उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. रायबरेली में हुई दुर्घटना के मामले में जांच पूरी करने के लिए सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट से 14 दिन का और समय मिल गया है. बीती 28 जुलाई को हुई इस दुर्घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट की वजह से ही पूरी न्याय व्यवस्था एक झटके में जाग गई थी. इसके बाद आनन-फानन में वह हुआ जो पिछले डेढ़ साल से नहीं हो पा रहा था. रातों-रात विधायक के खिलाफ बलात्कार के मामले में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में मुकदमे की कार्रवाई शुरू हो गई.

कथित तौर पर 4 जून 2017 को हुए बलात्कार के इस मामले में 12 फरवरी 2018 को उन्नाव की एक अदालत के आदेश पर एफआईआर दर्ज हुई थी. पुलिस ने प्रारम्भिक जांच में बलात्कार के आरोप को गलत बताया. 8 अप्रैल 2018 को जब पीड़िता ने लखनऊ में मुख्यमंत्री निवास के पास आत्मदाह का प्रयास किया तो यह मामला चर्चा में आ गया. उसी रात जब आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार पीड़िता के पिता ने उन्नाव अस्पताल में दम तोड़ दिया तो फिर यह मामला मीडिया की नजरों में चढ़ गया. इसके बाद कुलदीप सेंगर के भाई अतुल सेंगर और तीन पुलिसकर्मियों को उनकी हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और बलात्कार का मामला सीबीआई के हवाले कर दिया गया. मामला सीबीआई के हाथ में आने के तीन दिन बाद ही विधायक कुलदीप सेंगर को भी गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद सीबीआई ने तो जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल कर दी थी लेकिन राजनेताओं पर मुकदमे चलाने के लिए बनी विशेष अदालत में न्यायाधीश के न होने के कारण मुकदमा शुरू नहीं हो सका था.

28 जुलाई 2019 को रायबरेली में हुई कार दुर्घटना ने एक बार फिर इस मामले को चर्चा में ला दिया. इस दुर्घटना में पीड़िता और उसके वकील गंभीर रूप से घायल हो गए और उसकी दो महिला रिश्तेदारों की मौत हो गई. इसके बाद तमाम चैनलों पर यह संदेह जताया जाने लगा कि हो सकता है विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने ही पीड़िता की हत्या के उद्देश्य से यह दुर्घटना करवाई हो. तमाम ऐसी खबरों का भी असर था कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया. इसके बाद उन्नाव बलात्कार कांड से जुड़े सारे केस उत्तर प्रदेश से दिल्ली ट्रांसफर कर दिए गए और दुर्घटना की जांच भी सीबीआई को सौंप दी गई. मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर नाराजगी भी जताई कि जब पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट को विधायक से खतरे के बारे में पत्र लिखा था तो उसे उनके संज्ञान में क्यों नहीं लाया गया. उन्होने अपने मातहतों को इस बारे में तलब किया तो उन्हें बताया गया कि हर रोज ऐसे लगभग 5800 पत्र रजिस्ट्री में आते हैं. अदालत में अभी इस गुस्ताखी का मामला विचाराधीन है. लेकिन इस जवाब से यह भी पता चलता है कि देश के 5800 दुखियारों में से ज्यादातर की न्याय की उम्मीदें हर रोज अदालत की चौखट पर ही दम तोड़ देती हैं. क्या हमारी जागरूक न्याय व्यवस्था उन्नाव मामले की तरह इन अनसुनी फरियादों की सुनवाई के लिए भी सक्रिय होगी.

रायबरेली में हुई कार दुर्घटना पर लौटें तो उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया ओपी सिंह ने इसके तुरंत बाद अपने पहले बयान में यह कहा था कि प्रथम दृष्टया यह एक दुर्घटना ही लगती है. यूपी के तेजतर्रार पूर्व डीजीपी बृज लाल भी मानते हैं कि यह मामला सुनियोजित साजिश का नही लगता क्योंकि आरोपी विधायक, ट्रक मालिक और ट्रक के ड्राइवर व क्लीनर के बीच किसी भी तरह का कोई आपराधिक रिश्ता नहीं जुड़ता दिखता है. फिर ट्रक मालिक को तो खुद सीबीआई ने ही शुरूआती पूछताछ के बाद क्लीनचिट दे दी थी. सीबीआई अब तक की जांच में ड्राइवर और क्लीनर के कई तरह के टेस्ट करवाने के बाद भी साजिश का कोई सुराग नहीं तलाश पायी है. भले ही मीडिया के एक बड़े हिस्से ने दुर्घटना को हत्या की साजिश घोषित कर दिया हो, और पीड़िता के परिवार की ओर से जेल में बंद विधायक सहित 20 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी गई हो लेकिन इस मामले में कई अगर-मगर ऐसे हैं जिनसे जूझे बिना किसी की भी बातों पर ऐतबार करना सही नहीं है.

