हम भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताने में जो गर्व अनुभव करते हैं, उससे कहीं अधिक गर्व अंग्रेज़ ब्रिटेन को दुनिया का एक सबसे पुराना लोकतंत्र घोषित करने में करते हैं. वे भूल जाते हैं कि जो चीज़ जितनी प्राचीन होगी, उतनी ही आधिक किसी संग्रहालय या अभिलेखागार (आर्काइव) के उपयुक्त होगी, न कि आधुनिक जीवन के. ब्रिटेन में ‘ब्रेग्ज़िट’ के नाम से इस समय जो उठा-पटक मची हुई है, वह इस विरोधाभास को भी दिखाती है.

18वीं सदी के मध्य से ब्रिटेन एक संसदीय राजशाही है. संसदीय राजशाही का अर्थ है कि देश में संसद के साथ-साथ एक ऐसा राजसिंहासन भी है, जो सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार किसी एक ही वंश के राजा या रानी के लिए आरक्षित है. रानी एलिज़ाबेथ 1952 से इस राजसिहांसन को सुशोभित कर रही हैं. वे ही देश की औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष हैं. देश की जनता उनकी प्रजा है. भारत में बहुत से लोग ‘जनता’ और ‘प्रजा’ में अंतर नहीं कर पाते. ‘जनतंत्र’ या ‘लोकतंत्र’ को धड़ल्ले से ‘प्रजातंत्र’ भी कह देते हैं. भूल जाते हैं कि प्रजा वहीं हो सकती है जहां कोई राजा या रानी हो. सम्राट या साम्राज्ञी हो.

राजा या रानी की रस्मी भूमिका

ब्रिटिश राजसिंहासन का स्वामी ही संसद में बहुमत के अनुसार प्रधानमंत्री को नियुक्त या पदमुक्त करता है. सरकार के सभी कार्यकलापों की फ़ाइलें देख सकता है. वही सेना का सर्वोच्च कमांडर भी होता है. पर व्यवहारतः उसकी सारी राजनैतिक भूमिका केवल रस्मी होती है. दैनिक राजनीति में वह दखल नहीं देता. दैनिक राजनीति का सूत्रधार प्रधानमंत्री होता है. वही राजसिंहासन की ओर से देश की सरकार चलाता है. अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों का चयन करता है और उनके विभाग उन्हें बांटता है.

संसद की बैठक का हर दिन, नियमानुसार, राजा या रानी के शाही राजदंड को संसद के मध्य में एक आसन पर प्रतिष्ठापित करने के साथ आरंभ होता है. यह राजदंड राजा या रानी के वहां उपस्थित रहने के समान है. संसद की बैठक तभी तक चल सकती है, जब तक राजदंड भी अपनी जगह पर सुशोभित रहे. राजदंड यदि अपनी जगह पर नहीं दिखा, तो संसद की बैठक भी आगे नहीं चल सकती. कई बार ऐसा भी हो चुका है कि किसी लंबी बैठक से ऊब गये किसी या किन्हीं सांसदों ने राजदंड को चुपके से कहीं छिपा दिया, ताकि बैठक तुरंत ख़त्म हो जाये.

परंपरा यही है कि संसद ने जो कुछ भी पारित कर दिया, राजा या रानी ने उस पर अपने हस्ताक्षर की मुहर भी लगा दी. इसी के साथ संसद द्वारा पारित हर निर्णय क़ानून बन जाता है. 1707 के बाद से ब्रिटेन के किसी भी राजा या रानी ने संसद की ओर से प्रधानमंत्री द्वारा पेश किसी भी निर्णय पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर करने से मना नहीं किया है. इस बार भी प्रधानमत्री बोरिस जॉन्सन ने - 31 अक्टूबर तक यूरोपीय संघ से अलग होने-न होने की गहमागहमी के बीच संसद की बैठक को 9 सितंबर से पांच सप्ताहों तक स्थगित रखने का निर्णय जब रानी एलिज़ाबेथ के पास भेजा, तो उन्होंने उस पर हस्ताक्षर कर दिये.

17 से 19 सितंबर तक ब्रिटेन के सर्वोच्च न्यायालय में प्रधानमंत्री ज़ॉन्सन के विरुद्ध दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई हुई. उनमें सर्वोच्च न्यायालय से बताने का अनुरोध किया गया है कि बोरिस जॉन्सन ने रानी एलिज़ाबेथ की औपचारिक सहमति से संसद को जिस तरह पांच सप्ताहों की बलात छुट्टी पर भेज दिया है, वह कहां तक क़ानून सम्मत है. 78 संसदों ने अपनी याचिका में लिखा है कि प्रधानमंत्री जॉन्सन ने रानी एलिबाज़ाबेथ को ‘असत्य बताते हुए भ्रम में डालकर’ उनके हस्ताक्षर पाये हैं. दूसरी याचिकाकर्ता ब्रिटेन द्वारा यूरोप संघ को तलाक देने के विरुद्ध आंदोलन चला रही जीना मिलर हैं.

