उत्तर प्रदेश के प्रांतीय पुलिस बल या पीएसी का गठन अंग्रेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किया था. मूल रूप से दंगा विरोधी बल के रूप में गठित यह संगठन भारत की आजादी के बाद भी कई सालों तक देश का सबसे सक्षम बल माना जाता रहा. 1960 के दशक तक पीएसी को उत्तर प्रदेश पुलिस की तुलना में काफी बेहतर सुविधाएं और सेवा दशाएं दी जाती थीं. लेकिन 1970 आते-आते इस बल पर जहां काम का बोझ बढ़ा, वहीं सुविधाओं में तेजी से गिरावट आने लगी. इससे बल के अंतर्गत कार्य कर रहे जवानों में असंतोष बढ़ने लगा.

इस बीच राज्य सरकार के उदासीन रवैये ने जवानों में इस हद तक असंतोष पैदा कर दिया कि वे बल के भीतर ही स्वतंत्र दस्तों की तरह व्यवहार करने लगे. इसी दौरान मई, 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राज्य का दौरा किया. उस समय सारे देश में केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल तैयार हो रहा था, इसलिए जब श्रीमती गांधी राज्य के दौरे पर आईं तो सरकार ने पीएसी से तुरंत उनकी सुरक्षा के लिए तैनात होने के लिए कहा लेकिन बल ने तैनाती का आदेश मानने से इनकार कर दिया.

राज्य सरकार के लिए यह बड़ी असमंजस की स्थिति थी. हालात संभालने के लिए तब तुरंत ही सेना को बुलाया गया. सेना के राज्य में आने के बाद पीएसी के जवानों ने राजधानी लखनऊ सहित राज्य के कई शहरों में हुड़दंग मचाई. राज्य सरकार ने अनौपचारिक रूप से तुरंत इन हालात को पीएसी में विद्रोह घोषित करते हुए सेना से बल पर नियंत्रण करने के लिए कहा. इसके बाद हालात और बिगड़ने लगे. कई जगह सेना और पीएसी के जवानों के बीच गोलीबारी होने लगी. यह पूरा घटनाक्रम कुल पांच दिन चला जिसमें आखिरकार सेना पीएसी के तमाम शस्त्रागारों पर नियंत्रण कर लिया. कहा जाता है कि इस दौरान पीएसी के तकरीबन सौ जवानों की मौत हुई औऱ सैकड़ों जवान घायल हुए. इस घटना के बाद तकरीबन एक हजार जवानों पर मुकदमा भी चला.

इस घटना से सबक लेते हुए बाद में राज्य सरकार ने पीएसी के लिए कुछ अलग से राहत योजनाएं चलाईं और उन्हें नकद रुपए के रूप में राहत भी दी गई.