2017 अगस्त को गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में एक के बाद एक हुई 70 बच्चों की मौत ने उत्तर प्रदेश सरकार और उसके मुखिया तथा गोरखपुर के कई बार सांसद रहे योगी आदित्यनाथ को मीडिया और जनता के गुस्से का निशाना बना दिया था. पूर्वांचल के बच्चों पर दिमागी बुखार और जापानीज़ एंसेफलाइटिस पिछले कई वर्षों से बरसात के महीनों में अपना कहर ढाते रहे हैं. इसकी रोकथाम के लिए जरूरी प्रयासों और पर्याप्त उपाय न किए जाने को लेकर एक सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ ने संसद तक में आवाज उठाई थी. लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अगस्त 2017 में जब बच्चों की बड़ी संख्या में मौत हुई तो उसकी तत्कालिक वजह आक्सीजन की कमी के रूप में सामने आई. जब इसे लेकर योगी आदित्यनाथ पर विपक्ष ने तीखे हमले किए तो उसी रात राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने एक हास्यास्पद बयान यह दिया कि इन महीनों में तो बच्चे मरते ही रहते हैं.

गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कालेज में अपने बच्चों को मरते देख कर चीख-पुकार मचाते अविभावकों के बीच अस्पताल के अन्य डाक्टरों के साथ जो शख्स सबसे ज्यादा सक्रिय था उसका नाम था डॉक्टर कफील खान. उस समय की मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक डॉक्टर खान ने अपने व्यक्तिगत प्रयासों और अपने पैसे से अस्पताल के लिए आक्सीजन का वैकल्पिक इंतजाम भी करवाया. लेकिन अगले दिन जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर पहुंचे तो उसके बाद कुछ घंटे पहले तक नायक बने हुए डॉक्टर कफील खान यकायक खलनायक बन गए. आदित्यनाथ ने वहां पहुंचते ही पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए. हालांकि इस बात के पूरे प्रमाण थे कि मेडिकल कालेज में 10 अगस्त 2018 की रात से लिक्विड आक्सीजन की आपूर्ति बन्द हो गई थी जो 13 अगस्त की सुबह ही बहाल हो पाई थी और इसी दौरान 10, 11 व 12 अगस्त को यहां क्रमशः 23, 17 व 12 बच्चों की मौत हुई थी. लेकिन राज्य सरकार शुरू से ही आक्सीजन की कमी की वजह से बच्चों की मौत होने से इनकार करती रही.

मामले की जांच के लिए जिलाधिकारी द्वारा गठित जांच समिति और फिर राज्य के मुख्य सचिव राजीव कुमार की अध्यक्षता में की गई जांच में आक्सीजन की कमी और बच्चों की मौत के लिए मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉक्टर राजीव मिश्र, 100 बेड वाले एंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी डॉक्टर कफील खान, आक्सीजन प्रभारी डॉक्टर सतीश कुमार और चार अन्य अस्पतालकर्मियों सहित आक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स के निदेशक मनीष भंडारी आदि को दोषी ठहराया गया. हालांकि सरकारी दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट था कि पुष्पा सेल्स को छह महीने से भुगतान नहीं हुआ था और उसने इसके चलते ही आक्सीजन की आपूर्ति जारी रखने में पहले ही असमर्थता जाहिर कर दी थी. लेकिन जांच में डॉक्टर कफील को इस पूरे प्रकरण का मुख्य आरोपित बनाया गया था.

इसके बाद बड़े अपराधियों की तरह डॉक्टर कफील खान की गिरफ्तारी की गई. उन्हे निलंबित पहले ही किया जा चुका था. अदालत में राज्य सरकार ने उनकी जमानत का हर स्तर पर विरोध किया और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से उन्हे नौ महीने बाद 25 अप्रैल 2018 को जमानत मिल पाई. पर इसके बाद भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं. हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ चल रही जांच को तीन महीने में खत्म करने का आदेश दिया था लेकिन यह सितम्बर 2019 तक चलती ही रही. उनके खिलाफ विभागीय जांच भी इसी तरह घिसटती रही. उन्हे अपने विभागीय बकाया धन का भुगतान भी मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद ही हो पाया.

