दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले का बिजबेहरा कस्बा जम्मू-कश्मीर की मुख्य राजनीतिक पार्टियों में से एक - पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) - का घर माना जाता है. इसके संस्थापक, मुफ्ती मोहम्मद सईद यहीं जन्मे थे. और यहीं पर वे अपने पुश्तैनी घर से थोड़ी दूर पर सुपुर्द-ए-खाक़ भी किये गये थे. उनके दो भाइयों के परिवार अभी भी उसी घर में रहते हैं. इसका एक हिस्सा पार्टी ऑफिस को समर्पित है और एक हिस्सा मुफ़्ती के बच्चों की भी विरासत है.

और अब यह घर बिक रहा है! सत्याग्रह को मुफ़्ती परिवार के सूत्रों से पता चला है कि उनके परिवार के लोगों ने इसे बेचने के बारे में तभी सोचना शुरू कर दिया था जब अनुच्छेद 370 को हटाये जाने से एक दिन पहले उनकी सुरक्षा के लिए तैनात पुलिसकर्मियों को हटा दिया गया था.

ऊपरी सतह से देखें तो ऐसा लगता है कि घर बेचने का फैसला सुरक्षा की चिंता के चलते लिया गया है. लेकिन मुफ़्ती परिवार में लोगों से बात करें तो इस घर का बेचा जाना कश्मीर में मुख्यधारा की राजनीति की कहानी बयान करता है. कहानी यह है कि भारत सरकार के अनुच्छेद 370 हटाये जाने के फैसले से कश्मीर की मुख्य धारा की पार्टियों पर गहरे काले बादल छा गए हैं. और जानकारों की मानें तो कश्मीर में राजनीति की मुख्यधारा ही खत्म होती दिखाई दे रही है.

‘हम अपने ही लोगों को मुंह नहीं दिखा पा रहे हैं. वो लोग जो हमारी बात सुनते थे आज हमारी अक्लमंदी और नीयत पे सवाल उठा रहे हैं’ मुफ़्ती परिवार के एक सदस्य सत्याग्रह को बताते हैं.

सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ है? जबकि कश्मीर में मुख्यधारा के सभी नेता भी हिरासत में हैं और कइयों को उनके परिवारों से मिलने तक की इजाज़त नहीं दी जा रही है. इस चीज़ को समझने के लिए सत्याग्रह ने कश्मीर में अलग-अलग विचारधाराएं रखने वाले लोगों से कई दिनों तक बात की. इसमें जो निकलकर आया वह एक जैसा और बिलकुल स्पष्ट था - कश्मीर में राजनीति की मुख्यधारा इस समय अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है.

‘इन लोगों की पूरी राजनीति कश्मीर को भारत के संविधान से मिली खास पहचान के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. सीधी बात यह है कि जब वह खास पहचान ही नहीं रही तो ये लोग राजनीति किस चीज़ पर करेंगे’ कश्मीर में काम कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

अगर कश्मीर में सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनावों का प्रचार ही उठाकर देख लिया जाये तो यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है. प्रचार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती ने बार-बार यह कहा था कि अगर भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया तो यह राज्य भारत से अलग हो जाएगा.

‘फिर कश्मीर का अलग से प्रधानमंत्री होगा’ उमर ने एक रैली में कहा था. इसके बाद बाकी लोगों के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी उमर अब्दुल्ला की कड़ी निंदा की थी. ‘अब जबकि 370 हटा दिया गया है और जम्मू-कश्मीर भारत से अलग नहीं हुआ है तो ये राजनेता लोगों के पास किस मुंह से जाएंगे’ मुफ़्ती परिवार के ही एक दूसरे सदस्य सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

तो क्या वाकई कश्मीर में मुख्य धारा खतम समझी जाये ?

इस बात का कोई सीधा सा जवाब नहीं है. लेकिन अभी के लिए संकट ज़रूर है और संकट बहुत भारी है. अगर कश्मीर के एक नए मुख्यधारा के नेता और पूर्व आईएएस अफसर, शाह फैसल, के शब्दों में बात कही जाये तो ‘कश्मीर में अब या तो भारत की कठपुतलियां होंगी या फिर अलगाववादी नेता. अब स्लेटी रंग के कोई स्वरूप नहीं बचे हैं यहां.’

फैसल को इस बयान के फौरन बाद गिरफ्तार कर लिया गया था और वे अभी तक बंद ही हैं कश्मीर के बाकी मुख्यधारा के राजनेताओं के साथ.

कश्मीर में मुख्यधारा के सबसे वरिष्ठ नेता, फारूक अब्दुल्ला भी थोड़ा अलग तरह से इस बाबत अपना आक्रोश जता चुके हैं. फारूक अब्दुल्ला ने आखिरी बार छह अगस्त को मीडिया से बात की थी. तब उनका कहना था कि ‘ऐसा हिंदुस्तान में मैंने कभी नहीं देखा है.’

और किसी मुख्यधारा के नेता के साथ बात करने और चीजों को बेहतर समझने का कश्मीर में इस समय कोई तरीका नहीं है. यहां के सारे छोटे-बड़े नेता श्रीनगर के एक होटल में बंद हैं और उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को एक स्टेट गेस्ट हाउस में रखा गया है.

इन लोगों को अपने घरवालों से भी मुश्किल से ही मिलने दिया जा रहा है और संतूर होटल में सूत्रों की मानें तो आपस में बात करते हुए भी इन नेताओं को कश्मीर में अभी चल रहे हालात पर बात करने की इजाज़त नहीं है. ‘जब इन लोगों को आपस में बात करने की अनुमति दी जाती है तो एक पुलिसकर्मी पास में ही खड़ा रहता है’ होटल का एक सूत्र सत्याग्रह को बताता है. ऐसे में यह पता करना कि ये लोग अपने भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं, बेहद मुश्किल है.

