अमेरिका का यू-2 जासूसी अभियान सोवियत संघ (रूस) के साथ उसके शीतयुद्ध के दौर की परिघटना है. दरअसल यू-2 एक प्रकार के टोही विमान होते हैं. 1955-56 के आसपास अमेरिका और सोवियत संघ के बीच जब परमाणु हथियारों के मसले पर काफी तनाव बढ़ गया था, तब इन्हीं विमानों के जरिए सोवियत संघ की जासूसी की गई थी. उस समय एशिया में इन विमानों का एकमात्र बेस थाइलैंड के तखली में था.

भारत इस समय तक गुटनिरपेक्ष आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले अगुआ देशों में शामिल था तो जाहिर है कि अमेरिकी विमानों को कभी भारतीय वायु मार्ग से अपने सैन्य विमान उड़ाने की अनुमति नहीं मिली. लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध ने परिस्थितियां बदल दीं. चीन के सामने तकनीकी क्षमता में बौनी साबित हो चुकी भारतीय सेना को विदेशी मदद जरूरत महसूस होने लगी. नेहरू जी ने इसके लिए अमेरिका से अपील की और इसके बाद तखली से यू-2 विमान भारत-चीन सीमा पर उड़ान भरकर चीन की सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाने लगे.
कुछ ही महीनों बाद भारत सरकार के सामने अमेरिका ने प्रस्ताव रखा कि यू-2 विमानों की उड़ान के लिए भारत उसे अपना कोई हवाई अड्डा उपलब्ध कराए. जून, 1963 में अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मुलाकात के दौरान इस पर सहमति भी बन गई.
भारत सरकार ने उड़ीसा में चारबतिया हवाई अड्डे (कटक के नजदीक) से अमेरिकी विमानों के इस्तेमाल की अनुमति दे दी. लेकिन यह हवाई अड्डा यू-2 की उड़ानों के लिहाज से तैयार नहीं था. अमेरिका से सहमति बन जाने के बाद भारत सरकार ने इसे आधुनिक बनाने का काम शुरू कर दिया लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी यह तैयार नहीं हो पाया.
मई, 1964 में पहली बार इस हवाई अड्डे से एक यू-2 विमान उड़ान भरी. लेकिन इसी महीने में नेहरू जी का निधन होने के बाद ये उड़ानें बंद कर दी गईं. दोबारा ऐसी ही कुछ उड़ानें उसी साल दिसंबर में भरी गईं. इसके बाद यह अभियान बंद कर दिया गया और फिर कभी शुरू नहीं हुआ.
भारत के अब तक के इतिहास में यह पहली बार हुआ था जब अमेरिकी जासूसी विमानों ने भारतीय भूमि का इस्तेमाल किया था. कहा जाता है कि अमेरिका इन विमानों से सोवियत संघ के सेरीशेघान (वर्तमान के कज़ाकिस्तान की एक जगह) स्थित मिसाइल परीक्षण स्थल की टोह लेना चाहता था लेकिन अभियान के बंद होने के बाद उसकी यह योजना असफल हो गई.
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