उत्तर प्रदेश और बिहार की दो राज्यसभा सीटों के लिए 27 सितंबर यानी शुक्रवार को चुनाव आयोग ने अधिसूचना जारी कर दी. चार अक्टूबर तक इनके लिए नामांकन भरा जा सकता है और अगर जरूरत पड़ी तो 16 अक्टूबर को दोनों सीटों पर चुनाव होंगे. ये दोनों सीटें सामान्य रूप से खाली नहीं हुई हैं. उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सीट पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के निधन से खाली हुई है. वहीं बिहार की राज्यसभा सीट पूर्व केंद्रीय मंत्री और देश के जाने-माने वकील राम जेठमलानी के निधन से खाली हुई है.

राज्यसभा में चुनाव से संबंधित नियम यह है कि अगर कोई सीट किसी के इस्तीफे या निधन की वजह से कार्यकाल के पहले खाली हो तो नए व्यक्ति का चुनाव बचे हुए कार्यकाल के लिए ही होता है. इस लिहाज से देखें तो उत्तर प्रदेश से अरुण जेटली पिछले साल राज्यसभा के लिए चुने गए थे और उनका कार्यकाल अप्रैल, 2024 तक का था. वहीं राम जेठमलानी की सीट का बचा हुआ कार्यकाल 2022 में खत्म होगा. यानी तकरीबन तीन साल का कार्यकाल इस सीट का भी बचा हुआ है.

दोनों सीटों पर लंबा कार्यकाल बचे होने की वजह से इन दोनों सीटों पर दावेदारी को लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों राज्यों में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. आम तौर पर राज्यसभा की एक सीट के लिए चुनाव होता है तो वह सीट सत्ता पक्ष को चली जाती है. क्योंकि सत्ता पक्ष का ही राज्य की विधानसभा में बहुमत होता है. इस लिहाज से देखें तो उत्तर प्रदेश की सीट भाजपा को जानी तय है. वहीं बिहार से राम जेठमलानी राष्ट्रीय जनता दल की ओर से राज्यसभा में थे. लेकिन 2017 में जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी का फिर से गठबंधन हो जाने के बाद अब राज्यसभा की यह सीट आरजेडी का जाते नहीं दिख रही है. यह सीट अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के खाते में जाएगी.

उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सीट के लिए हो रहे उपचुनाव को लेकर जिन नामों की चर्चा चल रही है उनमें सबसे प्रमुख नाम पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा का है. मनोज सिन्हा गाजीपुर से पिछला लोकसभा चुनाव तकरीबन सवा लाख वोटों से हार गए थे. लेकिन भाजपा में उनकी गिनती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्त नेताओं में होती है. ऐसे में अटकल यह लगाई जा रही है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा भेज सकती है. हालांकि, उत्तर प्रदेश भाजपा के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘प्रदेश के नेताओं को लगता है कि मनोज सिन्हा की दावेदारी उतनी मजबूत नहीं है. अगर मनोज सिन्हा के नाम की घोषणा होती है तो यह पूरी तरह से केंद्रीय नेतृत्व का फैसला होगा.’

उत्तर प्रदेश से दूसरा नाम एक और पूर्व केंद्रीय मंत्री का है. शाहजहांपुर से लोकसभा सांसद रहीं कृष्णा राज के बारे में भी चर्चा है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा भेज सकती है. वे मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में राज्यमंत्री थीं. लेकिन लोकसभा चुनावों में उनका टिकट काट दिया गया था. अब चर्चा इस बात की है कि उन्हें राज्यसभा भेजकर भाजपा प्रदेश के दलित वर्ग को यह संकेत देना चाहेगी कि वह उनके हितों की चिंता कर रही है. उनका महिला होना भी उनके पक्ष में बताया जा रहा है.

राज्यसभा की सीट पर उत्तर प्रदेश के दावेदारों में तीसरा नाम पार्टी महासचिव अरुण सिंह का है. अरुण सिंह संगठन में काफी समय से सक्रिय हैं और उत्तर प्रदेश के ही हैं. पार्टी के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में सांगठनिक स्तर पर मेहनत करके वे अमित शाह के विश्वस्त लोगों में शामिल हो गए हैं. भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘अमित शाह की कोर टीम का तकरीबन हर नेता राज्यसभा में है और इनमें सिर्फ अरुण सिंह ही ऐसे हैं जिनके पास संगठन से अलग कोई पद नहीं है. ऐसे में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उन्हें राज्यसभा भेजने का निर्णय ले सकते हैं.’

