1. बापू, आप 125 वर्ष जीना चाहते थे. अभी 150 साल के हो गए. क्या कहेंगे?

125 साल जीने की बात कभी कही थी, यह सच है. लेकिन सचमुच उतना जी पाता, तो जीने की इच्छा बची रहती, ऐसा नहीं कह सकते.

2. इतनी निराशा क्यों?

कई कारण हैं. भारत में कौन बूढ़ा जल्दी मरना चाहता है? मैं तो अस्सी का भी न हुआ था. फिर भी लगता है कि जीते जी ऐसा भारत और ऐसी दुनिया देखने से अच्छा था कि समय रहते ठिकाने लगा दिया गया.

3. ऐसा भारत और ऐसी दुनिया से क्या मतलब? राग-रंग और चकाचौंध से भरी आज की जगमग दुनिया सन् अड़तालीस की दुनिया से क्या बुरी है?

चकाचौंध है, मानता हूं. लेकिन जगमग है, ऐसा नहीं कह सकते. जीवन में अंधेरे-उजाले का इतना मोटा-मोटा अर्थ भी नहीं लेना चाहिए. सन् अड़तालीस की दुनिया बहुत अच्छी नहीं थी. लेकिन बेहतर संभावनाओं की खिड़कियां खुली थीं. इन 71 सालों में हमारी दिशा क्या रही, या आज ही हम किस ओर बढ़ रहे हैं, यह भी देखना होगा. समाज, संस्कृति, राजनीति और अर्थनीति में गुलामी बढ़ी है या घटी है? हमारी मानसिक गुलामी बढ़ी है या घटी है? ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, आदमी और औरत के बीच का भेदभाव मिटा है या बढ़ा है?

यदि चकाचौंध से तुम्हारा मतलब मशीनें और उपकरण बढ़ जाने से है, दिखावा और उपभोग बढ़ जाने से है, तो वह जरूर बढ़ा है. लेकिन साथ-ही-साथ गुलामी, शोषण, भेद-भाव, आपसी द्वेष, रोग, निराशा, युद्ध और विनाश भी बढ़ा है. तो ऐसी चकाचौंध किस काम की, जिससे हमारी आंखें ही चुंधिया जाएं, जो हमें आंख रहते अंधा बना दे.

4. बापू, क्या सभी बूढ़े ऐसी बात नहीं करते? ‘पहले का सबकुछ अच्छा थाटाइप बातें? क्या यह अतीत को गुलाबी चश्मे से देखने वाला रवैया नहीं है?

नहीं, सभी बूढ़े ऐसी बात नहीं करते. बल्कि अक्सर बूढ़े ऐसी बातें नहीं करते. पिछली दो-तीन पीढ़ियां आज बूढ़ी हो गईं, उन्होंने ऐसी बातें नहीं कीं. और कीं भी तो वे सिर्फ बातें ही थीं. दुनिया को इस हालत में उन्होंने ही पहुंचाया. मेरी पीढ़ी में भी सभी मेरी तरह सोचते हों, ऐसा नहीं था. भारत वैसा नहीं बना, जैसा मैंने 1909 में ‘हिंद स्वराज’ में सोचा था. जैसा मैं मरते दम तक सोचता रहा या बनाने की कोशिश करता रहा, वैसा भारत तो कतई नहीं बना.

5. आप कैसा भारत बनाना चाहते थे?

110 साल पहले ‘हिंद स्वराज’ में इसका जवाब लिख चुका हूं. बहुत पतली सी किताब है. सस्ती भी है. एक कप कॉफी की कीमत में आ जाती होगी. तुम्हारे इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध है. माफ करना, लेकिन तुम्हारी पीढ़ी में पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति इतनी कम क्यों है? मैंने तो जेल में ही सैकड़ों पुस्तकें पढ़ डाली होंगी. इतनी ही किताबें रेलगाड़ी में दौड़ते हुए पढ़ी होंगी. जवानी में भी खूब पढ़ता था. बुढ़ापे तक पढ़ता रहा. भारत भी ऐसा बनाना चाहता था जिसमें दिन भर हाथों से काम हो, लेकिन सुबह-शाम ज्ञान-चर्चा हो, अध्यात्म-चर्चा हो, पठन-पाठन हो. पहले भारत के ग्रामीणों का जीवन ऐसा ही था. अब शायद वहां भी ऐसा नहीं रहा.

6. आपकी बात आपके खुद के चुने उत्तराधिकारियों को समझ में क्यों नहीं आई?

मेरी कोई सत्ता या कोई साम्राज्य तो था नहीं कि मैं किसी को अपना उत्तराधिकारी बनाता. लेकिन समय की मांग थी. अंगरेज़ जा रहे थे. किसी को तो शासन की बागडोर संभालनी थी. सबको साथ लेकर चलना था. अराजकता के बीच देश को एक सूत्र में पिरोना था. दिलों को जोड़ना था. तब यह चुनौती थी. अंतरिम सरकार एक परिवार की तरह काम कर रही थी. मतभेद रहे होंगे. कहां नहीं होते हैं? मैं लगातार उनसे संवाद में था. अपनी बात समझाने की कोशिश कर ही रहा था.

