इन दिनों संस्मरण लिख रहा हूं ताकि जब तक स्मृति बची है कुछ लोगों से हुए अनेक मूल्यवान् अनुभव और कई रोचक प्रसंग तब तक दर्ज़ हो जायें. कई बरस पहले अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह और मुक्तिबोध के संस्मरण लिखे थे. फिर कई बरस कुछ नहीं हुआ इस दिशा में. ‘नया ज्ञानोदय’ में रवीन्द्र कालिया के उकसाने पर कृष्ण बलदेव वैद, श्रीकान्त वर्मा, इंतजार हुसेन के संस्मरण लिखे. अन्यत्र सैयद हैदर रज़ा, हबीब तनवीर, बव कारंत, नेमिचन्द्र जैन, मल्लिकार्जुन मंसूर पर संस्मरण भी लिखे. यह क्रम कुछ बरसों के लिए फिर छूट गया. अबके दौर में निर्मल वर्मा और जगदीश स्वामीनाथन पर लिख चुका हूं और कुमार गन्धर्व पर इन दिनों में लिख रहा हूं. उम्मीद है कि दो-तीन महीनों में कृष्णा सोबती, रघुवीर सहाय, अर्जुन सिंह और इंदिरा गांधी पर लिख यह क्रम पूरा हो जायेगा और शायद जनवरी 2020 में ये सभी पुस्तकाकार ‘अगले वक़्तों के हैं ये लोग’ शीर्षक से प्रकाशित हो जायेंगे.

सभी संस्मरण एक तरह का कृतज्ञता-ज्ञापन हैं. हम जिस कृतघ्न समाज में रहते हैं उसमें दूसरों का आभार मानना कम होता जाता है. मुझे हमेशा लगता रहा है कि मेरा जीवन और साहित्य, सार्वजनिक सक्रियता, संस्थाएं, पत्रिकाएं आदि दूसरों के कारण ही उतनी सार्थक और समृद्ध हुई जितना वे हो पायीं. ये दूसरे न होते और मुझे उनके सान्निध्य का सौभाग्य न मिला होता तो मेरे जीवन और कृतित्व का एक बड़ा हिस्सा अकारथ ही जाता. ज्य़ादातर तो शायद अब भी अकारथ है, पर उसमें जो भी थोड़ा-सा सार्थक है वह इन दूसरों के कारण ही.

संस्मरण किसी लेखक या कलाकार का आकलन नहीं होता. उसके लिए व्यवस्थित ढंग से आलोचना, विश्लेषण आदि लिखना पड़ते हैं. संस्मरण ऐसे आकलन या विश्लेषण की जगह नहीं होता. वह एक तरह से आपकी आत्मकथा का ही हिस्सा होता है जिसमें आप दूसरे को याद करते हुए अपने को भी अनिवार्यतः याद करते हैं. कई बार स्मृति खेल कर सकती है. तारीखें, किसी प्रसंग में उपस्थित लोगों के नाम, उक्तियां आदि गड़बड़ा जा सकते हैं. मेरी एक मुश्किल यह है कि मैं याद के सहारे ही लिख रहा हूं. कोई नोट्स या डायरी मैंने कभी नहीं रखे. कई बार दूसरे के बारे में लिखते हुए आप अप्रिय प्रसंग आसानी से याद कर लेते हैं पर अधिक प्रेरक प्रसंग याद से छूट जाते हैं. कुछ को यह भी लग सकता है कि आप संस्मरण लिखकर दूसरे के बहाने अपना महिमामंडन कर रहे हैं. ये सब जोखिम हैं जो संस्मरण लिखनेवाले को उठाने ही पड़ते हैं. अगर न उठाये तो फिर वह क़ायदे का संस्मरण लिख ही नहीं पायेगा. सजग पाठक किसी महिमामंडन के प्रभाव में नहीं आता और उसे भूसी मानकर छोड़ देता है, तत्व सब बटोर लेता है.

संस्मरण उस समय का अनौपचारिक इतिहास भी होते हैं. अगर इतिहास नहीं तो वृत्तान्त तो निश्चय ही. हर समय कठिन होता है और अकसर संस्मरण हमें बताते हैं कि कठिन समय में भी कुछ लोग थे जो निपट मानवीय थे, लेखक या कलाकार होने के अलावा.

हाइडेगर और कविता

बीसवीं शताब्दी के महान् दार्शनिकों में गिने जानेवाले मार्टिन हाइडेगर ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में कविता पर न सिर्फ़ विस्तार से विचार किया था बल्कि काव्यभाषा को दर्शन की तकनीकी भाषा के बरक़्स अधिक उपयोगी और मूल्यवान माना था. कविता और दर्शन दोनों ही, कई और अनुशासनों की तरह, संसार को समझने, देखने, खोजने की स्वतंत्र विधाएं हैं. हालांकि कवि दार्शनिकों का आदर करते रहे हैं, दार्शनिकों ने कवियों या कविता पर विशेष ध्यान नहीं दिया है. अधिकांश दार्शनिक अपने विश्लेषण और विमर्श के लिए जटिल, सूक्ष्म और अर्थ-बोझिल गद्य भाषा का इस्तेमाल करते हैं. पश्चिमी दर्शन के क्षेत्र में सम्भवतः नीत्शे और विटगेस्टाइन अपवाद हैं जिनकी दर्शन-शैली में काव्यात्मकता है. हाइडेगर इस अर्थ में अपवाद हैं कि वे कविता की भाषा को अधिक सूक्ष्म, समावेशी और उद्घाटक पाते हैं. अमरीकी चिंतक रिचर्ड रोर्टी ने कहा है कि अपने उत्तर-कृतित्व में हाइडेगर को दार्शनिकों के विरुद्ध कवियों का बचाव करते पढ़ा जा सकता है. कविता की भाषा में हाइडेगर को निजता, अनुभव और वस्तुजगत् के बीच एकता नज़र आती है.

