2019 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नाम प्रस्तावित करने की अंतिम तारीख़ 31 जनवरी 2019 थी. तब तक नॉर्वे की शांति पुरस्कार समिति को दुनिया के सभी कोनों से कुल 301 नामांकन मिल चुके थे. उनमें से 78 नाम संस्थाओं या संगठनों के थे, शेष 223 नाम एकल व्यक्तियों के थे. दुनिया इन नामों को 50 वर्ष बाद ही जान सकेगी. नोबेल शांति पुरस्कार के नियमों के अनुसार, प्रस्तावित नामों को 50 वर्ष बाद ही प्रकाशित किया जा सकता है.

नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता का चयन नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में स्थित एक अलग समति करती है. उसके सदस्य नॉर्वे की संसद द्वारा मनोनीत किये जाते हैं. अध्यक्ष सहित उसके पांच सदस्य होते हैं और हर सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है. उनका नॉर्वे का नागरिक होना अनिवार्य नहीं है. तब भी समिति के अब तक के इतिहास के सभी सदस्य नॉर्वे के ही नागरिक रहे हैं. नोबेल पुरस्कारों के प्रणेता, उद्योगपति अल्फ़्रेड नोबेल की इच्छानुसार, विज्ञान और सहित्य के पुरस्कारों के विजेता तो स्वीडन स्थित समितियां चुनती हैं, जबकि शांति पुरस्कार का दायित्व नॉर्वे की समिति को दिया गया है. अल्फ़्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में इसका कोई कारण नहीं बताया था.

सबसे अधिक चर्चा में है ग्रेटा का नाम

समिति के सामने जो 223 एकल व्यक्तियों के नाम हैं, उनमें से जिस नाम की इस वर्ष के शांति पुरस्कार के लिए हर जगह सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है स्वीडन की ग्रेटा तुनबेर्ग. अगर उन्हें यह पुरस्कार मिलेगा तो वे इसे पाने वाली सबसे कम उम्र की इंसान होंगी. 16 वर्ष की ग्रेटा स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के एक हाई स्कूल की छात्रा है. शुक्रवार 11 अक्टूबर निकट आने के हर दिन के साथ मीडिया में, और यूरोप के सट्टा बाज़ारों में भी, सबसे अधिक दांव उसी के नाम पर लगाए जा रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेने और उसकी रोकथाम के लिए जल्द ही कठोर क़दम उठाने की मांग करने वाली ग्रेटा तुनबेर्ग ने, एक ही वर्ष के भीतर, पूरी दुनिया में अपने नाम की धूम मचा दी है. इस धूम की शुरुआत 20 अगस्त 2018 को हुई. वह गर्मी की छुट्टियों के बाद स्वीडन के नये स्कूली वर्ष का पहला दिन था. दो लंबी चोटियों के बीच गोलमटोल चेहरे वाली छोटे कद की ग्रेटा उस दिन राजधानी स्टॉकहोम के संसद-भवन की दीवार से पीठ टिकाकर ज़मीन पर धरना देने बैठी थी. साथ में उसका स्कूली बस्ता और हाथ में एक तख्ती थी. तख्ती पर बड़े-बड़े लैटिन अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘स्कोलस्ट्रइक फ़्यौअर क्लीमातेत’ (जलवायु के लिए स्कूल जाने से हड़ताल). उसके चेहरे और आंखों से ऐसी उदासी टपक रही थी, मानो उससे अधिक दुखी एवं एकाकी इस संसार में कोई नहीं है.

संसद भवन के बाहर प्रदर्शन

नौवीं कक्षा में पढ़ रही ग्रेटा उस समय 15 साल की थी. तभी से वह हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बदले जलवायुरक्षा की गुहार लगाती वही तख्ती हाथ में लिये संसद भवन के बाहर प्रदर्शन करने लगी. उसकी देखा-देखी, स्वीडन या यूरोप के ही नहीं, भारत सहित पूरी दुनिया के स्कूली बच्चों का ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ (हर शुक्रवार भविष्य बचाने के लिए) नाम का एक विश्व्यापी आंदोलन चल पड़ा.