इस बीच सितम्बर के अंतिम सप्ताह में इस मामले में एक बड़ा मोड़ तब आया जब डॉक्टर कफील खान ने नई दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेस करके यह बताया कि राज्य सरकार ने उन्हे निर्दोष पाया है. डॉक्टर खान ने राज्य सरकार की विभागीय जांच की रिपोर्ट मीडिया को दिखाते हुए कहा कि मुझे इस मामले में बलि का बकरा बनाया गया जबकि उस दुर्भाग्यपूर्ण रात को मैंने, जो कुछ भी मैं, एक डाक्टर के नाते, एक पिता के नाते और एक हिन्दुस्तानी होने के नाते कर सकता था, वह सबकुछ किया. लेकिन मुझे जेल की सलाखों के पीछे फेंक दिया गया, मीडिया द्वारा मुझे अपमानित किया गया, मेरे परिवार को प्रताड़ित किया गया और मुझे मेरी नौकरी से भी हटा दिया गया. डॉक्टर कफील ने अपनी बहाली और मामले की सीबीआई जांच की भी मांग की.

स्टांप एवं निबंधन विभाग के प्रमुख सचिव हिमांशु कुमार की इस रिपोर्ट के मुताबिक, डॉक्टर कफील खान के खिलाफ ऐसा कोई भी सुबूत नहीं पाया गया जो चिकित्सा में लापरवाही को साबित करता हो. जांच रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में एक आरटीआई आवेदन के जवाब में सरकार ने भी स्वीकार किया था कि 11/12 अगस्त 2017 को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में 54 घंटे तक तरल ऑक्सीजन की कमी थी और डॉक्टर कफील खान ने वहां भर्ती बच्चों को बचाने के लिए वास्तव में जंबो ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था की थी. रिपोर्ट में यह भी था कि डॉक्टर खान बच्चों की मौत के वक्त एईएस (एक्यूट एंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम) वार्ड के नोडल ऑफिसर इंचार्ज नहीं थे और इसे गलत बताने के लिए विभाग ने जो दस्तावेज और सबूत दिये वे ‘अपर्याप्त और असंगत’ थे. हिमांशु कुमार की जांच रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि उन्होंने अपने वरिष्ठों को ऑक्सीजन की कमी के बारे में पहले से ही बता दिया था.

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस रिपोर्ट को 18 अप्रैल 2019 को ही राज्य के चिकित्सा शिक्षा विभाग को सौंप दिया गया था. लेकिन पांच महीने बीत जाने पर भी न तो राज्य सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही की और न ही इसे सार्वजनिक ही किया.

उनकी इस प्रेस कांफ्रेस के तत्काल बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने स्पष्टीकरण दिया कि डॉक्टर कफील खान ने जांच रिपोर्ट के बारे में गलत निष्कर्ष निकाले हैं और उनके खिलाफ मामले अभी खत्म नहीं हुए हैं. राज्य सरकार ने इसके बाद तीन दिन में इस मामले में दो-दो बार प्रेस कांफ्रेस करके कफील खान के खिलाफ एक तरह से फिर से मोर्चा खोल दिया. तीन अक्टूबर को राज्य के प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) डॉक्टर रजनीश दुबे ने एक प्रेस कांफ्रेस करके यह बताने का प्रयास किया कि डॉक्टर कफील को अभी शासन से कोई राहत नहीं मिली है. एईएस वार्ड के नोडल ऑफिसर वाले मामले में डॉक्टर कफील पर आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं पर शासन ने उन्हे अभी क्लीन चिट नहीं दी है. उन पर प्राइवेट प्रेक्टिस करने, अनुशासनहीनता, कर्तव्यपालन में घोर लापरवाही और भ्रष्टाचार के कुल सात आरोपों में जांच अभी जारी हैं.

इस प्रेस कांफ्रेस में गोरखपुर में पत्रकार रहे मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार और राज्य के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक भी उपस्थित रहे और उन्होने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि प्रेस कांफ्रेस की खबर मीडिया में स्थान जरूर पा सके. इस प्रेस कांफ्रेस में डॉक्टर कफील पर लगे आरोपों के सिलसिले में एक आरोप यह भी बताया गया कि उन्होंने 22 सितम्बर 2018 को बहराइच के जिला अस्पताल के बाल रोग विभाग में जबरन घुसकर मरीजों का इलाज करने का प्रयास किया.

