हाल ही में बीते नवरात्र के आखिरी तीन दिन एक अजीबो-गरीब विडंबना के लिए याद किए जा सकते हैं. इन तीन दिनों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की एक कॉन्स्टेबल खुशबू चौहान का एक वीडियो खासा चर्चा बटोरता दिखाई दिया. खुशबू चौहान ने बीती 27 सितंबर को मानवाधिकार आयोग और केंद्रीय सशस्त्र सेना बलों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. इस कार्यक्रम में मानवाधिकारों की जरूरत पर चल रहे एक डिबेट कॉम्पटीशन के दौरान उन्होंने इसके विरोध में अपनी राय रखी थी. यहां पर कही गई उनकी बातें जब यूट्यूब के जरिए देश भर के लोगों तक पहुंची तो कुछ लोगों को यह ‘नए भारत’ की राय लगी, वहीं कुछ ने इसे विकृत विचारों की श्रेणी में रखा और संविधान-कानून की मूल भावना के खिलाफ बताया. इसके साथ ही, वीडियो पर मीडिया की क्या प्रतिक्रिया रही या सीआरपीएफ ने इससे किस तरह पल्ला झाड़ा, यह बात भी सुर्खियों का हिस्सा बन चुकी है.

अच्छा यह है कि मानवाधिकारों की जरूरत पर एक जरूरी बहस इस वीडियो के चर्चा में आने के साथ ही शुरू हो गई है. इस वीडियो में खुशबू ने कई ऐसी बातें कही हैं जो आपत्तिजनक हैं. लेकिन फिलहाल, हम अपना पूरा ध्यान खुशबू चौहान द्वारा कही गई बस एक ही लाइन पर देने वाले हैं और वह लाइन है - ‘वह कोख नहीं पलने देंगे, जिस कोख से अफज़ल निकलेगा.’

खुशबू चौहान की कही यह एक लाइन न सिर्फ कुछ प्रतिष्ठित राष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं की हेडलाइन बनी बल्कि सोशल मीडिया पर भावनाओं में उबाल लाकर देशभक्ति का नारा बन जाने की तरफ भी बढ़ती दिख रही है. सीआरपीएफ ने भले ही वीडियो के चर्चा में आते ही इस लाइन सहित, वीडियो में कही गई कई बातों को आपत्तिजनक बताते हुए इनसे किनारा कर लिया हो. लेकिन सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर जिस-जिस तरह से इसे दोहराया जा रहा है उससे इशारा मिलता है कि हमारा समाज किस कदर मानसिक अपंगता का शिकार होने की तरफ बढ़ रहा है.

जैसा कि आलेख की शुरूआत में ही कहा गया है, इस वीडियो में कही गई बातें कई वजहों से विडंबनापूर्ण हैं. पहली वजह तो यह है कि किसी मां के या कोख के बारे में कही गई ये लाइनें एक महिला द्वारा कही गई हैं. दूसरा कारण यह है कि कोख जैसी सुरक्षित जगह पर हमला करने की बात उस व्यक्तित्व ने कही है, जिस पर पूरे देश की सुरक्षा का जिम्मा है. तीसरी और सबसे दुखद वजह यह है कि नवरात्रि के दौरान चर्चा में आई इन लाइनों पर वह तबका ही सबसे ज्यादा तालियां बजाता नज़र आ रहा है जो पिछले नौ दिनों से लगातार ‘जय मां दुर्गे’ के जयकारे लगा रहा था.

नवरात्रि में जयकारे लगाने के बाद माताओं या महिलाओं का अपमान करने का चलन हमारे समाज में कोई नया नहीं है. हमारे यहां तो किसी को अपमानित करने की शुरूआत ही उसकी मां के बारे में अपशब्द बोलने से होती है. इन लाइनों में नया यह है कि अपशब्द बोलने की बजाय सीधे अपकर्म करने की बात कही जा रही है. बात-बात पर मां की गाली देने वाला हमारा समाज पहले इंतज़ार करता था कि बच्चा पैदा हो, थोड़ा बड़ा हो, वह कोई गलती करे और फिर उसकी मां को अपमानित करते हुए गालियां बकी जाएं. यह कहा जाए कि उसने जो भी गलत काम किया है, उसके बदले में उसकी मां के साथ किस-किस तरह की हरकतों को अंजाम दिया जाएगा.

