अमेरिका ने पाकिस्तान को झटका दिया है. उसने पूछा है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान चीन के उन एक लाख उइगर मुसलमानों की बात क्यों नहीं करते जो चीन में हिरासत में रह रहे हैं. आज अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण और मध्य एशिया के मामलों की शीर्ष अधिकारी एलिस वेल्स ने कहा, ‘मैं उन मुसलमानों के लिए भी उतनी ही चिंता देखना चाहूंगी जो पश्चिमी चीन में हिरासत में रह रहे हैं जिनके लिए हालात किसी यातना शिविर जैसे हैं.’ उनका यह भी कहना था कि जब मुसलमानों के मानवाधिकारों की बात होती है तो मामला सिर्फ कश्मीर तक नहीं रहना चाहिए.

बीते महीने भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद से ही पाकिस्तान इसका विरोध कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कई बार कह चुके हैं कि कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति बहुत खराब है. एलिस वेल्स ने कहा कि कश्मीर पर इमरान खान की टिप्पणियों से कोई मदद नहीं मिल रही और भड़काऊ बयानबाजी में कमी का स्वागत किया जाएगा.

चीन, पाकिस्तान का सबसे करीबी साझेदार है. उधर, इमरान खान ने सोमवार को एक कार्यक्रम में उइगर मुस्लिमों के बारे में पूछे जाने पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था. उनका कहना था कि पाकिस्तान का चीन के साथ एक खास रिश्ता है और इस मुद्दे को वह सिर्फ निजी तौर पर उठाएगा.

उइगर कौन हैं?

इस्लाम को मानने वाले उइगर समुदाय के लोग चीन के सबसे बड़े और पश्चिमी क्षेत्र शिंजियांग प्रांत में रहते हैं. इस प्रांत की सीमा मंगोलिया और रूस सहित आठ देशों के साथ मिलती है. तुर्क मूल के उइगर मुसलमानों की इस क्षेत्र में आबादी एक करोड़ से ऊपर है. इस क्षेत्र में उनकी आबादी बहुसंख्यक थी. लेकिन जब से इस क्षेत्र में चीनी समुदाय हान की संख्या बढ़ी है और सेना की तैनाती हुई है तब से यह स्थिति बदल गई है.

शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर मुस्लिम ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ चला रहे हैं जिसका मकसद चीन से अलग होना है. दरअसल, 1949 में पूर्वी तुर्किस्तान, जो अब शिनजियांग है, को एक अलग राष्ट्र के तौर पर कुछ समय के लिए पहचान मिली थी, लेकिन उसी साल यह चीन का हिस्सा बन गया. 1990 में सोवियत संघ के पतन के बाद इस क्षेत्र की आजादी के लिए यहां के लोगों ने काफी संघर्ष किया. उस समय इन लोगों के आंदोलन को मध्य एशिया में कई मुस्लिम देशों का समर्थन भी मिला था लेकिन, चीनी सरकार के कड़े रुख के आगे किसी की एक न चली