7. फिर भी उनके समझ में क्यों नहीं आई होगी?

वे कुछ ज्यादा अंग्रेजी पढ़-लिख गए थे. पढ़ा मैंने भी था. लेकिन बहुत प्रयासों से उस पश्चिमी ठगविद्या से बाहर निकल सका. वे नहीं निकल सके होंगे. और क्या कह सकता हूं. विनोबा को मेरी बात समझ आई, कुमारप्पा को आई. बादशाह खान समझते थे. थोड़ा-बहुत लोहिया और जयप्रकाश भी समझते थे और भी कुछ लोग समझते थे. देश की बहुतेरी जनता समझती थी.

8. लेकिन बापू, गहन चर्चा के बाद आम सहमति से एक संविधान तो बना ?

विधान तो बना. बहुत थोड़े मायनों में अच्छा भी बना. लेकिन उसमें समाज की वास्तविक आजादी का सपना नहीं था. उसने राजनीति और शासन को प्रमुखता दी. राज्य को सर्वशक्तिमान बना दिया. ऐसा बना दिया कि कोई भी सरफिरा उस केंद्रीकृत सत्ता का दुरुपयोग कर संसद और कार्यपालिका को अपनी उंगली पर नचाने लगे. हमने शाब्दिक रूप में ‘हम भारत के लोग’ कहा जरूर, लेकिन भारत के लोकसमाज को पंगु बना दिया. वह राजनीति और शासन का मुंह देखने पर मजबूर किया गया और बाद में उसका आदी और अभ्यस्त हो गया. उसका स्वावलंबन, उसका आत्मसम्मान, उसकी पहलकारी शक्ति, उसकी रचनात्मकता और उसकी आज़ादी उसी दिन समाप्त हो गई. उसका सपना मर गया, क्योंकि राज्य-सत्ता ने उस सपने को एकाधिकारपूर्वक हड़पकर उसका कुछ-का-कुछ कर दिया.

9. कहीं आपका इशारा हमारी संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली की ओर तो नहीं है?

राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही पद्धतियां हमने निकम्मी चुनी. भारत की मूल आत्मा से रहित एक यांत्रिक, नीरस, पैसे को पूजने वाली पद्धति हमने चुनी. कहां तो इस देश के दरिद्रनारायण को वास्तव में इस देश का सच्चा मालिक बनना था, कहां उसे हमने और भी दबी-कुचली और डरी हुई कौम बना दिया. मैंने मरने से कुछ दिन पहले तक कहा था कि मेरा पहला काम होगा यहां की पुलिस को सुधारने का. पुलिसिया मानसकिता को बदलने का. सत्ता की प्रकृति को और प्रवृत्ति को बदलने का. अदालतों की अन्यायपूर्ण व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने का. चिकित्सकों और शिक्षकों को नैतिक रूप से चरित्रवान बनाने का. लड़के-लड़कियों को स्वतंत्रबुद्धि बनाने का. उन्हें मातृभाषा में ज्ञान-विज्ञान पढ़ाकर वैज्ञानिक और कर्मनिष्ठ बनाने का. गांवों को स्वच्छ, स्वावलंबी और स्वराज्य का जीता-जागता नमूना बनाने का. किसानों को, मजदूरों को सच्चा शहंशाह बनाने का.

एक नए राष्ट्र में कितना कुछ होना था. नागरी जीवन में भी ग्राम्यता का रस घुलना था. धरती को हरा-भरा बने रहना था. जल और हवा को शुद्ध बने रहना था. पंचायती राज के जरिए व्यक्ति-व्यक्ति को अपनी बात रखने का मौका मिलना था. हर व्यक्ति को सच्चे मायनों में प्रबुद्ध बनना था. सामाजिक स्वामित्व की भावना बची रहनी थी. हर प्रकार का छुआछूत मिटना था. जातिगत भेद-भाव, सांप्रदायिक दूरियां और हर प्रकार की गैर-बराबरी मिटनी थी. अपनी-अपनी पहचान के साथ भी सबको एकमेक होना था.

ऐसा ही अर्थनीति के मामले में भी होना था न? पूंजीपतियों के हाथों में देश की सारी संपत्ति सौंपकर बाकी सबको उनका गुलाम नहीं बनाना था. उन्हें बहुत-से-बहुत ट्रस्टी बनाना था. भूमि, पूंजी, उद्योग सबमें सबकी सामूहिक भागीदारी होनी थी. शासन में भी सबकी भागीदारी होनी थी. लेकिन आज तो शासन ही राक्षसी हुआ बैठा है. जनता डरी हुई है. वह शासन पर अंकुश लगाकर क्या रखेगी, वह या तो डरकर या गुलाम मानसिकता के वश उसका जयकारा करने में लगी है. और शासन भी क्या है, वह तो धन-मदारियों के इशारों पर नाचने वाला बंदर हुआ जा रहा है. सत्ता एक दल से दूसरे दल के हाथों में आ भी जाए तो क्या, नए बंदर की डोर पुराने मदारियों के हाथों में ही तो रहती है.