लेकिन इस एक लाइन ने किसी मां और उसकी औलाद को किसी भी तरह से प्रताड़ित करने के लिए जरूरी इस इंतजार को खत्म कर दिया है. यह किसी बच्चे के गलती करने का वह मौका भी उससे छीन लेने की बात करती है जिसे करने की सजा उसकी मां को अपमानित करके दी जाती है. इस एक कथन को मिल रही लोकप्रियता और वाहवाही का सीधा मतलब है कि भविष्य में अगर कोई गर्भस्थ बच्चा या गर्भवती स्त्री किसी भी तरह से किसी अपराधी से संबंधित है तो उसके साथ कैसा भी अमानवीय व्यवहार किया जाना न्यायपूर्ण माना जाएगा. इस व्यवहार की क्रूरता यहां तक जा सकती है कि उस बच्चे को जन्म लेने से रोका जा सकता है और इसके लिए उसकी मां के साथ कुछ भी किया जा सकता है. और ऐसा करते हुए इस संभावना पर विचार करने का सवाल ही नहीं उठता है कि जन्म लेने वाला बच्चा आतंकवादी की बजाय कलाकार, राजनेता, वैज्ञानिक या एक आम करदाता नागरिक भी बन सकता है. या फिर क्या हमारे देशरक्षक योद्धाओं के पास कोई ऐसी तकनीक है जिससे वे सही-सही यह पहचान कर सकते हैं कि गर्भ में पल रहा यह बच्चा लड़का ही है और यह बड़ा होकर अफजल बनने वाला है?

अजन्मे बच्चे और उससे जुड़ी संभावनाओं को छोड़ भी दिया जाए तो भी ऐसा कहा जाना या ऐसा सोचा जाना भी बतौर समाज हमारे अब तक असभ्य और कबीलाई रह जाने की तरफ इशारा करता है. यह बताता है कि हमें अपने कानून, धर्म, संस्कृति और यहां तक कि हमारी नैतिकता पर इतना भी भरोसा नहीं है कि हम एक, सिर्फ एक बच्चे को अपराधी बनने से रोक सकें. इस मसले पर बात करते हुए सबसे अफसोसनाक यह है कि जिस व्यक्ति द्वारा, जिन परिस्थितियों में यह बात कही गई है और उस पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं, उसके बाद यहां पर पुलिस-कानून-संविधान, सरकार, धर्म और यहां तक कि मानवता की भी दुहाई देना मुश्किल है.

यहां पर यह कहा जा सकता है कि खुशबू चौहान ने केवल अपनी बात को वजन देने के लिए, एक चरम तक जाने वाला तर्क चुना है या वे जोश में आकर ऐसी बातें कह गई हैं. हो सकता है कॉन्स्टेबल चौहान के साथ ये दोनों बातें हुई हों लेकिन वे लोग जो उनके यूट्यूब वीडियो पर उन्हें शाबासियां दे रहे हैं या उनकी बातों पर गौरव से फूल रहे हैं, वे किस पदार्थ को चखकर बैठे है! यह कैसी विकृत मानसिकता है जो एक भ्रूण की हत्या की बात सुनकर हर्ष और उत्साह का अनुभव करती है? क्यों अखबार पांच मिनट लंबे वीडियो में कही गई तमाम बातों में से इसी एक लाइन को उठाकर अपनी खबर का शीर्षक बना रहे हैं?

...या शायद इस पर और कुछ भी कहने-सुनने के बजाय बस यही एक सवाल किया जाना चाहिए कि ये कैसी नाउम्मीदी है, जिसने दुनिया की सबसे महफूज जगह कही जा सकने वाली कोख पर भी हमें हमलावर होने की बात करने को मजबूर कर दिया है?

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