निर्देशक: सिद्धार्थ आनंद
लेखक: सिद्धार्थ आनंद और श्रीधर राघवन (पटकथा), अब्बास टायरवाला (संवाद)
कलाकार: ऋतिक रोशन, टाइगर श्रॉफ, वाणी कपूर, आशुतोष राणा, अनुप्रिया गोयनका, सोनी राज़दान
रेटिंग: 2.5/5

‘वॉर’ साल की उन फिल्मों में अव्वल नंबर पर आती है जिनके पहले शो की टिकटें सबसे ज्यादा बिकी हैं. यह रिकॉर्ड पहले सलमान खान की फिल्म ‘भारत’ के नाम था जिसके पहले मॉर्निंग-शो के करीब 60 फीसदी टिकट बुक किए गए थे. इस आंकड़े को पीछे छोड़ते हुए ‘वॉर’ के लिए देश भर में कुल 85 फीसदी टिकटों की बुकिंग की गई. यानी ‘वॉर’ का तीन सौ करोड़ कमाई वाले क्लब में शामिल होना तय माना जा सकता है.

जैसा कि होना ही था ‘वॉर’ की सबसे बड़ी खूबी उसका एक्शन है और जो नहीं होना चाहिए था वह यह कि इसकी सबसे बड़ी खामी इसका लेखन है. फिल्म की कहानी भारतीय सेना के दो ऐसे जांबाज़ एजेंटों की है जो असंभव कहे जा सकने वाले अभियानों को भी सफल बना सकते हैं. इनके जरिए फिल्म देशभक्त और गद्दार फौजी किरदारों के बीच का संघर्ष दिखाती है. लेकिन यह सबकुछ इतने ज़ाहिर ट्विस्टों के साथ होता है कि न सिर्फ कहानी का बल्कि आगे आने वाले दृश्यों का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है. अगर फिल्म में सरप्राइज एलीमेंट की बात करें तो वह यही है कि यशराज बैनर की फिल्म होते हुए भी वॉर में रोमांस का तड़का मिनिमम रखा गया है.

‘वॉर’ की दूसरी बड़ी खूबी इसके दो सुदर्शन नायक हैं. इन दोनों को साथ में डांस और एक्शन करते हुए देखना रोमांच से रोंगटे खड़े करने वाला अनुभव है. लेकिन अगर परदे पर एक्शन या डांस नहीं भी चल रहा हो तो भी ये दोनों हमें उसे नज़रें गड़ाकर देखने की एक वजह दे सकते हैं. लेकिन अपने मुख्य किरदारों के अभिनय के मामले में फिल्म औसत नंबर ही बटोर पाती है. यानी ऋतिक रोशन जहां ‘सुपर-30’ की अपनी परफॉर्मेंस से नीचे जाकर केवल ठीक-ठाक काम करते हैं, वहीं फिल्म के हीरो नंबर दो टाइगर श्रॉफ आपकी आशंकाओं को सही साबित करते हुए, आटे में नमक जितना ही अभिनय कर पाते हैं. इन दोनों के अलावा, अपनी छोटी-छोटी भूमिकाओं में आशुतोष राणा और अनुप्रिया गोयनका जितना खुश करते हैं, वाणी कपूर उतना ही निराश.

फिल्म का संगीत ऐसा है कि इसमें कोई नयापन नहीं है. लेकिन फिर भी यह अपना काम बखूबी कर देता है. फिल्म के दो गानों में से एक - घुंघरू टूट गये - की चर्चा अलग से इसलिए की जा सकती है क्योंकि यह मशहूर गीत ‘मोहे आई न जग से लाज’ का रिक्रिएटेड वर्ज़न है. उत्कृष्ट संगीत और सूफी दर्शन की पहचान बन चुका एक ऐसा गाना जिसे आबिदा परवीन, रुना लैला, आशा भोसले जैसी तमाम हस्तियों ने गाया और लोकप्रिय बनाया हो, उसका इतना वाहियात संस्करण सुनना भी संगीत प्रेमियों के लिए कुफ्र की तरह है. और इसके लिए, इसे बनाने वालों यानी संगीतकार जोड़ी विशाल-शेखर से ढेर सारी शिकायत है और हमेशा रहेगी.

‘बचना ऐ हसीनो’ और ‘बैंग-बैंग’ सरीखी फिल्में बनाने वाले सिद्धार्थ आनंद ने ‘वॉर’ का निर्देशन किया है. उनकी फिल्म के बाकी पहलुओं की बात करें तो पटकथा कमजोर होने के बावजूद ‘वॉर’ में इंटरवल के बाद आने वाले कुछ ट्विस्ट काफी रोमांचित करते हैं. फिल्म के लगभग हर बदलते सीक्वेंस के साथ इसकी लोकेशन भी बदल जाती है और बेहद खूबसूरत नज़ारों के जरिए यह आपको एशिया-यूरोप के कई देशों सहित ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका तक की यात्रा करवाकर लाती है. वॉर की एक्शन सीक्वेंसों के दौरान इस्तेमाल किए गए अनूठे सेट्स और वीएफएक्स भी खास तौर पर आपका ध्यान खींचते हैं.

कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि ‘वॉर’ में देशभक्ति के साथ मनोरंजन का भी भरपूर डोज है. और इसलिए भी इसका हिट होना तय है. अब अगर, एक लाइन में समझना हो तो बात इतनी सी है कि आप ‘वॉर’ को देखकर भी नहीं पछताएंगे और नहीं देखकर भी नहीं!

चलते-चलते: कभी-कभी कुछ बातें कहने के लिए कह देनी चाहिए. इसलिए याद दिलाते चलते हैं कि एक फन-फैक्ट यह भी है कि वॉर सरीखी हिंसा से भरी एक्शन फिल्म, अहिंसा का संदेश देने वाले महात्मा गांधी के 150वें जन्मदिन पर रिलीज हुई है.