दुनिया के ढेर सारे देशों के लाखों स्कूली बच्चे अब हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बजाय सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे हैं. न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र जलवायु रक्षा शिखर सम्मेलन हो या स्विट्ज़रलैंड में दावोस का ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’, 10-12 साल की किसी बच्ची-जैसी दिखती ग्रेटा को भाषण देने के लिए आमंत्रित करने वालों का हर जगह तांता लग गया है. मीडिया में उसका इंटरव्यू पाने की होड़ चल रही है. एक से एक नामी पुरस्कारों की उस पर वर्षा हो रही है. एक से एक नामी वैज्ञानिक उसे परामर्श दे रहे हैं. जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र जो विश्वव्यापी चेतना अनेक वर्षों से नहीं जगा पाया, उसे ग्रेटा तुन्बर्ग ने युवाओं और छात्रों वाले अपने ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ आन्दोलन के द्वारा एक ही साल में ही कर दिखाया.

ईमानदारी के साथ स्वयं भी अमल करती है

जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए ग्रेटा जो कुछ कहती है, पूरी ईमानदारी के साथ उस पर स्वयं भी अमल करती है. वह शुद्ध शाकाहारी बन गयी है. किसी ईंधन से चलने वाली बस, कार, विमान या जहाज़ से यात्रा नहीं करती. केवल साइकल, इलेक्ट्रिक कार, ट्रेन या बिना मोटर वाली नौका से कहीं आती-जाती है.

गत सितंबर में न्यूयॉर्क में हुए जलवायु रक्षा शिखर सम्मेलन में विश्व भर के नेताओं को झिड़की देने वाले अपने भाषण के लिए भी ग्रेटा स्वीडन से किसी विमान द्वारा नहीं, पहले ट्रेन से और बाद में अटलांटिक महासागार को पार करने के लिए कई लोगों के साथ एक पालदार नौका द्वारा गयी थी.जलवायु परिवर्तन संबंधी सत्य के प्रति उसका अहिंसक आग्रह महात्मा गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन की याद जगा देता है. अमेरिका में बस गये भारतीय मूल के लेखक सलमान रुश्दी ने एक जर्मन दैनिक से कहा,’’वह मेरी हीरो है. निडर है. उसका हर शब्द सही होता है.’’

किसी सनक की सीमा तक जाते अपने दृढ़निश्चय और अपने ध्येय के प्रति किसी आस्था की सीमा तक पहुंचते समर्पणभाव के बारे में 16 साल की कच्ची आयु में ही ग्रेटा कहने लगी है, ‘‘मैं यथार्थवादी हूं. तथ्यों को देखती हूं. जानती हूं कि क्या करने की ज़रूरत है. मुझे अपने काम के प्रति कोई संदेह नहीं है. मैं, बस, कर रही हूं. यदि मैं कुछ करने का मन बना लेती हूं, तो उसे करके ही रहती हूं. आगा-पीछा नहीं करती. मैंने अनेक वैज्ञानिकों से बातें की हैं. अनेक रिपोर्टें और लेख पढ़े हैं. भलीभांति जानती हूं कि जलवायु-परिवर्तन की स्थिति कितनी गंभीर है. बार-बार महसूस होता है कि यदि मैं अभी कुछ नहीं करती, तो बाद में पछताऊंगी.’’

ग्रेटा का आन्दोलन जलवायु ही नहीं, शांति का भी रक्षक

इन्हीं सब बातों से प्रभावित हो कर नॉर्वे की संसद के तीन वामपंथी समाजवादी सांसदों और स्वीडन के दो बड़े नेताओं ने भी नॉर्वे की नोबेल शांति पुरस्कार समिति से ग्रेटा के नाम की सिफ़ारिश की है. इसका औचित्य बताते हुए उन्होंने लिखा, ‘’हम ग्रेटा को नामांकित कर रहे हैं, क्योंकि जलवायुसंकट युद्ध और संघर्ष का बहुत बड़ा कारक बन सकता है...ग्रेटा ने जिस विराट आन्दोलन को खड़ा कर दिया है, वह शांति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान है.’’

जो लोग, संगठन या व्यावसायिक प्रतिष्ठान ग्रेटा के आन्दोलन की सफलता में अपने हितों के लिए ख़तरा देखते हैं या उसकी प्रसिद्धि से जलते हैं, वे उसे बहुत कम आयु की लड़की, अधकचरी, अनुभवहीन या पर्दे के पीछे छिपे किन्हीं अदृश्य सूत्रधारकों की कठपुतली बताकर उसका विरोध भी कर रहे हैं. उसके आन्दोलन ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ को हथिया लेने, भटका देने या उसमें फूट डालन देने के भी प्रयास हो रहे हैं. कुछ लोग उसे अकेले ही पुरस्कृत करने के बदले उसके आन्दोलन ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ को पुरस्कृत किये जाने का समर्थन करते हैं.