इस मामले में पहला सवाल तो यही उठता है कि जब पीड़िता की ओर से अपनी जान को खतरा बता कर विधायक के खिलाफ शिकायत की गई थी तो दुर्घटना के वक्त उनके साथ उनके सुरक्षाकर्मी क्यों नहीं थे? दूसरा सवाल दुर्घटना के स्वरूप से उठता है. दुर्घटना के समय ट्रक तेज रफ्तार से चल रहा था. सहज बुद्धि कहती है कि अगर यह सुनियोजित व साजिशन दुर्घटना होती तो ट्रक की कार से सीधी भिड़ंत होनी चाहिए थी ताकि कार में बैठे लोगों के जिंदा बचने की कोई गुंजाइश नहीं रहे. लेकिन इस दुर्घटना की तस्वीर देखें तो इसमें ट्रक सड़क पर तिरछा खड़ा दिखता है और कार उसके पिछले हिस्से से भिड़ी नजर आती है. इससे ऐसा लगता है कि शायद कार को बचाने के लिए ट्रक ने तेज ब्रेक लगाए होंगे जिससे वह सड़क पर तिरछा हो गया और कार उसके पिछले हिस्से से भिड़ गई. और चूंकि कार भी तेज रफ्तार में थी इसलिए शायद उसमें सवार लोगों को जानलेवा चोटें आईं.

क्रिमिनल मामलों के वरिष्ठ वकील वीके शाही कहते हैं, ‘दोनों परिवारों के बीच जिस तरह की रंजिश चली आ रही है उसके चलते अगर कोई साजिश होती तो कार के पीछे से टक्कर मारकर पीड़िता की हत्या का प्रयास किया जाता. क्योंकि गाड़ी का पीछा करते हुए इतनी भयावह दुर्घटना करना अधिक आसान होता. सामने से हुई टक्कर के लिए अपराधियों के बीच बहुत अच्छा संचार संपर्क होना जरूरी था जिससे यह ठीक से पता चलता कि कार कहां पहुंची है और उसी के अनुसार ट्रक की रवानगी होती. लेकिन अब तक हुई जांच में पता चला है कि ट्रक के ड्राइवर और कंडक्टर की बातचीत सिर्फ ट्रक मालिक और एक ग्राहक के साथ ही हुई थी. इसलिए इसे हत्या की साजिश कहना मुश्किल है.’

इसी तरह अगर इस दुर्घटनास्थल के बारे में बात करें तो वह भी साजिश की संभावना के अनुकूल नहीं दिखता. अगर यह सुनियोजित साजिश होती तो दुर्घटना के लिए ऐसा स्थान नहीं चुना जाता जहां ढाबा और भीड़ थी. ऐसी हालत में दुर्घटना के लिए ऐसी जगह चुनी जाती जहां किसी चश्मदीद के होने की संभावना नहीं होती. फिर ट्रक के ड्राइवर, कंडक्टर या मालिक का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है, ऐसे में आपराधिक साजिश रचने वाला कोई शख्स क्या ऐसे गैर पेशेवर व्यक्तियों को इतने बड़े अपराध के लिए इस्तेमाल करने का खतरा मोल ले सकता था?

इस मामले में दोनों पक्षों के बीच की पुरानी दुश्मनी की पृष्ठभूमि को भी देखा जाना चाहिए. सत्याग्रह में ही छपी प्रदीपिका सारस्वत की एक पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक मीडिया में उन्नाव बलात्कार मामले का जो पक्ष देखने को मिला वह गांव माखी के लोगों से बातचीत करने पर और उनके पास मौजूद कागज़ी दस्तावेजों को देखने पर जो सामने आया, उससे बिलकुल अलग था.

गांव के लोगों के मुताबिक दोनों परिवारों में 15 साल पहले तक काफी नजदीकी थी. और बाद में किसी वजह से इनमें दूरी आ गई. माखी थाने से पता चलता है कि साल 1996 से लेकर 2017 तक पीड़िता के चाचा पर कुल 14 आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए थे, और लड़की के मृतक पिता पर 28 मुकदमे दर्ज थे. इनमें हत्या और हत्या के प्रयास जैसे मामले भी शामिल हैं.

उन्नाव मामले में 20 जून 2017 को जो पहली एफआईआर माखी थाने में दर्ज कराई गई थी वह किसी शुभम और अवधेश तिवारी के नाम थी. इस रिपोर्ट में पीड़िता की मां के हवाले से लिखा गया कि अवधेश तिवारी शुभम की कार चलाता था और वह 11 जून 2017 की रात को ‘लगभग 17 वर्ष’ की पीड़िता को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया था. उस समय शुभम उसके साथ था. इस रिपोर्ट में विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का कोई ज़िक्र नहीं था. सत्याग्रह को यह एफआईआर शुभम के भाई नवीन चौहान से मिली थी.

आरोपित शुभम के भाई नवीन चौहान का इस बारे में कहना था कि पीड़िता नरेश (अवधेश तिवारी का ही दूसरा नाम) के साथ अपनी मर्ज़ी से गई थी. लेकिन 20 तारीख को उसके बरामद होने के बाद उसके चाचा कमलेश (बदला हुआ नाम) ने शुभम और उसके परिवार पर दबाव बनाया कि उसकी शादी शुभम से करा दी जाये. यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि शुभम और पीड़िता दोनों ठाकुर समुदाय से ही आते हैं. नवीन का कहना था कि जब यह बातचीत चल रही थी उस समय इसी समुदाय से आने वाले विधायक सेंगर भी वहां मौजूद थे.

