स्वच्छता

उस कैंप में जो गंदगी थी, उसकी तो कोई इंतिहां नहीं थी. वो गंदगी क्यों थी. उसके पीछे हमारी एक पुरानी आदत है, हिंदुओं और मुसलमानों की. क्योंकि मैं तो हिंदू कैंप में भी गया हूं और मुसलमानों के कैंप में भी गया हूं. लेकिन यहां मुझको तो नाक है ही नहीं. कोई न सुगंध आती है, दुर्गंध आती है. लड़कियां तो मेरे ऊपर हंसती हैं - हां, तुमको नाक रहता तो कैसे वहां खड़े रह सकते थे. इतनी वहां से बदबू निकलती है. किसी ने मुझको वहां से इशारा भी किया कि अरे यहां पैखाने हैं. तो पैखाने तो नरक की खान हैं. क्यूं ऐसे हैं, कौन साफ करे! अगर मैं उस कैंप का कमांडर होऊं तो मैं तो उसे बर्दाश्त ही नहीं करूंगा. और मैं रहा हूं इस तरह से. मेरे मातहत जो कैंप रहती थी, वो कैंप ऐसी गंदी नहीं रह सकती. अगर सिपाहियों से कहो कि इतना गंदा, यहां मैला रहता है, वो क्यूं रहता है? तो वो कहेंगे कि हमारा वो काम कहां है? हमको तो बंदूक चलाने का हुकुम है. आज जो हमारी मिलिट्री है, आज हमारे जो सिपाही हैं उनके हाथों में एक कुदाली भी होनी चाहिए, एक फावड़ा भी होना चाहिए जिससे कहीं भी गंदगी हो तो उसे साफ करें. पहले-पहल उनका वो काम होना चाहिए. मैं तो बहुत कठोर हृदय का आदमी हूं. मैं तो कहूंगा मैंने किया है ऐसा. हरिद्वार में जब कुंभ का मेला था तो हमारा सबका काम था कि वहां कैंप के सैनिटेशन का. उसके लिए हम निकल जाते थे. और वो सब मैला करते थे जो यात्री लोग आते थे. तो उसको सब साफ कर देते थे. मुझको तो इसके बिना चैन नहीं हो सकता था. सबको तालीम दी गई. लेकिन मैं कहूंगा कि उसका (सेना का) पहला काम है कि अपने कैंपों को बिल्कुल साफ रखना.

(14 सितम्बर 1947 को विभाजन से विस्थापित हुए लोगों के शिविरों का मुआयना करने के बाद बोलते हुए)

हिंदू धर्म का स्वरूप

यहूदियों का सिनेगॉग हो या क्रिस्तियों का गिरिजाघर या सिखों का गुरुद्वारा, सबकी रक्षा और सबके लिए उतना ही आदर होगा जितना हिंदुओं के मंदिर हैं, उनका होगा. और वहां भी जो जंगली माने जाते हैं, उनके लिए भी उतनी ही जगह, उतना आदर होगा जितना एक ऊंची से ऊंची कास्ट के हिंदू का होता है. इसके माने ये हो गए कि इसमें हिंदू धर्म में... सच्चे हिंदू धर्म में कास्ट, छुआछूत और एक जंगली और एक बड़ा है, इन सब चीजों का स्थान नहीं रह सकता है. उसमें सर्वधर्म का समुच्चय-समावेश तो होना ही चाहिए. अगर नहीं होता है तो मेरी निगाह में वो हिंदू धर्म नहीं है.

(12 जून, 1947 की प्रार्थना सभा के बाद बोलते हुए)

अस्पृश्यता

ये अस्पृश्यता की जड़ हर एक हिंदू के दिल में से निकल जाए तो हम बहुत ऊंचे चढ़ने वाले हैं. और जब अस्पृश्यता की जड़ निकल गई तो हम क्या मुसलमानों को या दूसरे कोई धर्मी है उनको अस्पृश्य बनाने के जैसे बात होगी? मैं समझता हूं यह हमारे धर्म पर एक बड़ा कलंक लग गया है. तो अस्पृश्यता को मिटाने के लिए हम खुद अस्पृश्य बन जाएं. अगर हम अस्पृश्य बनें झाड़ू लगाने का काम करें, वो कोई खराब काम थोड़े ही है. वो तो बहुत अच्छा काम है. स्वच्छता रखना, वो तो धर्म है, वो तो धार्मिक काम हो जाता है. अगर हम सब अस्पृश्य बन जाएं तो जो अस्पृश्यता का कलंक है उसका नाश हम कर देंगे.

(26 अक्टूबर 1947 को प्रार्थना सभा के बाद बोलते हुए)

आपसी फूट

हम स्वार्थवश आपस में न लड़ते-भिड़ते तो अंग्रेजी ताकत कितनी भी बड़ी थी वह इतने बरसों तक हमको सताती नहीं. जब हममें जागृति हो गई, हम समझ गए कि हम हैं तो वो हैं. हम नहीं हैं तो वो हो नहीं सकते. अगर ये अंग्रेजों के लिए सच्चा था तो आज भी सच्चा ही है.

(13 मई, 1947 को प्रार्थना सभा के बाद बोलते हुए)

सत्ता की चाह

मैं ये देख रहा हूं कि हमारे मुल्क में काफी जगह पर आज सत्याग्रह चलता है, ऐसा कहते हैं. पर मुझको बड़ा शक है. जिस जगह पे वो कहते हैं सत्याग्रह चलता है, वहां सचमुच वो सत्याग्रह है कि दुराग्रह है. आज जो कोई भी आदमी भले पोस्ट ऑफिस के हों, टेलीग्राम ऑफिस के हों, रेलवे के हों या तो देश के राज्यों में हों, देश के बारे में सोचने की जगह सत्ता लेने की कोशिश कर रहे हैं. उन सबको इतना समझ लेना चाहिए कि हम ये काम जो कर रहे हैं, वो सत्य है या असत्य है. अगर असत्य है तो उसका आग्रह क्या करना. अगर सत्य है तो सत्य का आग्रह हमेशा हर हाल में करना ही चाहिए.

(3 अक्टूबर 1947 को प्रार्थना सभा के बाद बोलते हुए)