कम आयु आड़े भी सकती है

ओस्लो के शांति शोध संस्थान के प्रमुख हेनरिक उर्दाल की दृष्टि से यह संभावना नहीं के बराबर ही है कि ग्रेटा को इस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार मिलेगा. उर्दाल के अनुसार, 16 वर्ष की उसकी बहुत कम आयु उसके आड़े आयेगी. ऩोबेल शांति पुरस्कार पाने वालों में सबसे कम आयु का अब तक का रिकार्ड पाकिस्तान की मलाला यूसुफ़ज़ई का है. वह वास्तव में ब्रिटेन में रहती है. उसे 2014 में जब यह पुरस्कार मिला था, तब उसकी आयु 17 साल की थी.

मलाला को पुरस्कार मिलने का मुख्य कारण यह था कि अताउल्ला ख़ान नाम के एक तालिबान लड़ाके ने, 9 अक्बूर 2012, को स्कूल जाने के दौरान उसकी हत्या करने के लिए उस पर गोली चलाई थी. उसे गर्दन और सिर में गोली लगी थी. पाकिस्तान में आरंभिक उपचार के बाद उसका ब्रिटेन में इलाज़ हुआ. उसकी हत्या के प्रयास को इस बात से जोड़ा गया कि तालिबान लड़िकियों और महिलाओं को शिक्षा और बराबरी का दर्जा दिये जाने के विरुद्ध है, जबकि मलाला शिक्षा और बराबरी की प्रबल समर्थक है.

मीडिया ने मलाला को उछाला

पाकिस्तान, ब्रिटेन और अमेरिका के मीडिया ने इस घटना को खूब उछालते हुए उसे ऐसा रंग दिया, मानो मलाला नारी शिक्षा और समानता की अपूर्व रणबांकुरी है. उसे नोबेल पुरस्कार मिलने से तालिबानी विचारधारा ध्वस्त हो जायेगी. स्वस्थ होने के बाद मलाला नारी शिक्षा और समानता के प्रचार से जुड़ी ज़रूर, पर उसकी प्रसिद्धि और उसे नोबेल शांति पुरस्कार मिलने का मुख्य कारण दो वर्ष पूर्व उसकी हत्या का प्रयास था, जब वह मात्र 15 साल की एक स्कूली छात्रा थी.

मलाला के बहुत से प्रशंसक अब इस बात से निराश भी हैं कि उसका रहन-सहन कुछ ज्यादा ही इस्लामी है. और उसके पहनावे से नारी समानता का बोध नहीं होता. पाकिस्तान, विशेषकर अपनी मातृभूमि स्वात की परिस्थितियों के बारे में वह चुप रहना ही पसंद करती है. दूसरी ओर, भारतीय कश्मीर की स्थिति के बारे में टीका-टिप्पणी करने के लिए वह अपने आप को कहीं अधिक अधिकृत समझती है. मलाला को लेकर उसके प्रशंसकों को अब जो मलाल है, वही ग्रेटा तुनबेर्ग को मात्र 16 साल की आयु में नोबेल शांति पुरस्कार देने के भी आड़े आ सकता है.

मलाला और ग्रेटा के बीच अंतर

तब भी, मलाला और ग्रेटा के बीच बहुत बड़ा अंतर है. मलाला का भाग्य अपनी हत्या के एक प्रयास में घायल होने के बाद चमका, न कि अपने किसी चमत्कारिक विचार या मौलिक काम से. ग्रेटा की मौलिकता यह है कि उसने बहुत अल्प आयु में ही जलवायुरक्षा जैसे एक गूढ़ विषय के महत्व को जान लिया और एकनिष्ठ भाव से अपने आप को उसके प्रति समर्पित कर दिया.

स्वीडन की बर्फीली ठंड में हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बदले वहां के संसद भवन के बाहर धरना देना कोई खिलवाड़ नहीं था. उसे देखकर दूसरे स्कूली छात्र और युवा भी उससे जुड़ने लगे. देखते ही देखते यह जुड़ाव जनसाधारण ही नहीं, राजनेताओं को भी झकझोर देने वाला एक अपूर्व रचनात्मक विश्वव्यापी आन्दोलन बन गया. यही ग्रेटा की ‘ग्रेटनेस’ (महानता) है. उसे यदि नोबेल शांति पुरस्कार मिलता है, तो यह पूरी तरह न्यायसंगत ही नहीं, नोबेल शांति पुरस्कार समिति की दूरदर्शिता को भी दिखायेगा. दुर्भाग्य से वह हमेशा न्यायसंगत या दूरदर्शी नहीं रही है. महात्मा गांधी या विनोबा भावे को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलना इसके दो सबसे बड़े उदाहरण हैं.