2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही लगातार इस बात को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं कि 2017 में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति बनाया जाएगा या नहीं. नितिन गडकरी जैसे पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने गाहे-बगाहे यह कहा भी कि आडवाणी राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति होंगे. लेकिन जब 2017 में राष्ट्रपति बनाने की बात आई तो बाजी रामनाथ कोविंद के हाथ लग गई और वे राष्ट्रपति बन गए.

2014 में मोदी सरकार बनने के बाद कई अहम मुद्दों पर लालकृष्ण आडवाणी की चुप्पी को भी राजनीतिक जानकार उनकी राष्ट्रपति बनने की इच्छा से जोड़कर देख रहे थे. हालांकि, नरेंद्र मोदी की राजनीति को समझने वाले लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते थे. उनका मानना था कि जिस तरह से आडवाणी ने 2013 में नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाने का विरोध किया था, उसके बाद इसकी संभावना नहीं है कि मोदी उन्हें राष्ट्रपति बनाएंगे. लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आडवाणी जिस तरह से खामोश थे, उसका मतलब यही निकाला जा रहा था कि शायद उनके मन में यह उम्मीद है कि मोदी उन्हें राष्ट्रपति बना सकते हैं.

भाजपा के लौह पुरुष माने जाने वाले और एक संगठन के तौर पर पार्टी को खड़ा करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को नजरंदाज करके जब रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने का निर्णय लिया गया तब अधिकांश लोगों की समझ में यह नहीं आया था. उनका कहना था कि आडवाणी को राष्ट्रपति बनाने में नरेंद्र मोदी को दिक्कत ही क्या थी? लोगों को लग रहा था कि जिस तरह से आडवाणी चुपचाप थे, उसमें अगर वे राष्ट्रपति बनते भी तो भी मोदी के लिए कोई परेशानी नहीं पैदा करते. इसके पक्ष में प्रणब मुखर्जी का उदाहरण दिया जा रहा था. राष्ट्रपति बनने के पहले तक प्रणब मुखर्जी कांग्रेस पार्टी में सबसे अधिक राजनीतिक सूझबूझ वाले नेता माने जाते थे. जब 2012 में उन्हें राष्ट्रपति बनाया जा रहा था तब भी कुछ लोगों को लगा था कि वे उस वक्त की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने न कभी उसके लिए ऐसा किया और न ही नरेंद्र मोदी के लिए ही कोई खास मुश्किल खड़ी की.

ऐसा ही लालकृष्ण आडवाणी के लिए भी कहा जा रहा था. लेकिन फिर भी उन्हें राष्ट्रपति नहीं बनाया गया. अब 2017 में हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद दो साल से अधिक का वक्त गुजर गया है और कुछ लोगों को उन्हें राष्ट्रपति नहीं बनाये जाने की वजहें कुछ-कुछ समझ में आने लगी हैं.

राजनीतिक जानकारों को लग रहा है कि नरेंद्र मोदी कई ऐसे बड़े फैसले करने की योजना पर काम कर रहे थे जिनके लिए उन्हें अपने अनुकूल राष्ट्रपति की जरूरत थी. पिछले कुछ दिनों में देखा जाए तो मोदी सरकार ने कई ऐसे बड़े फैसले लिए भी हैं जिनके बारे में इससे पहले सोचा भी नहीं जा सकता था. क्योंकि ये ऐसे संवेदनशील मसले थे जिन पर निर्णय लेने से कोई भी राजनीतिक दल बचना चाहता है.

इनमें सबसे बड़ा निर्णय जम्मू कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद-370 को अप्रभावी करने का है. सरकार ने यह काम राष्ट्रपति के आदेश के जरिए ही किया है. अपने निर्णय को प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने जरूरी कानून संसद में पारित कराए. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर रामनाथ कोविंद की जगह लालकृष्ण आडवाणी राष्ट्रपति होते तो मोदी सरकार ये निर्णय शायद इतनी आसानी से नहीं ले सकती थी.

राम मंदिर आंदोलन के नायक रहे लालकृष्ण आडवाणी पर सांप्रयादिकता फैलाने के आरोप भले ही लगते रहे हों लेकिन उनके बारे में माना जाता है कि वे पुरानी शैली वाले नेता हैं. ऐसे में कई अहम मसलों पर वे पार्टी हित या चुनावी नफे-नुकसान से परे हटकर नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर निर्णय लेने की बात कर सकते थे. संभव है कि आडवाणी के इस तरह के रुख से मोदी सरकार कुछ बड़े निर्णय उतने तेजी से नहीं ले पाती जितनी तेजी से से वह लेना चाहती होगी.

भाजपा संगठन में आडवाणी का कद इतना बड़ा रहा है कि अगर वे मोदी सरकार के किसी निर्णय पर पुनर्विचार के लिए उससे कहते या सहमति देने की संवैधानिक बाध्यता के बीच भी उस पर अपनी असहमति व्यक्त कर देते तो सरकार के लिए उस पर आगे बढ़ पाना आसान नहीं होता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ उनकी सरकार में जो भी लोग हैं, इनमें से सभी भाजपा में आडवाणी के कनिष्ठ रहे हैं. ऐसे में अगर आडवाणी किसी बात पर अड़ जाते या अपनी आपत्ति भी जाहिर करते तो नरेंद्र मोदी से लेकर उनकी सरकार में शामिल किसी भी व्यक्ति के लिए यह आसान नहीं होता कि वह उन पर दबाव जरा सा भी दबाव बना सके.

अब यह माना जा रहा है कि आडवाणी के राष्ट्रपति बनने से जुड़े इन्हीं संभावित खतरों को भांपते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें राष्ट्रपति बनाने का जोखिम नहीं लिया. कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति होने की वजह से मोदी सरकार को उनके स्तर पर किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ रहा है. मोदी सरकार को जिस निर्णय पर भी राष्ट्रपति की सहमति की जरूरत होती है, उस पर कोविंद बहुत आसानी से अपनी सहमति दे देते हैं.

भाजपा की राजनीति में रामनाथ कोविंद सक्रिय जरूर रहे हैं लेकिन पार्टी संगठन में उनका कोई खास कद नहीं रहा है. संगठन में उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी राष्ट्रीय प्रवक्ता की रही है. बाद में उन्हें इस पद से भी हटा दिया गया था. कहा जाता है कि 2014 में वे लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन भाजपा ने उन्हें टिकट तक नहीं दिया. इसके बाद 2015 में उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया और फिर 2017 में वे राष्ट्रपति बन गए. भाजपा की राजनीति में कोई बड़ा कद नहोने की वजह से उनके लिए पार्टी के बड़े नेताओं की किसी बात पर आपत्ति करना आसान नहीं है.

राष्ट्रपति पद को लेकर संवैधानिक स्थिति यह है कि अधिकांश मामलों में उसे केंद्र सरकार के कहे मुताबिक ही काम करना होता है. अपना विवेक इस्तेमाल करने का बहुत सीमित अधिकार उसके पास है. लेकिन भारत के राष्ट्रपति के पास सरकार के किसी भी निर्णय को लटका देने का अधिकार है. पहले भी कुछ राष्ट्रपतियों ने इस अधिकार का इस्तेमाल करके सरकार को वैसे निर्णय लेने से रोका है जिन पर उन्हें आपत्ति रही है. कहा जा रहा है कि अगर आडवाणी राष्ट्रपति होते तो अपने इस अधिकार का अधिक इस्तेमाल करते और सरकार के जम्मू कश्मीर जैसे बड़े निर्णयों को प्रभावित करते.