हाइडेगर ने प्लेटो द्वारा प्रस्तावित सत्य की अवधारणा में बुनियादी परिवर्तन किया था. उनके अनुसार सत्य को खोजने के बजाय हमारा काम सत्य का अनावरण करना है. वह अन्तर्निहित है और उसे अनावृत्त करना है. यह अनावरण कविता में अधिक स्वाभाविक ढंग से सम्भव होता है. याद आता है कि हमारे यहां ईशवास्योपनिषद् में कहा गया है कि सत्य का मुख हिरण्यमय पात्र से ढका है और उसे अनावृत्त करने की, सत्यधर्म के लिए, सर्वपालक से प्रार्थना की गयी है.

लेकिन यह भ्रम नहीं होना चाहिये कि हाइडेगर दर्शन और कविता के किसी गठबंधन की वकालत कर रहे हैं या कि वे दर्शन या कविता को एक-दूसरे से अपदस्थ करना चाहते हैं. उन्होंने तो स्पष्ट किया है कि ‘सारा दार्शनिक चिन्तन और उसका वह हिस्सा जो कठोर और गद्यवर्णित होता है अपने आप में काव्यात्मक होता है और फिर भी वह काव्यकला नहीं होता. उसी तरह जर्मन कवि हाल्डरिन की कविताएं चिंतनपरक हो सकती हैं लेकिन उन्हें दर्शन कभी नहीं माना जा सकता. यह भी स्पष्ट है कि चिंतनपरक कविता अनावरण का सशक्त माध्यम होती है. हाइडेगर का एक बड़ा सरोकार चिंता, परवाह करने का है. वह विचित्र संयोग है कि वे चिंता का सशक्त माध्यम तथा कथित चिन्तन में कम, कविता में अधिक पाते हैं.

रज़ा फ़ाउंडेशन के ‘हाइडेगर और कविता’ शीर्षक आयोजन में विद्वानों ने इस संबंध के निहितार्थों की गूढ़ व्याख्या की. यह भी स्पष्ट हुआ कि अपने नात्सी संबंध के कारण हाइडेगर के विचार को अवमूल्यित नहीं किया जा सकता. हमारे लिये भी यह अवधारणा कविता की प्रकृति को समझने में सहायक हो सकती है कि कविता सत्य का अनुसन्धान या रचना उतना नहीं जितना कि उसका अनावरण करती है.

मण्डला में ‘आरम्भ’

सैयद हैदर रज़ा का जन्मस्थान और उनकी समाधि वहां होने के कारण मण्डला एक महत्वपूर्ण कलातीर्थ बन जाये ऐसी कोशिश रज़ा फ़ाउंडेशन कर रहा है. वहां हर वर्ष रज़ा की जन्म और पुण्य तिथियों पर हम कला, कविता, लोकसंगीत, लोकनृत्य आदि के आयोजन नर्मदा-नट पर करते हैं.

रज़ा साहब की रुचि शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य में गहरी थी. इसको ध्यान में रखकर हमने युवा शास्त्रीय कलाकारों को प्रस्तुत करने की अपनी ‘आरम्भ’ श्रृंखला अब मण्डला में भी शुरू कर दी है. लक्ष्य है कि मण्डला में धीरे-धीरे शास्त्रीय रसिकता विकसित हो और युवा कलाकारों को वहां एक उत्सुक-संवेदनशील मंच नियमित रूप से मिले. हाल ही में ‘आरम्भ’ के अन्तर्गत भरत नाट्यम की युवा नर्तकी तान्या सक्सेना के प्रदर्शन मण्डला के सभागार और केंद्रीय स्कूल में हुए. इस प्रदर्शन को लेकर मण्डला-निवासियों, ज़िला प्रशासन, मीडिया आदि की जो उत्साहवर्द्धक और अनुकूल प्रतिक्रिया आयी है, वह आश्वस्त करती है कि मण्डला में शास्त्रीय कलाएं अपनी जगह बना सकती हैं।

शास्त्रीय कलाओं के महानगरों और शहरों तक सीमित रहने के कारण उनमें कई बार आती एकरसता और लोकलुभावन आवृत्तिमूलकता से ऊब होती है. विकेन्द्रित होकर अन्यत्र, कम सुविधाजनक जगहों पर जाने से उनके रसिकों का विस्तार तो होगा ही, उनमें नया कुछ निर्भीकता से करने का ज़रूरी रुझान भी पैदा हो सकता है. शास्त्रीयता की रक्षा और संवर्द्धन ज़रूरी है पर उसकी रसिकता और उसमें समझ-जतन से प्रयोगशीलता भी उतनी ही ज़रूरी है. मण्डला में ऐसे प्रयत्न से अगर कला-बोध नागरिकता का हिस्सा हो जाये तो वहां का होने की रज़ा की सार्थकता भी सत्यापित हो जायेगी.