2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे उस वक्त की भारतीय जनता पार्टी में उनके अमित शाह के साथ सबसे ताकतवर स्थिति में भाजपा महासचिव राम माधव दिखते थे. मई, 2014 में मिली चुनावी जीत के वक्त अमित शाह भी महासचिव ही थे और बाद में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था. अमित शाह की टीम में बतौर महासचिव काम करने वाले राम माधव के बारे में कुछ ही समय में यह धारणा बनने लगी थी कि पार्टी में उसके अध्यक्ष के बाद वे ही सबसे ताकतवर नेता हैं.

राम माधव की सक्रियता सिर्फ पार्टी के मामलों तक ही सीमित नहीं थी. नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के शुरुआती दिनों में विदेशों में कई बड़ी रैलियों को संबोधित किया था और उनके आयोजन में भी राम माधव ने ही प्रमुख भूमिका निभाई थी. देश के बाहर बसे भारतीयों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो संवाद का दौर शुरू हुआ, उसके सूत्रधार के तौर पर भी राम माधव का ही नाम लिया जाता था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता के तौर पर काम करने का उनका अनुभव और हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी दक्ष होना इस लिहाज से काफी उपयोगी साबित हो रहा था. इसके अलावा विदेश मामलों में उनकी दिलचस्पी काफी पहले से रही है. नीतिगत मामलों के अध्ययन के लिए नई दिल्ली से एक थिंक टैंक चलाने के पीछे की प्रेरणा भी वे ही थे. विदेश मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर वे न सिर्फ बयान देते रहे हैं बल्कि इन विषयों पर समाचार पत्रों में लेख भी लिखते रहे हैं.

इसके साथ-साथ अमित शाह भाजपा के अंदर भी उन्हें अहम जिम्मेदारियां दे रहे थे. उन्हें पूर्वोत्तर के राज्यों के प्रभार के साथ भाजपा के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद अहम माने जा रहे जम्मू-कश्मीर का प्रभार भी दिया गया था. पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए उन्होंने पूर्वोत्तर जनतांत्रिक गठबंधन बनाने में भी अहम भूमिका निभाई और वहां के छोटे-छोटे दलों को भाजपा के साथ जोड़ा. दूसरी पार्टियों के कुछ प्रमुख नेताओं को भाजपा में लाने में भी वे सफल रहे. जम्मू-कश्मीर में भी संगठन के स्तर पर उनके कामकाज की तारीफ पार्टी के नेता करते हैं. वहां पर पीडीपी के साथ भाजपा का गठबंधन कराने में भी उनका बड़ा योगदान माना जाता है.

लेकिन कभी बेहद ताकतवर महासचिव माने जाने वाले राम माधव अब न तो प्रधानमंत्री की रैलियों के आयोजन में सक्रिय दिखते हैं और न ही पार्टी के अंदर बतौर महासचिव ही उनकी वह स्थिति दिखती है जो आज से कुछ समय पहले तक थी. पार्टी के अंदर राम माधव के कमजोर होने के बारे में भाजपा के ही एक नेता पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर कहते हैं, ‘आम तौर पर किसी भी पार्टी में जो भी प्रमुख पदाधिकारी होते हैं, उन्हें यह उम्मीद होती है कि अगर पार्टी मजबूत स्थिति में रहेगी तो उन्हें राज्यसभा में भेजा जा सकता है. राम माधव को भी अपनी पार्टी से यही उम्मीद थी. लेकिन उनकी बजाय उनसे काफी जूनियर माने जाने वाले नेताओं को राज्यसभा में भेज दिया गया. अरुण जेटली के निधन के बाद राज्यसभा में उनके जैसा एक वक्ता होता तो इससे सरकार की स्थिति और मजबूत दिखती. लेकिन फिर भी उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा गया.’

वे एक और उदाहरण देते हैं, ‘नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में जब-जब मंत्रिमंडल विस्तार हुआ, तब-तब यह चर्चा चली कि उन्हें मोदी कैबिनेट में जगह मिलेगी. लेकिन इस मामले में भी राम माधव के हाथ निराशा ही लगी. उनसे काफी बाद राजनीति में आने वाले लोगों को और यहां तक कि उनसे काफी कम प्रतिभावान लोगों को भी मोदी सरकार में काम करने का अवसर मिला लेकिन राम माधव को यह अवसर नहीं दिया गया.’

अब सवाल यह उठता है कि आखिर कभी इतने ताकतवर रहे राम माधव के साथ ऐसा क्या हुआ कि वे धीरे-धीरे अपनी ही पार्टी में हाशिये पर चले गए? इस बारे में पार्टी के कुछ नेताओं से बात करने पर कुछ-कुछ एक जैसी ही बातें सामने आती हैं.

इस बारे में भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘आप अगर ध्यान से देखेंगे तो अमित शाह ने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अपनी जो नई टीम बनाई है, उसमें अधिकांश नए लोग ही हैं. इनमें से भी ज्यादातर ऐसे हैं जिनकी अपनी कोई पहचान नहीं है. उनकी कुल पहचान यही है कि वे अमित शाह के विश्वस्त हैं. इस तरह की किसी भी टीम में राम माधव फिट नहीं बैठते हैं. अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले भी राम माधव की अपनी एक पहचान थी और आज भी है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनके जुड़ाव और और उसके प्रवक्ता के रूप में विदेशों में भी उन्हें जानने वालों की कमी नहीं है. संभव है कि राम माधव का यह कद ही पार्टी में उनके आगे बढ़ने की राह का रोड़ा बन रहा हो.’

‘मुझे लगता है कि विदेशों में नरेंद्र मोदी की रैलियों के सफल आयोजन का श्रेय जिस तरह से राम माधव को मीडिया में मिल रहा था, वह शीर्ष नेतृत्व को ठीक नहीं लगा होगा. संघ प्रवक्ता के तौर पर काम करने की वजह से मीडिया में राम माधव के मित्रों की कमी नहीं है. वह भी खास तौर पर अंग्रेजी मीडिया में. ये लोग राम माधव को रैलियों के आयोजन का श्रेय दे रहे थे. यह बात पार्टी में निर्णय लेने वाले लोगों को ठीक नहीं लगी होगी. क्योंकि इससे नरेंद्र मोदी की लोगों के बीच लोकप्रिय होने की छवि पर असर पड़ता है. ये भी एक वजह हो सकती है कि राम माधव को न तो राज्यसभा भेजने के लिए उपयुक्त समझा गया और न ही केंद्र सरकार में मंत्री बनने के लिए’ भाजपा के एक दूसरे नेता बताते हैं कि शायद इसी वजह से उन्हें अब प्रधानमंत्री के आयोजनों से भी दूर ही रखा जाता है.

पार्टी के कुछ नेता तो यह भी कहते हैं कि पूर्वोत्तर में प्रभारी के तौर पर काम करने वाले राम माधव पर कुछ आरोप भी लगे लेकिन इनकी सत्यता की पुष्टि नहीं हो पाई. वहीं जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से भाजपा के लिए राजनीतिक तौर पर स्थितियां खराब हुईं, उसके लिए भी पार्टी के अंदर कुछ लोगों ने राम माधव को ही जिम्मेदार ठहराया. भाजपा नेताओं की बातचीत से लगता है कि पार्टी के अंदर उनकी कमजोर होती स्थिति में इन बातों का भी शायद कुछ योगदान रहा होगा.