ऐसे हालात में सत्याग्रह ने कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में जाकर मुख्यधारा के राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बात की और यह जाना कि ये सभी लोग इस वक्त बेहद निराश और हताश हैं.

बिजबेहरा में मुफ्ती मोहम्मद सईद के घर से थोड़ी ही दूर नेशनल कॉन्फ्रेंस के मझोले स्तर के एक नेता का पुश्तैनी घर है. वे अनंतनाग में अपने सरकारी आवास को छोड़कर बीती चार अगस्त से यहीं रह रहे हैं. चूंकि अनंतनाग में उन्हें अपनी गिरफ्तारी का खतरा था और उन्हें अपने बेटे की शादी भी करनी थी इसीलिए वे अपने पुश्तैनी घर चले आये थे. लेकिन शादी से कुछ दिन पहले कुछ अज्ञात लोग उनके यहां एक चिट्ठी डालकर चले गए. इसमें उन्हें बिजबेहरा में शादी न करने की धमकी दी गई थी.

‘यह आने वाला कल दर्शा रहा है. हम खतम हो गए हैं’ नेता जी के परिवार के एक सदस्य सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘लोग अब हमें बड़ी अजीब नज़रों से देखते हैं, जैसे कि हम कोई अपराधी हों...शायद अपराध ही था, लोगों को यह बोलना कि हम भारत के साथ ही सुरक्षित हैं.’

विडंबना यह है कि यह परिवार 90 के दशक में मिलिटेंट्स के डर से अपना घर छोड़कर सरकारी आवास में रहने गया था, सिर्फ इसलिए कि इसे भारत के साथ अपना भविष्य सुरक्षित दिखता था.

ऐसे ही एक और राजनीतिक कार्यकर्ता से सत्याग्रह की मुलाक़ात श्रीनगर के संतूर होटल के बाहर हुई, जहां वे अपने नेता और श्रीनगर के डेप्युटी मेयर, शेख इमरम, से मिलने आए थे.

अपना नाम गोपनीय रखने की शर्त पर उन्होंने सत्याग्रह को बताया, ‘कुछ समय पहले तक भारत सरकार हम लोगों को जनतंत्र की बुनियाद कह रही थी और अब हम ही लोग हैं जो जेलों में पड़े हुए हैं. क्या मुंह दिखाएंगे लोगों को.’

इन राजनेताओं की गिरफ्तारियां भी कई तरीके से इनकी राजनीति को तबाह कर रही हैं. और उसमें से सबसे बड़ा असर यह है कि इनके कार्यकर्ता मायूस हो गए हैं. पुलवामा जिले के टहब इलाक़े में सत्याग्रह की मुलाक़ात पीडीपी के एक कार्यकर्ता से हुई जो पार्टी के एक युवा नेता, वहीद-उर-रहमान पररा, की वजह से शामिल हुआ था. पररा को गिरफ्तार करके कश्मीर से बाहर किसी जेल में भेज दिया गया है.

यह कार्यकर्ता कहता है कि जब उनके नेता की ऐसी हालत कर दी है भारत सरकार ने तो उसकी क्या औकात है. ‘पररा साहब को मैं अपना प्रेरणास्रोत मानता था और मुझे लगता था उनकी भारत सरकार में बड़ी इज्ज़त और पहुंच है. उनकी हालत देखकर अब समझ आया भारत कभी हमारा था ही नहीं.’

ज़ाहिर है भारत सरकार भी इन सब चीजों से बेखबर नहीं होगी. लेकिन ऐसा लग रहा है कि उसका भी मूड कश्मीर में मुख्यधारा की छवि ठीक करने का नहीं है.

जबसे अनुच्छेद 370 हटाया गया है लगातार न केवल मुख्यधारा के नेताओं को भ्रष्ट कहा जा रहा है बल्कि अब कोशिश भी हो रही है कि कश्मीर में मुख्यधारा की राजनीति के चेहरे ही बदल दिये जाएं. इस कोशिश से जुड़े कम से कम दो उदाहरण तो दिये ही जा सकते हैं.

बीती तीन सितंबर को गृह मंत्री, अमित शाह, दिल्ली में कश्मीर के पंचायत सदस्यों के एक समूह से मिले. यहां उनको जीवन बीमा देने के अलावा यह भी कहा गया कि कश्मीर में अगला मुख्यमंत्री उनके बीच में से ही होगा.

‘अब होगा या नहीं ये बाद की बात है, अभी इसका साफ मतलब यह निकलता है कि कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी भारत सरकार की ‘गुड बुक्स’ में नहीं हैं’ कश्मीर के एक राजनीतिक टिप्पणीकार, शाह अब्बास सत्याग्रह को बताते हैं.

इसका एक और उदाहरण नौ सितंबर का है जब श्रीनगर के सरोवर पोर्ट्रिको होटल में चार अंजान लोगों ने जम्मू एंड कश्मीर पॉलिटिकल मूवमेंट (आई) के नाम से एक नयी राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया. यह ऐलान उन्होने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किया और यह कश्मीर में पांच अगस्त के बाद ऐसी पहली गैर सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस थी जिसे रोका नहीं गया.

अब पंचों में से मुख्यमंत्री आएगा या नयी राजनीतिक पार्टी से, कहना मुश्किल है. लेकिन जो बात बड़ी आसानी से कही जा सकती है वह यह है कि कश्मीर में मुख्यधारा की राजनीति इस समय बहुत मुसीबत में है और जेल में भी.