त्यौहारी सीजन चल रहा है. लेकिन मेरठ की नील गली सर्राफा बाजार की पेचीदा गलियों में भीड़-भाड़ वैसी नहीं है जैसी दशहरे और दीवाली के वक्त हुआ करती है. भीड़-भाड़ की आमदरफ्त ज्वैलरी की दुकानों में कम है, इसका अंदाजा आपको किसी भी दुकान में घुसते ही लग जाता है. खैरियत, पूछने के बाद जैसे ही बातचीत शुरु होती है कारोबारी धंधे के मंदा होने की बात और उसकी वजहें गिनाना शुरु कर देते हैं. आर्थिक मंदी और उसको दूर करने के उपायों की सुर्खियों के बीच जमीन पर कारोबार और रोजगार कैसा चल रहा है, मेरठ की नील गली इसकी चश्मदीद है.

नील गली जेम्स एंड ज्वैलरी की मैन्युफैक्चरिंग के लिहाज से देश का एक बड़ा केंद्र है. यहां बनने वाले सोने आदि के आभूषण पूरे देश में सप्लाई होते हैं. भारत से निर्यात होने वाली ज्वैलरी में भी इस जगह का बड़ा हिस्सा है. कारोबार से जुड़े लोगों के पास बहुत संगठित आंकड़े नहीं हैं, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक यह काम यहां के कुछ लाख लोगों को तो रोजगार देता ही है. मेरठ की ज्वैलरी मैन्युफैक्यचिरंग की खासयित यह बताई जाती है कि यहां काम करने वाले कारीगर हल्की (लाइटवेट) और मनचाही डिजाइन बनाने में दक्ष हैं. लेकिन, फिलहाल एक्सपोर्ट क्वालिटी की ज्वैलरी तैयार करने वाले मेरठ के सर्राफ और कारीगर धंधे में आई मंदी से परेशान हैं.

मेरठ बुलियन ट्रेडर्स एसोसिएशन के महामंत्री सर्वेश सर्राफ बताते हैं, ‘मेरठ में ज्वैलरी बनाने के काम में महाराष्ट्र और बंगाल के कारीगरों की बड़ी संख्या है. मोटे तौर पर जेम और ज्वैलरी बनाने के काम से 35 से 40 हजार कुशल कारीगर जुड़े हुए हैं. लेकिन काम में आई मंदी के कारण इनमें से 25 से 30 फीसदी लोगों को अपना काम गंवाना पड़ा है.’

लेकिन बाजार में सोने के भाव लगातार चढ़ रहे हैं, ऐसे में ज्वैलरी के कारोबार में मंदा क्यों हैं? माना तो यह जाता है कि भारत आभूषण प्रेमी देश है और ज्वैलरी की मांग बढ़ने पर ही सोने के रेट चढ़ते हैं. इस सवाल पर सर्वेश सोने के बढ़े हुए भावों को ज्वैलर्स की सबसे बड़ी मुसीबत में से एक बताते हैं. सर्वेश साफ करते हैं कि सोने के भावों में उछाल (एक समय सोना 40000 रुपये तोला तक पहुंच गया था) की एक वजह तो अंतरराष्ट्रीय है. दूसरी शेयर बाजार और कर्ज बाजार के रिटर्न कम होने से बड़े निवेशक सोने में पैसा लगा रहे हैं तो वे गोल्ड बार (ईंट) खरीदते हैं, ज्वैलरी नहीं.

सर्राफा बाजार के एक अन्य कारोबारी बताते हैं कि सोने के रेट महंगे होने से बेसिक मटीरियल महंगा होता है और फिर लेबर चार्ज, एक्साइज और जीएसटी आदि मिला दो तो ज्वैलरी इतनी महंगी हो जाती है कि आज की मंदी के इस माहौल में ज्वैलरी खरीदना बहुत मुश्किल है. यानी कि सोने की ऊंची कीमतें इसलिए नहीं हैं क्योंकि लोग आभूषण ज्यादा खरीद रहे हैं बल्कि इसकी बढ़ी हुई कीमतों के कारण ज्वैलरी की मांग और कम हुई है.

ज्वैलरी निर्माण के इस धंधे की बारीकी समझने की कोशिश में पता चलता है कि मंदी और उससे निपटने के उपाय जमीन पर इतने प्रभावी क्यों नहीं होते हैं? और कैसे अर्थव्यवस्था के एक हिस्से में हो रही हलचल दूसरे हिस्सों को भी न जाने किस-किस तरह से प्रभावित करती है.