सत्याग्रह ने इस बारे में जब डॉक्टर कफील खान से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होने कहा कि ‘न जाने क्यों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मन में मेरे प्रति एक धारणा बन गई है. मुझे लगता है जब तक वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं मुझे न्याय के लिए भटकते ही रहना पड़ेगा.’ योगी आदित्यनाथ क्यों डॉक्टर कफील से इतने नाराज हैं, इस बारे में कहा जाता है कि 10 अगस्त को बच्चों की मौतों के बाद जब वे गोरखपुर मेडिकल कालेज पहुंचे तो वहां डॉक्टर कफील के नाम की ही चर्चा थी. हादसे से नाराज योगी ने वहां सभी डाक्टरों को फटकार लगाई. इस दौरान उन्होंनें डॉक्टर कफील को फटकारते हुए कहा कि ‘तुम बाहर केंपस में फोटो खिंचवाने में बिजी हो, सब फोटो खिंचाने लगेंगे तो इलाज कौन करेगा?’

बहरहाल नाराजगी की वजह चाहे जो भी हो उसी दिन से डॉक्टर कफील के लिए परेशानियों का दौर शुरू हो गया. डॉक्टर कफील अगस्त 2017 के उन दिनों की याद कर भावुक हो उठते हैं, ‘कोई भी संवेदनशील आदमी उस रात वहां होता तो वही करता जो हमने किया. मुझे याद है कि उस रात वहां मौजूद हर मां मेरे पैर पकड़कर रो रही थी कि हमारे बच्चे को बचा लो, लेकिन हम असहाय थे. मैं वहां अकेला नहीं था. 16 जूनियर डाक्टर थे, सिस्टर थीं, वार्ड ब्वाय थे और स्वीपर्स थे, जिन्होने 54 घंटे तक लगातार काम किया. मेरे लिए इसके बाद बहुत बुरा दौर आया. दो सितम्बर को जब मुझे गिरफ्तार किया तो मुझे मजिस्ट्रेट के पास ले जाने के बजाय एक गेस्ट हाऊस में ले जाकर टार्चर किया गया. नौ महीने तक मुझे जमानत नहीं मिली. जेल के एक छोटे से बैरक में मुझे हार्ड कोर अपराधियों के साथ रखा गया. मैंने जेल से दस पन्नों की चिट्ठी लिखी तब जाकर मुझे जमानत मिल पाई.’

डॉक्टर खफील खान से योगी सरकार की नई नाराजगी की दो और वजह ये हो सकती हैं कि वे 27 सितंबर को एक बार फिर से मीडिया की ऐसी सुर्खियों का हिस्सा बन गये जो सरकार को कटघरे में खड़ा करती थीं. इसके अलावा कफील खान ने पिछले लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार के पक्ष में वोट भी मांगे थे.

‘जहां तक मेरी जानकारी है, मेरे खिलाफ राज्य सरकार के पास सिर्फ दो मामले अब बचे हैं. जिनमें एक आरोप प्राइवेट प्रैक्टिस का है. मैने 8 अगस्त 2016 को बीआरडी मेडिकल कालेज में पद भार संभाला. जांच अधिकारी ने स्वयं स्वीकार किया है कि 8 अगस्त 2016 के पहले डॉक्टर कफील प्राइवेट प्रैक्टिस करते थे. 8 अगस्त के बाद इसे लेकर कोई सबूत नहीं हैं. मुझ पर बच्चों की मौत को लेकर जो आरोप लगाए गए थे उस बारे में इलाहाबाद हाईकोर्ट कह चुका है कि मैं किसी भी चिकित्सा सम्बन्धी लापरवाही या भ्रष्टाचार का दोषी नहीं था और न ही मैं किसी निविदा प्रक्रिया का हिस्सा था’ अपने खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की मुहीम के बारे में डॉक्टर कफील खान कहते हैं कि आरटीआई जांच में भी यह बात सामने आई है कि आक्सीजन आपूर्ति में 54 घंटों तक व्यवधान रहा था. असल सवाल तो आक्सीजन की कमी का है. लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग ने आक्सीजन देने वाली कंपनी के 63 लाख रूपयों का भुगतान अकारण रोक रखा था. जांच का असल मुद्दा तो यही होना चाहिए.

इस मामले में योगी सरकार की जिस तरह की प्रतिक्रिया रही है, उससे एक बार फिर ये सवाल उठने लगे हैं कि राज्य की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधारों के लिए गम्भीर प्रयास करने के बजाय उत्तर प्रदेश सरकार एक डाक्टर के खिलाफ खड़ी होती हुई क्यों दिखाई दे रही है.