5 अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाने से करीब 12 घंटे पहले, कश्मीर घाटी में सरकार ने संचार के सारे माध्यम बंद कर दिये थे. आज दो महीने बीत जाने के बाद भी, इनमें से सिर्फ लैंड्लाइन फोन ही चालू हुए हैं. मोबाइल फोन, मोबाइल इंटरनेट, ब्रॉडबैंड अभी भी बंद हैं. सड़कों पर लगे प्रतिबंधों के अलावा संचार सेवाओं के बंद होने से कश्मीर में लोगों को कई तकलीफ़ों से गुजरना पड़ रहा है.
इन तकलीफ़ों में से कई सत्याग्रह ने पिछले डेढ़ महीने में कश्मीर घाटी में लोगों के बीच जाके देखी हैं.
मानसिक रोग
कश्मीर से पिछले एक महीने में कई मीडिया रिपोर्ट्स इस बात पर ज़ोर दे रही हैं कि संचार सेवाओं पर लगे प्रतिबंधों के चलते यहां के लोगों में डिप्रेशन और व्यग्रता की काफी बढ़त हुई है. अभी इससे जुड़े आंकड़े आने में थोड़ा समय लगने वाला है लेकिन 65 साल की सदिया बेगम की यह कहानी कहीं न कहीं इस बात की पुष्टि करती लगती है.
प्रतिबंधों का शायद बीसवां दिन था जब सुबह के छह बजे मैं अपने एक दोस्त की मां - सदिया बेगम – से मिलता हूं. मुझे देखते ही वे कहती हैं, ‘आपका दोस्त और उसकी बीवी घर छोड़ के भाग गए हैं और साथ में हमारा नया फ्रिज भी लेके चले गए हैं.’
अभी-अभी नींद से जागा मैं हड़बड़ा जाता हूं. सदिया आंटी एक बहुत पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई महिला हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि वे ऐसा क्यों कर रही हैं. फोन उठाकर अपने दोस्त को बताने की सोचता हूं तो याद आता है कि फोन सेवाएं तो ठप हैं. दोस्त के घर जाकर मालूम करने पर पता चलता है कि उसकी मां यानी सदिया बेगम की मानसिक हालत ठीक नहीं है.
कई साल डिप्रेशन से झूझने के बाद सदिया आंटी ने कुछ साल से मोबाइल फोन में व्यस्त रहकर अपने आपको मानसिक रूप से संतुलित कर लिया था. वे अपने अमेरिका में रह रहे बेटे और उनके बच्चों से बात करके या फिर फेसबुक चलाकर अपने आपको सामान्य बनाये हुए थीं. लेकिन अचानक सब बंद हो जाने पर उनकी दिमाग़ी हालत फिर से बिगड़ गयी.
उनके अमरीका में बसे डॉक्टर बेटे से कोई संपर्क नहीं था और किसी डॉक्टर के पास जाने के लिए वे बिलकुल तैयार नहीं थीं. उनके यहां रह रहे बेटे को किसी डॉक्टर के पास जाने के लिए कर्फ्यू के पास की जरूरत थी और इसके लिए उसे डीसीपी के दफ्तर जाने की जरूरत थी. चूंकि डीसीपी का दफ्तर 10 किलोमिटर दूर था इसलिए वहां जाने के लिए भी पुलिस की इजाज़त की दरकार थी.
वह जैसे-तैसे पास का इंतजाम करके श्रीनगर के राइनावरी में स्थित मानसिक रोगों के अस्पताल में पहुंचता है तो पता चलता है कि डॉक्टर ही नहीं आ पाये हैं, प्रतिबंधों की वजह से. जैसे-तैसे डॉक्टर के घर पहुंचकर, उनसे दवाई लिखवाई जाती है जिसे अब सदिया बेगम खा रही हैं और पहले से थोड़ी बेहतर हैं.
