पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद सबसे अधिक समय तक अगर कोई भारत का प्रधानमंत्री रहा है तो वे मनमोहन सिंह ही हैं. 2004 से 2014 यानी दस साल तक वे देश के प्रधानमंत्री रहे. उनके कार्यकाल की समीक्षा लोग अलग-अलग तरह से करते हैं. लेकिन एक बात पर अधिकांश लोग सहमत दिखते हैं कि प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल उनके दूसरे कार्यकाल के मुकाबले बहुत अच्छा था.

दूसरे कार्यकाल यानी 2009 से 2014 के बीच उनकी अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी. पहले कार्यकाल में जहां सरकार की चर्चा रोजगार गारंटी योजना, सूचना का अffधिकार और किसानों की कर्ज माफी जैसी कल्याणकारी योजनाओं के लिए होती थी तो वहीं दूसरे कार्यकाल वाली मनमोहन सरकार की पहचान 2जी घोटाला और कोयला घोटाला जैसे मामलों से होने लगी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर सीधे और तीखे हमले होने लगे.

इसी पृष्ठभूमि में मनमोहन सिंह ने एक बार कहा था कि इतिहास उनके साथ थोड़ी नरमी बरतेगा. अब जब जवाहरलाल नेहरू के बाद सबसे अधिक समय तक भारत के प्रधानमंत्री रहने वाले इस व्यक्ति को अपने पद से हटे छह साल से अधिक वक्त गुजर गया है तो इसे समझने की जरूरत है कि मनमोहन सिंह इतिहास से जो अपेक्षा कर रहे थे, क्या वैसा कुछ हो रहा है? क्या लोग अब उन्हें घोटालों वाली सरकार के मुखिया से अलग किसी और रूप में याद करने लगे हैं?

मनमोहन सिंह आज 88 साल के हो गए हैं. 1991 में वे पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री बनकर राजनीति में आए थे. मनमोहन सिंह को अब किस रूप में याद किया जा रहा है, इस बारे में जिन लोगों से भी बात की जाए, उनमें से अधिकांश उन्हीं दो बातों का जिक्र बार-बार करते हैं जिनकी चर्चा पहले ही की गई है. लोग मनमोहन सिंह के कार्यकाल को दो हिस्सों में बांटकर देखते हैं. दोनों कार्यकालों को अलग-अलग करके न भी देखा जाए तो उनके दस साल का पहला चरण मोटे तौर पर 2004 से 2010 और दूसरा चरण 2010 से 2014 को माना जा सकता है.

2004 से 2010 के बीच मनमोहन सिंह सरकार पूरे फॉर्म में दिखती है. लोग भी उस सरकार को वैसे ही याद करते हैं. 2005 में रोजगार गारंटी योजना लागू होती है. उसी साल सूचना का अधिकार भी लागू हो जाता है. इन दोनों कानूनों को उस वक्त भी बेहद क्रांतिकारी बताया गया था और समय के साथ इन दोनों ने इस बात को सही साबित किया. 2009 के चुनावों के पहले किसानों की कर्ज माफी योजना भी उन्हीं मनमोहन सिंह की सरकार लेकर आई जिन्हें भारत में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की पैरवी करने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा माना जाता था.

जो लोग नीतिगत बारीकियों को समझते हैं, वे कहते हैं कि अपने पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह सरकार बाजार आधारित नीतियों पर भी बढ़ रही थी, लेकिन सरकार का एक कल्याणकारी चेहरा भी था. वजह शायद यह रही होगी कि उसके पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. वाजपेयी के कार्यकाल के आखिरी सालों में विनिवेश जैसे मसलों पर सरकार की काफी किरकिरी हुई थी. लगातार सब्सिडी में हो रही कटौती से लोगों में यह राय बनने लगी थी कि सरकार को किसी निजी कंपनी की तरह चलाया जा रहा है.

मनमोहन सिंह इस धारणा को तोड़ना चाहते थे या नहीं, इसे लेकर लोगों की राय अलग-अलग है. कुछ लोग इसे सोनिया गांधी के दबाव का असर मानते हैं तो कुछ लोग यह कहते हैं कि मनमोहन सिंह को यह मालूम था कि बाजार आधारित मॉडल भी भारत में तब ही प्रभावी हो सकता है जब आम लोग आर्थिक तौर पर अधिक मजबूत बनेंगे. कुछ लोगों को मोदी सरकार में इसी बात का अभाव दिखता है. उन्हें लगता है कि बाजार आधारित व्यवस्था को मजबूत बनाने वाले सारे कदम तो सरकार उठा रही है, लेकिन उसकी जनकल्याणकारी पहल कहीं पीछे छूट गई है.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल के पहले चरण का सबसे बड़ा योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने नीतियों के निर्धारण में ‘अधिकार आधारित’ दृष्टिकोण अपनाया. इसी का असर था कि सूचना का अधिकार, रोजगार गारंटी और फिर बाद में उनके दूसरे कार्यकाल में खाद्य सुरक्षा, उचित मुआवजा और पुनर्वास का अधिकार जैसे कानून लागू हुए. जबकि मोदी सरकार के कार्यकाल में ‘बीमा आधारित’ योजनाओं की बहार है. चाहे वह आयुष्मान भारत हो, जीवन सुरक्षा योजना, जीवन ज्योति योजना या फिर फसल बीमा योजना, अधिकांश योजनाएं अधिकार आधारित न होकर बीमा आधारित हैं.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल का दूसरा चरण उतना ही बुरा कहा जा सकता है. आज भी लोग यह मानते हैं कि उस समय लगातार सामने आ रहे घोटालों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही खुद शामिल नहीं रहे हों लेकिन उन्होंने इन्हें रोकने के लिए कोई तत्परता भी नहीं दिखाई. कुछ लोग इसके लिए उनके राजनीतिज्ञ नहीं होने को जिम्मेदार ठहराते हैं तो कुछ लोग इसे सोनिया गांधी और गठबंधन राजनीति का दबाव मानते हैं.