मेरठ की नील गली जेम और ज्वैलरी मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा सेंटर इसलिए बनी क्योंकि यहां पर देश के अन्य जगहों के मुकाबले सस्ते में ज्वैलरी बननी शुरु हुई. यूनाइटेड ज्वैलर्स एंड मैन्युफैक्चरर्स फेडरेशन के संजीव अग्रवाल बताते हैं कि एक समय बंबई और कलकत्ता इस काम के बड़े केंद्र हुआ करते थे, लेकिन वहां मैन्युफैक्चरिंग की लागत इसलिए बढ़ गई क्योंकि कमर्शियल जगहों के किराए बढ़ गए और खर्चीले शहर होने की वजह से लेबर के रेट भी उसी अनुपात में मांगे जाने लगे. ऐसे में यह कारोबार मेरठ और अमृतसर जैसी जगहों पर शिफ्ट हो गया जहां निर्माण की लागत कम थी. चूंकि इस कारोबार से जुड़े ज्यादातर स्किल्ड कारीगर महाराष्ट्र, बंगाल में ही थे इसलिए वे भी यहां चले आए और पीढ़ी दर पीढ़ी इस काम को करने लगे.

मेरठ की नील गली सर्राफा बाजार में ज्वैलरी बनाने में लगे कारीगर. इनकी एक बड़ी तादाद पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र से आती है

जेम और ज्वैलरी डिजाइनिंग की मैन्युफैक्चरिंग के काम करने के मोटे तौर पर दो तरीके हैं. पहला तो यह कि सर्राफ अपने यहां कारीगर को नौकरी पर रखता है और अपने ऑर्डर के मुताबिक उनसे काम करवाता है. दूसरा तरीका यह है कि कई बार किसी कुशल कारीगर को सोना या जिस चीज के आभूषण बनने होते हैं उस धातु को दे दिया जाता है. इसके बाद उससे ठेके पर आभूषण बनवाए जाते हैं. मेरठ की नील गली में सैकड़ों कारीगर छोटी-छोटी दुकानें लेकर यह काम करते हैं और कई लोगों को काम देते हैं. यानी कि ज्वैलरी बनाने के काम से जुड़े कारीगर सिर्फ वेतनभोगी ही नहीं है, बल्कि वे ठेके पर काम लेकर तमाम लोगों को रोजगार भी देते हैं.

शोरूम में सजी ज्वैलरी कितनी मशीनों और कितनी बारीक कारीगरी से गुजरकर ग्राहकों तक पहुंचती है, यह नील गली की छोटी संकरी दुकानों में आकर ही पता चलता है. इस गली में बंगाल के एक सुनार हैं मुजाम. मुजाम सोने के कारोबारियों से सोना लेकर आभूषण बनाते हैं. मौजूद हालात के बारे में पूछने पर वे अपनी कामचलाऊ हिंदी में बताते हैं, ‘काम नहीं मिल रहा है. इसलिए अब सिर्फ एक कारीगर और तीन चेला रखा है. पहले आठ कारीगर, पांच-छह चेला था, लेकिन सबको हटाना पड़ा.’ काम क्यों नहीं आ रहा है? इस पर मुजाम का जवाब होता है कि ‘सोना महंगा हो गया है ज्वैलर भी सोच-समझकर हाथ डाल रहा है. बाजार में सन्नाटा है.’

मुजाम कहते हैं कि सारा खर्चा निकालकर पहले पैंतालीस से पचास हजार तक बच जाता था, लेकिन अभी तो दुकान का खर्चा भी निकालना मुश्किल है. मुजाम नील गली के स्थापित कारीगर हैं, इसलिए धंधे की ऊंच-नीच को फिलहाल संभाल रहे हैं. लेकिन सभी के साथ ऐसा नहीं हैं. मुजाम की दुकान पर काम करने वाले कारीगर कहते हैं कि बहुत से लोगों का काम छूट गया है और वे बंगाल वापस चले गए हैं.