कहा नहीं जा सकता कि इस समय उनकी तरह और कितने लोग अवसाद का शिकार हो रहे होंगे. लेकिन अपनों से संपर्क न हो पाने से लोगों की मनोदशा पर तो असर पड़ ही रहा है. जल्दी ही घाटी में सर्दी भी दस्तक देने जा रही है और यह एक तथ्य है कि सर्दी के मौसम में अवसाद के मामले बढ़ जाते हैं. अगर मानसिक समस्याओं की बात न भी करें तो भी यहां ऐसे हजारों लोग हैं जिन्हें अपनी स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों के लिए आसानी से डॉक्टर और अन्य जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पा रहे हैं.
कारोबार
प्रतिबंधों का पंद्रहवां दिन था. अनंतनाग के बटेंगू इलाक़े में मेरी नज़र सड़क के किनारे खड़े एक ट्रॉलर पर पड़ी. उसमें एक सरदार जी बैठे खाना बना रहे थे. ऐसे प्रतिबंधों के बीच ऐसा दिखना काफी अजीब सा था. बात हुई तो पता चला सरदार जी करीब डेढ़ हफ्ते से वहीं खड़े हैं, इस इंतज़ार में कि कब उनकी उस आदमी से बात हो जिसको उन्हें माल देना है और कब वे अपने घर जाएं.
सरदार जी राजस्थान से एक टाइल कंपनी का माल लेकर आए थे जिसे उन्हें बटेंगू में स्थित उस टाइल के शोरूम में उतरवाना था. लेकिन फोन रास्ते में ही बंद हो गया था और वहां पहुंचकर उन्हें कोई मिला नहीं.
‘शोरूम का मैनेजर किसी दूरदराज़ के गांव में रहता है. किसी को पता नहीं कहां और मैं अब यहां बैठा इंतज़ार कर रहा हूं कि कभी वो इधर आये तो में माल उतरवाकर घर जाऊं’ सरदार जी बताते हैं.
इससे पहले कि सरदार जी से कुछ और पूछ पाता सीआरपीएफ़ वालों ने सीटियां बजाकर वहां से निकलने का इशारा कर दिया. उनका नाम भी नहीं पूछ पाया, लेकिन शायद ज़रूरत भी नहीं थी क्योंकि उनके जैसे सैंकड़ों थे.
सुरक्षा बल
कश्मीर में सुरक्षा बलों के फोन भी बंद हैं और उनमें से सबसे ज़्यादा परेशान हैं वे सीआरपीएफ़ वाले जिनको हाल ही में, अनुच्छेद 370 हटाने के कुछ दिन पहले, कश्मीर लाया गया था. ऐसे ही एक सीआरपीएफ़ के जवान से सत्याग्रह की मुलाकात श्रीनगर में हुई. उन्हें झारखंड में उनकी तैनाती से उठाकर सीधे कश्मीर ले आया गया था.
‘3 अगस्त को यहां पहुंचा था मैं और 4 अगस्त की शाम को मेरी गर्भवती पत्नी को अस्पताल में दाखिल किया गया था. फिर फोन बंद हो गए और मुझे अभी भी नहीं पता कि बेटा हुआ है या बेटी.’ सीआरपीएफ के ये जवान प्रतिबंधों के बाईसवें दिन सत्याग्रह को बताते हैं कि वे कमाने अपने परिवार के लिए निकले हैं लेकिन उसके ही बारे में ही कुछ पता नहीं चल पा रहा है.
एक और सीआरपीएफ़ के जवान से अनंतनाग जिले के काजीगुंड में मुलाकात होती है. वे बिहार के पटना के रहने वाले थे. वे सत्याग्रह को बताते हैं कि उनके ‘घरवालों को तो पता भी नहीं है हम ज़िंदा हैं या नहीं. कुछ दिन पहले अफसर बोले थे कि हर कंपनी को एक सिम कार्ड दिया जाएगा लेकिन अभी तक नहीं मिला.’
हालांकि शिकायत के साथ-साथ इन सहित सीआरपीएफ के कई और जवान यह भी कहते हैं कि पहली बार कश्मीर में कुछ अच्छा हुआ है और अगर इसके लिए उनको भी थोड़ी तकलीफ उठानी पड़े तो वही सही. सत्याग्रह जह उनसे पूछता है कि क्या अच्छा हुआ है कश्मीर में, तो वे यह कहकर चुप हो जाते हैं कि अब आतंकवाद खतम हो जाएगा.