मनमोहन सिंह अपनी चुप्पी को लेकर अपने कार्यकाल में अक्सर निशाने पर रहे. विपक्ष इसी वजह से उन्हें मौन-मोहन सिंह भी कहता रहा है. लेकिन अब जब बहुत अधिक बोलने वाले नरेंद्र मोदी भी अहम मुद्दों पर चुप्पी मार जाते हैं तो लोगों को लगता है कि शायद ‘मौन’ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की मजबूरी है. बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह की तुलना में यह कहते हैं कि मोदी बहुत बोलकर भी बहुत कुछ करते नजर नहीं आते लेकिन मनमोहन सिंह कम बोलकर भी आम लोगों के लिए कुछ-कुछ करते नजर आते थे.

आज जब देश में आर्थिक मंदी की मार बढ़ती जा रही है, खासकर कोरोना संकट के बाद जब जीपीडी में ऐतिहासिक सिकुड़न की चर्चा है, तो मनमोहन सिंह एक बार फिर से लोगों को याद आ रहे हैं. जो लोग अर्थव्यवस्था की बारीकियों को समझते हैं, वे कहते हैं कि मौजूदा संकट से पहले भी भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्त हो गई थी और तब जिस वैश्विक मंदी की आड़ लेकर नरेंद्र मोदी सरकार इसे स्वाभाविक बताने की कोशिश कर रही थी, वह वैश्विक मंदी 2008-09 में कहीं अधिक गहरी थी. लेकिन उस वक्त मनमोहन सिंह ने जिस सूझबूझ से काम लिया, उसका नतीजा यह हुआ कि वैश्विक मंदी का काफी कम असर भारत पर हुआ.

मनमोहन कहते रहे हैं कि भारत की मंदी सिर्फ इस वजह से नहीं है कि पूरी दुनिया में मंदी है बल्कि यह इस वजह से है कि मोदी सरकार ने पूरी अर्थव्यवस्था का कुप्रबंधन किया है और इसके लिए नोटबंदी और जीएसटी दोनों जिम्मेदार हैं. उन्होंने ये भी कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि हम आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं. वे कोरोना संकट के चलते हुए लॉकडाउन के नतीजे में अर्थव्यवस्था को लगे झटकों से उबरने के सुझाव भी दे रहे हैं. इनमें गरीबों को कैश ट्रांसफर से लेकर एमएसएमई क्षेत्र पर विशेष जोर शामिल हैं. मनमोहन सिंह के मुताबिक अब तक मोदी सरकार वास्तविकता को स्वीकार करने के बजाए इधर-उधर की बातें करके लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है.

मनमोहन सिंह ने आर्थिक संकट से निकलने के लिए पिछले साल एक पांच सूत्री फॉर्मूला भी सुझाया था. उन्होंने कहा था कि अगर देश को मंदी से निकलना है तो जीएसटी की दरों में बदलाव करना होगा और यह बदलाव करते वक्त सरकार को यह नहीं सोचना चाहिए कि इससे हाल-फिलहाल राजस्व का नुकसान होगा. उन्होंने कहा कि मांग बढ़ाने के लिए नए तरीके अपनाने होंगे. उनका तीसरा सुझाव था कि उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना होगा जहां अधिक लोगों को रोजगार मिल पाता है. साथ ही उन्होंने कहा कि बाजार में तरलता बढ़ानी होगी. उनका पांचवां सुझाव यह था कि जहां भी निर्यात की संभावनाएं बनती हों, उन संभावनाओं का इस्तेमाल करना होगा. मोदी सरकार के तमाम दावों के बावजूद अर्थव्यवस्था का जो हाल है उसे देखते हुए कइयों को बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार-बार याद आ रहे हैं. उनको लग रहा है कि अगर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होते तो 2008 की मंदी से जिस तरह उन्होंने देश को बचाया था और इसका कम से कम असर भारत पर पड़ने दिया था, वही इस बार भी होता.

कॉरपोरेट जगत के पोस्टर ब्वॉय की पहचान वाले नेता रहे मनमोहन सिंह की सरकार पर उतना कॉरपोरेटपरस्त होने का आरोप नहीं लगा जितना आज नरेंद्र मोदी की सरकार पर लगते रहे हैं. कुछ लोग तो मोदी सरकार को अडाणी-अंबानी की सरकार ही कहते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गांधी मोदी सरकार को सूट-बूट की सरकार कहते हैं. कृषि और श्रम सुधारों से जुड़े जो विधेयक हाल में संसद से पारित हुए हैं उन्हें लेकर भी आरोप लग रहे हैं कि ये किसानों और मजदूरों को कॉरपोरेट के रहमोकरम पर छोड़ देंगे. जब भी मोदी सरकार पर इस तरह के आरोप लगते हैं तब-तब मनमोहन सिंह इन अर्थों में याद आ सकते हैं कि उनकी कम से कम पहली सरकार कॉरपोरेट का भला करने के साथ ही आम लोगों का ध्यान रखने की कोशिश करती भी नजर आती थी.

कुछ लोगों को लगता है कि मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में आम लोगों के करीब दिखने की ही कोशिश कर रही थी जब उसने सुपर रिच टैक्स जैसे प्रावधान बजट में किये और कंपनियों में पब्लिक होल्डिंग बढ़ाने की बात की. हालांकि इसका जो नतीजा देखने को मिला उसकी वजह से उसे न केवल इन मामलों में अपने कदम पीछे खींचने पड़े बल्कि कॉरपोरेट टैक्स को भी कम करना पड़ा.