गए इस कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी शिरकत की. इस कार्यक्रम के दौरान इन दोनों नेताओं ने एक दूसरे की जमकर तारीफ़ की. नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘विश्व की राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा वजूद है. राष्ट्रपति ट्रंप किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. मुझे राष्ट्रपति ट्रंप में अपनापन दिखता है. राष्ट्रपति ट्रंप अद्भुत और अभूतपूर्व हैं. अरबों लोग ट्रंप के एक-एक शब्द को फोलो करते हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका की अर्थव्यस्था को मजबूत बनाया है. डोनाल्ड ट्रंप मुझे ‘टफ निगोशियेटर’ कहते हैं, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप भी ‘आर्ट ऑफ द डील’ में माहिर हैं. मैं उनसे सीख रहा हूं.’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के बीच ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ का नारा भी दिया. अमेरिका में अगले साल के अंत में फिर से राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं और वहां करीब 45 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं.

ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परोक्ष रूप से अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड का समर्थन करने पर कई जानकार सवाल खड़े कर रहे हैं. इन्हें लगता है कि ऐसा करना नैतिक और रणनीतिक दोनों ही लिहाज से सही नहीं है. ऐसा मानने वालों के मुताबिक जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कार्यक्रम में डोनाल्ड ट्रंप के आने की बात हुई थी, तभी यह संदेश चला गया था कि इसके जरिये डोनाल्ड ट्रंप अगले राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय समुदाय को अपने पक्ष में करना चाहते हैं. ऐसे में नरेंद्र मोदी को ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ जैसी बात बोलने से बचना चाहिए था. इन लोगों के मुताबिक यह नैतिक रूप से इसलिए सही नहीं हैं क्योंकि नरेंद्र मोदी अमेरिका में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे न कि वे किसी व्यक्तिगत यात्रा पर वहां गये थे. इस वजह से वे देश के हितों को ध्यान में रखते हुए दो देशों - भारत और अमेरिका - की मित्रता को मजबूत करने के लिए जो जरूरी होता वह कह और कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ‘हाउडी मोदी’ में जो कहा उससे यह संदेश गया कि भारत, अमेरिका से ज्यादा एक पार्टी और व्यक्ति विशेष के साथ रिश्ता बनाए रखना चाहता है और उन्हें अगला चुनाव जिताने में उनकी मदद कर रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में कश्मीर से धारा-370 हटाने के अपने फैसले की भी प्रशंसा की. इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की सीमा सुरक्षा को एक बड़ा मुद्दा बताया और उसके साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात कही. इस सबसे यह संदेश गया कि धारा 370 हटाने पर अमेरिका भारत के साथ खड़ा है, इसी हफ्ते पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर मुद्दे पर भारत को जिस तरह घेरने की रणनीति बनायी है उसे देखते हुए यह संदेश भारत के लिए काफी अहम माना जा रहा है. जानकारों की मानें तो ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ़ में नरेंद्र मोदी के कसीदे पढ़ने से भारत को मौजूदा समय में फायदा मिलता दिख रहा है. लेकिन यही लोग भविष्य में इसके रणनीतिक खतरे भी बताते हैं.

इन खतरों की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डोनाल्ड ट्रंप को समर्थन करना, किसी दूसरे देश के घरेलू चुनावों में हस्तक्षेप न करने के विदेश नीति के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत का उल्लंघन है. भारत के अमेरिका की दोनों राजनीतिक पार्टियों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक) के साथ एक जैसे संबंध रहे हैं. ऐसे में एक सार्वजनिक मंच से किसी एक पार्टी को समर्थन देना उसके दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के लिहाज से भी ठीक नहीं है. भारत को इसके चलते भविष्य में कुछ नुकसान भी उठाने पड़ सकते हैं.