कोलकाता के ही ठेके पर आभूषण बनाने वाले संजय कोटाल कहते हैं, ‘यह दीवाली आने का वक्त है. ठीक-ठाक दिनों में इस समय बात करने की फुर्सत नहीं होती थी, लेकिन इस समय भी काम नहीं है. दीवाली पर ज्वैलर्स की ओर से पहले बड़े ऑर्डर मिलते थे, लेकिन इस बार तो त्यौहार पर भी काम कम है.’ कोटाल बताते हैं कि मरेठ में ढलाई का काम करने वाले ज्यादातर कारीगर महाराष्ट्र से आते हैं और बारीक काम करने वाले कोलकाता से. कोटाल के मुताबिक, अगर कारोबार ठीक चल रहा हो तो ठीक-ठाक काम जानने वाला 25 से 30 हजार महीने तक कमा लेता है. लेकिन, इस समय काम ही नहीं है तो लोग या तो खाली बैठे हैं या कुछ और काम कर रहे हैं. कोटाल कहते हैं, ‘धंधे में इस कदर मंदी है कि सोने की कारीगरी में मदद करने वाले तमाम लोगों का काम छूटा गया है, उनमें से बहुत से लोग तो सब्जी बेचने या ई-रिक्शा चलाने जैसे काम कर रहे हैं.’

ज्वैलरी मैन्युफैक्चरिंग में आई मंदी कितने लोगों के रोजगार प्रभावित कर रही है, इसे यहां के एक व्यापारी आशुतोष अग्रवाल दिलचस्प तरीके से समझाते हैं, ‘एक अंगूठी सर्राफ बेचता है और ग्राहक खरीदता है. लेकिन इसके पीछे तमाम लोगों का रोजगार जुड़ा होता है. अंगूठी बनाने वाले, पॉलिश करने वाला, रॉ मैटीरियल सप्लायर, ज्वैलरी बॉक्स बनाने वाला, उसे सप्लाई करने वाला, टूल्स सप्लाई करने वाले. अब आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल होता है तो उनका रखरखाव करने वाले. इस तरह एक चार-पांच हजार की अंगूठी अगर बाजार में बिकती है तो उससे कम से कम 18से 19 लोगों की रोजगार की चेन जुड़ती है. ऐसे में अगर बाजार मंदा है तो अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने लोगों का काम प्रभावित है.’

संजीव अग्रवाल भी इसकी तसदीक करते हुए कहते हैं कि साल भर पहले तक जेम एंड ज्वैलरी बनाने वाले 35 से चालीस हजार कारीगर मेरठ में थे, लेकिन अब उनकी संख्या सिर्फ 15 से 20 हजार बची है. यानी कि साल भर की अवधि में ही तकरीबन आधे कारीगर अपनी नौकरी गंवा चुके हैं. जाहिर सी बात है कि जब इतने लोगों के हाथ में पैसा नहीं रहा तो इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ ही रहा होगा. इसे सीधे शब्दों में समझना चाहें तो जैसा कि आशुतोष ने बताया किसी एक वजह से जब कुछ लोगों के पास पैसा कम होता है तो यह उन लोगों की क्रय शक्ति को कम करता है जिनका माल या सेवाएं पैसा होने पर पहले वाले लोग खरीदते.

ज्वैलरी निर्माण के इस काम में बहुत बारीकी और कुशलता की जरूरत होती है, लेकिन बाजार में मंदा होने से कारीगरों की नौकरियां जा रही हैं

देश में छाई एक व्यापक आर्थिक सुस्ती और अंतरराष्ट्रीय वजहों से तो इस धंधे में सुस्ती आई ही है. लेकिन, आभूषण कारोबारी इसकी एक बड़ी वजह सरकार की नीतियों को भी मानते हैं. ज्यादातर कारोबारियों का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी ने सर्राफा कारोबार की रफ्तार सुस्त की और उसके बाद बाकी मंदी आदि ने धंधे को और चौपट कर दिया. ऊपर से हाल ही में सरकार ने सोने पर एक्साइज ड्यूटी 10 से बढ़ाकर 12.5 फीसद कर दी है. यानी ज्वैलर्स को मिलने वाला सोना और महंगा हो गया है.

आर्टीफिशियल ज्वैलरी के कारोबार से जुड़े मेरठ के नितिन कहते हैं कि चालीस हजार रूपये तोले की चीज पर तीन फीसद जीएसटी भी काफी बैठती है फिर सोने पर 12.5 फीसद की एक्साइज ड्यूटी और लेबर पर पांच फीसदी चार्ज. ऐसे में आभूषणों की लागत लगातार बढ़ रही है और खरीदार कम हो रहे हैं. लागत का फर्क यूं भी पड़ रहा है क्योंकि मेरठ जैसे केंद्र सस्ते में काम करने के लिए ही जाने जाते हैं. ऐसे में ऑर्डर देने वाली पार्टियां दूसरे तरीके ढूंढ़ने लगती हैं.