सर्वोच्च न्यायालय का साहसिक निर्णय

ब्रिटेन के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार 24 सितंबर को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि 10 सितंबर के दिन संसद की बैठक को 14 अक्टूबर तक के लिए बलात स्थगित कर देना विधिसम्मत नहीं है.

सर्वोवच्च न्यायालय के सभी 11 न्याधीशों ने एकमत से यह फ़ैसला सुनाया. फ़ैसला प्रधामंत्री बोरिस जॉन्सन के मुंह पर करारे तमाचे के समान है. सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला इतना जल्दी आने और इतना साहसिक होने की संभावना कोई नहीं देख रहा था. सभी यही सोच रहे थे कि वह दोटूक फ़ैसला सुनाने के बदले कोई गोलमटोल निर्णय ही देगा, ताकि सबकी इज़्ज़त बनी रहे.

न्यायाधीशों ने कहा कि यूरोपीय संघ से अलग होने के ब्रेग्ज़िट जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण क़दम से ठीक पहले संसद की बैठक को कई सप्ताहों तक के लिए स्थगित कर देना संसद के संवैधानिक दायित्वों के निर्वाह में बाधा डालने के समान है. एक ऐसे महत्वपूर्ण क़दम से पहले संसद को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है. प्रधामंत्री बोरिस जॉन्सन ने कहा है कि वे इस फैसले को स्वीकार नहीं कर सकते. उन्होंने नहीं बताया कि वे क्या अब क्या करेंगे. विपक्षी नेता उनके त्यागपत्र की मांग कर रहे हैं. प्रेक्षकों का अनुमान है यह झगड़ा एक बार फिर न्यायालय में पहुंच सकता है.

अलिखित संविधान और संसद को प्रजा से महत्वपूर्ण मानने वाला देश

ब्रिटेन यूरोप का एकमात्र ऐसा देश है, जिसका कोई लिखित संविधान नहीं है. कोई ऐसा सुसम्बद्ध दस्तावेज़ नहीं है, जहां सब कुछ एक साथ लिखा मिले. 1215 का ‘मैग्ना कार्टा’ (महाधिकार पत्र), 1628 का ‘पेटिशन ऑफ़ राइट्स’ (अधिकार याचनापत्र) और 1679 का ‘हीबिअस-कॉर्पस लॉ’ (बन्दी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम) संविधान के मूलभूत सिद्धांतों का काम करते हैं.

इन प्रचीन दस्तावेज़ों में निहित मूलभूत सिद्धांतों और संसद में पारित हुए क़ानूनों , सर्वोच्च अदालत के निर्णयों और परंपराओं को मिलाकर यहां अलिखित संविधान के तौर पर देखा जाता है. लेकिन, संसद द्वारा बनाये गये क़ानून संसद में साधारण बहुमत के साथ किसी भी समय बदले भी जा सकते हैं. ‘संविधान’ का यह सरलीकरण ‘कॉमन लॉ’ (सामान्य अधिनियम) कहलाने वाली ब्रिटिश न्याय परंपरा की ही एक देन है.

दुनिया के अधिकतर लोकतांत्रिक संविधानों में लिखा मिलता है कि जनकामना या जनादेश ही राज्यसत्ता के कार्यकलापों का आधार है. यानी, जनता ही जनार्दन है. वही सार्वभौम है. ब्रिटेन की परंपरा में जनता नहीं, संसद सार्वभौम है. ऐसा वहां 1688 से 1689 तक चले तथाकथित ‘ग्लोरियस रिवोल्यूशन’ के कारण हुआ. यह एक ऐसा रक्तहीन तख्तापलट था, जिसमें उस समय ब्रिटेन के कैथलिक ईसाई राजा जेम्स द्वितीय के शासन का, प्रोटेस्टैंट ईसाई संप्रदाय की उसकी अपनी ही बेटी मेरी और हॉलैंड के उसके डच पति विलियम ऑफ़ ऑरेंज की साझी राजशाही ने अंत कर दिया.

यह तख्तापलट राजा जेम्स की संसद के सहयोग से हुआ था. इसलिए नए राजा विलियम ने संसद को व्यापक अधिकार प्रदान कर दिये. तभी से ब्रिटेन की शासन-पद्धति एकाधिकारी राजशाही की जगह एक ऐसी संवैधानिक राजशाही बन गयी, जिसमें राजा के नाम पर संसद देश का शासन चलाती है. जनता राजा या रानी की प्रजा ही होती है, न कि स्वयंभू.