10. अच्छा बापू, जो हो गया उसका तो क्या ही कहें. आगे क्या हो सकता है?

अगर ऐसा ही सबकुछ चलता रहा, तो अब बस प्रलय का इंतजार कर सकते हैं. बल्कि वह शुरू हो चुकी है. बस दिखाई नहीं देती, क्योंकि यह अचानक से और एकबारगी नहीं हो रहा है इसलिए. अब उसी अवश्यंभावी प्रलय का इंतजार हो सकता है, और क्या?

बहुत प्रयास कर थोड़ा आशावादी नजरिए से देखें तो ऐसा लगता है कि मनुष्य जाति को दिनानुदिन अहिंसा, संयम, शांति और प्रेम का मर्म समझ में आ रहा है. उसे सांप्रदायिक बाड़े से अलग एकमात्र मानव-धर्म वाली बात समझ में आ रही है. यदि ये बातें दुनियाभर के अहंकारी राष्ट्राध्यक्षों, छलनीति के अभ्यस्त कूटनीतिकों, सेनानायकों, हथियार के सौदागरों, कट्टरता में अंधे हो चुके धर्मध्वजियों और अंतहीन लोभ से ग्रसित प्राकृतिक संपदा के लुटेरों को भी समझ में आ जाए, तो यह प्रलय टल सकती है.

11. अरे बापू, इन बातों के बीच मैं शहीद भगतसिंह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, भारत-पाकिस्तान बंटवारा, हिन्दू-मुसलमान, नेहरू-पटेल, कांग्रेस-बीजेपी जैसे ज्यादा जरूरी सवाल तो भूल ही गया.

हां, मेरे बच्चे इतने तरह के भय, उत्पीड़न, शोषण, असुरक्षा, तनाव, शारीरिक और मानसिक रोगों से बच जाना तो इन पर भी बातें करेंगे. जब अपने भीतर के द्वेष, घृणा, अहंकार, कट्टरता, जड़ता और अंधता से जन्मे आंतरिक युद्ध जीत जाओ, तब इन पर भी बात करेंगे.

जिस पश्चिम ने पूरब को भौतिक और मानसिक रूप से गुलाम बनाकर कहीं का नहीं छोड़ा था, वही आज भी अपने देशी नमूनों के जरिए यहां के संसाधन लूट रहे हैं. हमारे युवाओं को घटिया खान-पान और मन भरमाने वाले खिलौनों में उलझाकर पथभ्रष्ट और बीमार कर रहे हैं. हमें हथियार और लड़ाकू विमान बेच-बेचकर आपस में ही लड़ा रहे हैं. इन जहरखुरानों के जहर और बम-बारूदों से जिस दिन बच सको, उस दिन तुम्हारे धर्मपंथ, तुम्हारी पार्टी, तुम्हारे शहीदी आदर्शों के बारे में भी पूछूंगा-बताऊंगा. इतना जरूर कहता हूं कि भगत और सुभाष, नेहरू और सरदार को मैं तुमसे तो अधिक ही जानता और चाहता होऊंगा.

तुम तो अपनी हवा, अपना पानी, अपनी मिट्टी, अपनी नदियां और तालाब, अपने खेत और खलिहान बचा सको, अपनी कर्मठता और अपना रोजगार बचा सको, तो इन पर भी बातें करेंगे. तुम खुद को तो समझ ही नहीं पा रहे हो, अपने अस्तित्व, पंचतंत्व, प्रकृति के मौलिक नियमों से तो एकदम बेखबर जान पड़ते हो, लेकिन भगतसिंह और सुभाष की चिंता किए फिरते हो. किसी धर्म-संप्रदाय या पार्टी का झंडा लिए फिरते हो. पहले होश में आओ, तो इनका भी जवाब पाओगे. मैं नहीं दूंगा, तो भी खुद ही पाओगे.

मेरे बच्चे, जब तक किसी पंथमूढ़ता, नौकरवृत्ति, दलबंदी, झूठे ऐतिहासिक पीड़ाबोध से जन्मी आत्महीनता, भोगवादी देखा-देखी से उपजी कुंठाओं से नहीं उबरोगे, तब तक आज़ादी की सुगंध महसूस ही नहीं कर पाओगे. आज़ादी तो आनंद में मग्न मन की अवस्था है. वह अंतिम मुक्ति और छुटकारे का मार्ग भी है. वह आत्मदर्शन भी है. बाकी ये सवा सौ वर्ष और डेढ़ सौ वर्ष सब प्रपंच और दिखावा ही हैं.

जय हिंद! बापू.

जय जगत! मेरे बच्चे.