जहां तक बात बिहार की है तो मोटे तौर पर इस बात को लेकर सियासी जगत में सहमति दिख रही है कि यह सीट एनडीए में शामिल जेडीयू को ही जाएगी. इसकी वजह है कि जेडीयू बिहार विधानसभा में भाजपा से बड़ी पार्टी है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस सीट पर किन-किन नेताओं की दावेदारी बन सकती है?

जेडीयू से सबसे अधिक चर्चा पार्टी के मुख्य महासचिव केसी त्यागी के नाम की है. केसी त्यागी पहले भी पार्टी की तरफ से राज्यसभा में रहे हैं. जेडीयू बिहार की सत्ताधारी पार्टी है लेकिन केसी त्यागी उत्तर प्रदेश के हैं. इसलिए बिहार से जेडीयू उन्हें चुनाव में उतार नहीं सकती और बिहार से बाहर केसी त्यागी के लिए जेडीयू के टिकट पर चुनाव जीतना बेहद मुश्किल है. ऐसे में उनके पास सिर्फ राज्यसभा का ही विकल्प बचता है.

हालांकि, बिहार की राजनीति को जो लोग करीब से देख रहे हैं, उनमें से कुछ का मानना है कि शायद केसी त्यागी को इस बार राज्यसभा भेजने का निर्णय नीतीश कुमार न लें. इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि साल भर में ही बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में संभव है कि नीतीश कुमार किसी ऐसे नेता को राज्यसभा भेजना चाहें जिसकी विधानसभा चुनावों के लिहाज से उपयोगिता हो.

इसके पक्ष में कहा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से दोनों पार्टियों के रिश्ते काफी असहज हैं. भाजपा पिछले कुछ महीनों से जेडीयू पर दबाव बनाने की कोशिश करती रही है. और दोनों पार्टियां में अगले मुख्यमंत्री के नाम को लेकर काफी बयानबाजी भी चलती रही है. इससे पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में जेडीयू को सांकेतिक प्रतिनिधित्व देने की बात की गई थी और फिर उसके जवाब में नीतीश कुमार ने भी अपने मंत्रिमंडल विस्तार में भाजपा को सिर्फ एक ही मंत्री पद देने की पेशकश की थी.

ऐसे में माना जा रहा है कि राज्यसभा सीट के उम्मीदवार का चयन करते वक्त नीतीश कुमार उस संभावित स्थिति को भी ध्यान में रख सकते हैं जिसमें उन्हें अकेले चुनाव लड़ना पड़ सकता है. उस हालत में हो सकता है कि नीतीश कुमार अल्पसंख्यक समुदाय से किसी सदस्य को राज्यसभा भेजने का निर्णय लें. अगर जेडीयू भाजपा से अलग होती है तो आरजेडी के साथ रहने वाला अल्पसंख्यक समुदाय फिर से जेडीयू का रुख कर सकता है. बशर्ते जेडीयू की ओर से भी इस समाज में अपने प्रति भरोसा पैदा करने के लिए कुछ कदम उठाए जाएं.

अगर बिहार में यह सोच काम करती है तो किशनगंज से पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू के उम्मीदवार रहे सैयद महमूद अशरफ राज्यसभा भेजे जा सकते हैं. बिहार में जिन 17 सीटों पर जेडीयू लोकसभा चुनाव लड़ी थी, उनमें से सिर्फ किशनगंज सीट पर ही उसे हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन पार्टी के 16 लोकसभा सांसदों में एक भी मुस्लिम नहीं हैं. और राज्यसभा में पार्टी की इकलौती मुस्लिम सांसद कहकशां परवीन का कार्यकाल अगले साल अप्रैल में खत्म होने वाला है.

जेडीयू की ओर से राज्यसभा सीट को लेकर दो नामों की और चर्चा है. इनमें एक नाम पवन वर्मा का है. वे पहले भी जेडीयू की ओर से राज्यसभा में रहे हैं. लेकिन उनके खिलाफ भी वही बात जा रही है कि बिहार की चुनावी राजनीति में उनकी कोई खास उपयोगिता नहीं है. वहीं दूसरा नाम सभी को हैरान कर सकता है. यह नाम है बिहार सरकार पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह का. वे रिटायर होने के बाद भी मुख्यमंत्री के सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं. उनके बारे में भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि नीतीश कुमार उन्हें राज्यसभा भेज सकते हैं.