राजसी-सामंती वर्ग को आजीवन लॉर्डशिप

ब्रिटिश संसद के भी दो सदन हैं. भारत की लोकसभा जैसे निचले सदन को ‘हाउस ऑफ़ कॉमन्स’ और ऊपरी सदन को, जो भारत की राज्यसभा से बिल्कुल भिन्न है, ‘हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स’ कहते हैं. भारत जैसे ही चुनावों द्वारा निर्वाचित ‘हाउस ऑफ़ कॉमन्स’ के इस समय कुल 650 सदस्य हैं. ऊपरी सदन ‘हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स’ के सदस्य किसी चुनाव द्वारा चुने नहीं जाते. वे मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं लॉर्ड्स टेम्पोरल (जागतिक लॉर्ड) और लॉर्ड्स स्पिरिचुअल (आध्यात्मिक लॉर्ड). वे मनोनीत किये जाते हैं.

हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स’ के 90 लॉर्ड वंशानुगत होते हैं. वे अपनों के ही बीच से अगलों को चुनते हैं. ‘लॉर्ड्स स्पिरिचुअल’ इस समय एन्ग्लीकन चर्च के 26 बिशप हैं. सबसे बड़ा वर्ग है ‘लॉर्ड्स टेम्पोरल’ का. उन्हें सरकार, राजनैतिक पार्टियां और कुछ संगठन मनोनीत करते हैं. उनका सबसे बड़ा वर्ग (जून 2019 में 661) सदन का आजीवन सदस्य बना रहता है. यह सौभाग्य केवल राजसी और सामंती वर्ग को ही मिलता है.

‘हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स’ का सदस्य बनने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और सदस्य संख्या भी बदलती रहती है. इस समय लगभग इनकी संख्या 770 है. उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता. ढेर सारा मान-सम्मान और सदन में बैठने का 300 या 150 पाउन्ड करमुक्त दैनिक भत्ता और एक सीमा तक आने-जाने का यात्रा-ख़र्च मिलता है. वे कोई क़ानून नहीं बनाते, बल्कि निचले सदन द्वारा पारित विधेयकों की समीक्षा करते हैं. चाहें तो इस सदन के सदस्य किसी क़ानून के बनने को एक वर्ष तक लटका भी सकते हैं.

सत्तापक्ष और विपक्ष आमने-सामने बैठते हैं

ब्रिटेन में क़ानून बनाने का मुख्य काम निचले सदन ‘हाउस ऑफ़ कॉमन्स’ में ही होता है. वहां सत्तापक्ष और विपक्ष के सांसद आमने-सामने बैठते हैं. वे फ़र्श पर खिंची एक रेखा द्वारा एक-दूसरे से अलग किये जाते हैं. यह रेखा सत्तापक्ष और विपक्ष की सीटों के ठीक बीच में इस तरह खिंची होती है कि उसके दोनों और की बेंचों के बीच दो-दो तलवारों के बराबर दूरी रहे. सांसद किसी वक्तव्य के प्रति अपनी सहमति या असहमति प्रकट करने के लिए भेंड़ों की तरह बार- बार यैय... या नैय... जैसी आवाज़ें निकाला करते हैं.

एक सबसे पुराना लोकतंत्र होने से अधिक ब्रिटेन के महा-पुरातनपंथी प्रजातंत्र होने का ही एक और विरोधाभास यह है कि इसका औपचारिक नाम ‘यूनाइटेड किंगडम’ (संयुक्त राजशाही) है, जिसे अंग्रेज़ बड़े गर्व के साथ ‘ग्रेट ब्रिटेन’ (बर्तानिया महान) भी कहते हैं. अपने उपनिवेशों के ज़माने में उसका भौगोलिक विस्तार इतना बड़ा ज़रूर था कि उसके साम्रज्य में कहीं न कहीं सूर्य हमेशा चमक रहा होता था.

आज स्थिति यह है कि ब्रिटेन सिकुड़ते- सिकुड़ते क्षेत्रफल में भारत के उत्तर प्रदेश जितना बड़ा और जनसंख्या में उसका एक-तिहाई भर ही रह गया है. इसका क्षेत्रफल है 2,42,495 वर्ग किलोमीटर. जनसंख्या है पौने सात करोड़. बोरिस जॉन्सन और उनके जैसे ब्रेग्ज़िट-वादियों ने यह भ्रम पाल लिया है कि यूरोपीय संघ से अलग होते ही उनका देश एक बार फिर ‘ग्रेट ब्रिटेन’ बन जायेगा.