पीड़िता की बरामदगी के बाद, इस मामले के तत्कालीन जांच अधिकारी अजय रजावत ने 21 जून 2017 को लिखे बरामदगी के दस्तावेज (फर्द बरामदगी) में भी कुलदीप सिंह सेंगर का कोई ज़िक्र नहीं किया.

नवीन चौहान के मुताबिक ‘जब उन्हें (पीड़िता के परिवार वालों को) लगा कि सिर्फ शुभम को घेरने से कुछ नहीं होगा तब उन्होंने मेरी मां और बहन को भी फंसाया. अपने 164 के (मजिस्ट्रेट के सामने पीड़ित द्वारा दिए जाने वाले) बयान में लड़की ने मेरी मां और बहन का ज़िक्र किया. और चार्जशीट दाखिल किए जाते समय जब मेरी मां और बहन का नाम मामले से दूर रखा गया तब 12 फरवरी 2018 को लड़की की मां ने कोर्ट में दरख्वास्त देकर विधायक (कुलदीप सिंह सेंगर) पर भी आरोप लगा दिए.’ नवीन के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सेंगर ने इस मामले में उनकी मदद की थी और दोनों परिवारों में पहले से अदावत भी थी.

इस दरख्वास्त में पीड़िता की मां ने लिखा कि शुभम की मां शशि सिंह चार जून 2017 की रात उसकी नाबालिग बेटी को नौकरी का झांसा देकर कुलदीप सिंह के पास ले गई, जिसने उसकी बेटी के साथ बलात्कार किया. यह दरख्वास्त शशि सिंह और कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत करने के लिए थी.

इस मामले में माखी के कुछ अन्य निवासियों ने भी सत्याग्रह को कुछ-कुछ ऐसी ही बातें बताई थीं. माखी निवासी सलिल चौहान का इस मामले में कहना था कि यह दोनों परिवारों के बीच की रंजिश का नतीजा है क्योंकि ‘उस लड़की(पीड़िता) की दो छोटी बहनें अभी 15 दिन पहले तक विधायक के स्कूल में पढ़ने आ रही थीं. अगर विधायक ने गैंगरेप किया होता तो कोई अपनी लड़कियों को बलात्कार करने वाले के स्कूल में भेजता?’

इस मामले में एक झोल पीड़िता की उम्र का भी है. पीड़िता को नाबालिग मानकर उसके साथ बलात्कार के सभी आरोपितों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट (बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012) लगाया गया है. सत्याग्रह की पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक 21 जून 2017 को दर्ज हुई एफआईआर में उसकी उम्र ‘लगभग 17 वर्ष’ बताई गई थी. वीरेंद्र सिंह शिक्षा निकेतन इंटर कॉलेज, माखी, उन्नाव के प्रधानाचार्य द्वारा हस्ताक्षरित जिस दस्तावेज को पीड़ता के परिवार ने उसके आयु प्रमाणपत्र के रूप में पेश किया है, उसके मुताबिक जून 2017 में पीड़िता की उम्र मात्र 15 वर्ष ही थी. इस दस्तावेज में पीड़िता के पिता का नाम भी गलत दर्ज है. यह प्रमाणपत्र 21 जून 2017 को ही बनाया गया है. लेकिन बरामदगी के बाद कराए गए मेडिकल के दौरान हुए बोन एक्सरे में पीड़िता की उम्र साढ़े उन्नीस साल बताई गई. शुभम के भाई नवीन ने इन सभी दस्तावेजों की प्रतियां सत्याग्रह के साथ साझा की थीं.

फिलहाल यह मामला दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में है. जिसने आदेश दिया है कि सेंगर चूंकि वेतनिक लोकसेवक हैं इस लिए उनके खिलाफ पाॅक्सो एक्ट की धारा 5-सी व 6 के तहत मुकदमा चलाया जाएगा. यानी आरोप सिद्ध होने पर 10 वर्ष तक की सजा. लेकिन इस मामले में पीड़िता की उम्र को लेकर उठा विवाद अब भी विचाराधीन है. उन्नाव पुलिस ने पहली नजर में पीड़िता की जन्म तिथि के प्रमाणों में फर्जीवाड़ा स्वीकार किया था और इस मामले में पीड़िता, उसकी मां व चाची के खिलाफ दर्ज केस में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है. यानी अभी यह तय होना बाकी है कि पीड़िता जून 2017 में नाबालिग थी या नहीं.

पीड़िता के बलात्कार और उसकी दुर्घटना के मामलों में सच क्या है, इनके अपराधी कौन हैं, ये जैसे ऊपर से दिखते हैं वैसे हैं या नहीं, ये न्यायालय तय करेगा. लेकिन जैसा कि सत्याग्रह की पिछली रिपोर्ट में भी कहा गया है इन मामलों में अदालत का फैसला और सच चाहे कुछ भी क्यों न हो पीड़िता इनमें एक बड़ी साज़िश की शिकार और पीड़िता के तौर पर ही हमारे सामने आने वाली है.