पीसीओ के नये अवतार
शायद प्रतिबंधों का सत्ताईसवां दिन था और मेरा दिल्ली में सत्याग्रह के दफ्तर से कोई राब्ता नहीं था. तभी पता चलता है कि अनंतनाग के पहलगाम और काजीगुंड में लैंड्लाइन चल गयी हैं.
काजीगुंड में एक ऐसे घर का पता लगाकर जिसके यहां लैंडलाइन फोन था, जब हम वहां पहुंचते हैं तो वहां हमें घर के बाहर पीसीओ का बोर्ड और बेतहाशा भीड़ जमा मिलती है. एक माता-पिता जिनका बेटा चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहा है, अपनी 3 साल की बेटी के साथ एक महिला जिनके पति कहीं बाहर नौकरी कर रहे हैं, एक सेब का व्यापारी, एक भाई जो अपने दिल्ली गए हुए भाई के लिए परेशान है, ऐसे कई लोग यहां अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए मिलते हैं. सब दुखी हैं सिवाय घर की लैंड्लाइन को पीसीओ बनाने वाले शख्स के जो तीन मिनट की एक कॉल के लिए 20 रूपये ले रहा है. ‘अगर वो इस वक़्त एक कॉल के 50 रूपय भी मांग ले तो सब दे देंगे’ वहां खड़े एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति कहते हैं.
भारत में मोबाइल सेवा आने के बाद जो पीसीओ चलन से बाहर हो गये थे वे अब एक दूसरे रूप में सिर्फ काजीगुंड में ही नहीं कश्मीर के कई इलाकों में दिखने लगे हैं. एक ऐसे ही ‘पीसीओ’ वाले से श्रीनगर के सोनवार इलाक़े में जब सत्याग्रह ने पूछा कि ऐसा क्यों कर रहे हैं तो जवाब मिलता है - ‘मजबूरी है.’
‘मैंने पहले फोन मुफ्त रखा था ताकि लोगों का फायदा हो, लेकिन कुछ लोग इसका गलत इस्तेमाल करने लगे थे. घंटों फोन नहीं छोडते थे, यह सोचे बिना कि और लोगों को भी मजबूरी हो सकती है’ खैर, अब वजह जो भी हो लेकिन हो जो रहा है वह ठीक भी नहीं है.
पत्रकार
इस संचार प्रतिबंध से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले लोगों में से पत्रकार भी हैं. पहले करीब 15 दिन तो उनके पास कोई साधन ही नहीं था अपनी स्टोरी, फोटो और वीडियो कहीं भेजने का.
‘तो हम पेन ड्राइव या हार्ड डिस्क में अपना काम रखकर एयरपोर्ट पर किसी को दे देते थे जो उसको दिल्ली में हमारे किसी आदमी को दे देता था और वो वहां से मेल कर देता था’ दिल्ली के एक मीडिया हाउस में काम करने वाले एक स्थानीय फॉटोग्राफर सत्याग्रह को बताते हैं.
फिर सरकार ने एक होटल में पत्रकारों के लिए इंटरनेट की व्यवस्था की जहां चार कम्प्यूटरों में इंटरनेट चलता है और करीब 200 पत्रकार वहां से अपना काम करते हैं. ‘घंटों इंतज़ार करना पड़ता है यहां और हमारा सारा काम अब सरकार द्वारा मॉनिटर भी हो रहा है’ इस अस्थायी मीडिया सेंटर में मौजूद एक पत्रकार कहते हैं, ‘लेकिन और कोई साधन भी नहीं है.’
लेकिन श्रीनगर के इस होटल में भी सिर्फ यहां के ही पत्रकार पहुंच पाते हैं. अन्य जिलों में स्थित स्थानीय अखबारों के पत्रकार अभी घरों में बैठे इंतज़ार कर रहे हैं कि कब उनकी तरफ भी सरकार का ध्यान जाएगा. वहीं कई स्थानीय अखबारों ने अपना दफ्तर फिलहाल दिल्ली शिफ्ट कर लिया है और वहीं से अपना काम कर रहे हैं. सत्याग्रह के इस पत्रकार को भी काम करने दिल्ली ही आना पड़ा है.
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