इसके अलावा कारोबारी बताते हैं कि भारत में बड़े पैमाने पर 20 कैरेट की ज्वैलरी बना करती थी. सरकार ने फिलहाल उसे हॉलमार्क करना बंद कर दिया है और इस बारे में नीति स्पष्ट नहीं है. इससे भी आभूषण के कारोबार को बड़ा धक्का लगा है क्योंकि यह मांग का एक बड़ा हिस्सा था. ऐसा क्यों किया गया है, यह भी साफ नहीं है. कारोबारी तो कम से कम ऐसा ही आरोप लगाते हैं.

सोने पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने का क्या मकसद हो सकता है? क्या सरकार इससे राजस्व बढ़ाना चाहती है? या सरकार सोने की आमद कम करके उसमें निवेश कम करना चाहती है? ये सब सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन कारोबारी कहते हैं कि एक्साइज ड्यूटी बढ़ा देने से दोनों बातें हल नहीं होती. कई कारोबारी बताते हैं कि एक्साइज ड्यूटी बढ़ने के बाद नेपाल के रास्ते बड़े पैमाने पर सोने की तस्करी बढ़ी है. कारोबारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि इस तरह का सोना दिल्ली में चांदनी चौक में बड़ी मात्रा में खरीदा जाता है और फिर एजेंट्स के जरिये उन्हें बेचा जाता है. तस्करी का सोना खरीदने वाले मोटा लाभ कमाते हैं, लेकिन सीधा कारोबार करने वाले ज्वैलर्स परेशान हैं.

कारोबारी कहते हैं कि सरकार सर्राफे के कारोबार को शक की निगाह से देखती है. वह जीएसटी को लेकर स्वर्ण कारोबारियों पर सख्ती करती है. लेकिन ग्राहक अगर एक तोला सोने का आभूषण खरीदता है तो बिल के साथ और बिना बिल के सोने में दो हजार का फर्क आ जाता है. ऐसे में ग्राहक बिना बिल के ही सोना खरीदना पसंद करता है. यह अलग तरीके की परेशानी है जिसे कोई समझना नहीं चाहता.

जिन दुकानों पर कभी दस लोग काम करते थे, अब उनमें सिर्फ तीन से चार लोगों का काम ही बचा है

मेरठ में जेम एंड ज्वैलरी की मैन्युफैक्चिरिंग का कारोबार लाखों लोगों के रोजगार का जरिया है. सरकार छोटे उद्योगों के लिए सस्ते कर्ज की बात करती हैं, लेकिन जमीन पर ऐसा नहीं है. यूनाइटेड ज्वैलर्स एंड मैन्युफैक्चरर्स फेडरेशन के अध्यक्ष संजीव अग्रवाल कहते हैं कि नीरव मोदी कांड के बाद बैंकों को एक तरह से अघोषित निर्देश हैं कि ज्वैलर्स को कर्ज न दिया जाये. वे खुद अपना उदाहरण देकर बताते हैं कि कैसे जिला उद्योग केंद्र के मार्फत उनका प्रस्ताव बैंक तक गया, लेकिन बैंक ने कर्ज देने से इनकार कर दिया. जाहिर है कि पॉलिसी की ट्रिकल डाउन बातें जमीन पर आते-आते कुछ और हो जाती हैं.

मेरठ की नील गली आभूषण निर्माण से जुड़े कारोबार का एक सैंपल हैं. जिससे लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. अगर इस तस्वीर को बड़ा करके पूरे देश के स्तर पर देखा जाए तो हालात ज्यादा चिंताजनक दिखती है. आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सोने से लेकर आर्टिफिशियल ज्वैलरी बनाने वाले कारीगरों की कुल संख्या छह करोड़ के आसपास है. अगर मेरठ को उदाहरण माना जाए तो यहां पर पच्चीस से तीस फीसद कारीगर अपना रोजगार गंवा चुके हैं. अगर इस संख्या को कम ज्यादा पूरे देश पर लागू किया जाए तो कहा जा सकता है कि लाखों की संख्या में आभूषण कारीगरों की रोजी छिन चुकी है.

इस कारोबार की मंदी इसलिए भी घातक है कि भारत जिन चीजों के निर्यात में अग्रणी है उनमें आभूषण भी हैं. जाहिर है कि अगर यह क्षेत्र इसी तरह मुसीबत का सामना करता रहा तो लगातार कम होता निर्यात और कम होगा जो सरकार और अर्थव्यवस्था के लिए और भी चिंता की बात होगा.