जानकार कहते हैं कि अगर नरेंद्र मोदी यह मान कर चल रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ही अगला चुनाव जीतेंगे और इससे भारत को फायदा मिलेगा, तो ऐसा सोचना एक बड़ी गलती करने जैसा है. क्योंकि पहले तो ऐसा होना ही जरूरी नहीं है. और फिर अगर यह हो भी गया तो यह जरूरी नहीं है कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के साथ ही अमेरिकी संसद में भी उन्हीं की पार्टी का बहुमत हो जाए. ये लोग कहते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति को भले ही दुनिया का सबसे ताकतवर शख्स माना जाता हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसके पास अनंत अधिकार हैं. याद रखना चाहिए कि अमेरिकी लोकतंत्र में राष्ट्रपति को नियंत्रण में रखने के लिए वहां की संसद को भी कई अधिकार दिए गए हैं. विदेश संबंध किस तरह से चलाने हैं, यह वहां की संसद पर भी निर्भर करता है. भारत के उलट किसी भी अन्य देश के साथ समझौता करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति को अपनी संसद से भी उसकी मंजूरी लेनी पड़ती है. विशषज्ञों की मानें तो इस वजह से भारत को अमेरिका की सरकार के साथ-साथ, उस पार्टी से भी संबंध अच्छे रखने चाहिए जिसका अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में बहुमत हो.

कुछ जानकार कहते हैं कि इस मामले में भारत के सामने इजरायल एक बड़ा उदाहरण बन सकता है. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका को लेकर जिस तरह की विदेश नीति अपना रखी है, उसके चलते ऐसी छवि बनी कि नेतन्याहू रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक हैं. ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जब बराक ओबामा के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार के दौरान, नेतन्याहू की इस नीति के वजह से इजरायल को नुकसान उठाना पड़ा.

कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता भी जानते हैं कि ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम का क्या मकसद था. उन्हें पता है कि इसमें डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी केवल अमेरिका में रह रहे 45 लाख भारतीयों को अपने पक्ष में करना और इनके बीच बनी अपनी ‘प्रवासी विरोधी’ छवि को दूर करना था. डोनाल्ड ट्रंप की इस छवि के चलते ही पिछले राष्ट्रपति चुनाव में 80 फीसदी से ज्यादा भारतीय मूल के लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन को वोट दिया था. वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे कुछ अखबारों ने भी लिखा है कि ‘डोनाल्ड ट्रंप की नजर भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बढ़ रहे मतदाताओं पर है. वे ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम के बाद 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय-अमेरिकियों के अधिक से अधिक वोट मिलने की उम्मीद कर रहे हैं.’

हालांकि, ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में भारतीय प्रधानमंत्री के डोनाल्ड ट्रंप को समर्थन देने के बाद भी डेमोक्रेटिक पार्टी के किसी नेता ने इस पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है. इसका कारण भी अगले साल होने वाला अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव ही माना जा रहा है. दरअसल, डेमोक्रेटिक नेता भी अभी नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ बोलकर अक्सर अपने पक्ष में वोट देने वाले भारतीय मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहते.

लेकिन, डेमोक्रेटिक पार्टी के कद्दावर नेता और अगले राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी के प्रबल दावेदार बर्नी सैंडर्स ने ह्यूस्टन के ही एक अखबार में जो लिखा उससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में अगर वे राष्ट्रपति बन गए तो भारत को लेकर उनका क्या रवैया होगा. रविवार को ह्यूस्टन क्रॉनिकल में अपने एक आलेख में सैंडर्स ने लिखा, ‘जब राष्ट्रपति (डोनाल्ड) ट्रंप भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ह्यूस्टन में मिलेंगे, तब हम लोग अमेरिकी और भारतीयों के बीच दोस्ती के बारे में काफी कुछ सुनेंगे...हालांकि, हमारी आंखों के सामने (कश्मीर में) हो रहे मानवाधिकार संकट पर बोलने की जब बारी आएगी, तब (वहां) गहरी चुप्पी छा जाएगी.’