शुक्रवार को 2019 के नोबेल शांति पुरस्‍कार की घोषणा हो गई. इस बार दुनिया के इस सबसे प्रतिष्ठित पुरस्‍कार के लिए इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली को चुना गया. नोबेल शांति पुरस्कार के लिए इस बार 301 नाम प्रस्तावित थे. इनमें से 223 नाम एकल व्यक्तियों के थे और बाकी संस्थाओं के. इन 223 लोगों में जिन दो लोगों को नोबेल पुरस्कार का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा था वे थे ग्रेटा तुनबेर्ग और अबी अहमद अली.

43 साल के अबी अहमद अली को यह सम्मान इरीट्रिया के साथ सीमा संघर्ष को हल करने के लिए उनकी निर्णायक पहल के लिए दिया जा रहा है. इरीट्रिया करीब तीन दशक के लंबे संघर्ष के बाद 1993 में इथियोपिया से अलग हुआ था. जल्द ही दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर झगड़े होने लगे और सीमाई शहरों पर बम और गोलाबारी आम बात हो गई. दो दशक से भी लंबे समय तक चले इस संघर्ष में दोनों देशों के कम से कम एक लाख लोगों को जान गंवानी पड़ी.

इस संघर्ष के खत्म होने के आसार नहीं लग रहे थे कि तभी सितंबर 2018 में अबी अहमद अली की तरफ से शांति की असाधारण पहल हुई. कभी छापामार लड़ाके रहे अबी अहमद अली की इस इलाके के अलग-अलग समुदायों के बीच अच्छी पकड़ है. उनकी कोशिशों से दोनों देशों के बीच शांति समझौता हुआ और एक लंबे समय से चले आ रहे टकराव पर विराम लग गया.

उधर 16 वर्ष की ग्रेटा तुनबेर्ग स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के एक हाई स्कूल की छात्रा है. और पुरस्कार की घोषणा से ठीक पहले तक मीडिया में, और यूरोप के सट्टा बाज़ारों में भी, सबसे अधिक दांव उसी के नाम पर लगाए जा रहे थे.

जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेने और उसकी रोकथाम के लिए जल्द ही कठोर क़दम उठाने की मांग करने वाली ग्रेटा तुनबेर्ग ने, एक ही वर्ष के भीतर, पूरी दुनिया में अपने नाम की धूम मचा दी है. इस धूम की शुरुआत 20 अगस्त 2018 को हुई जब दो लंबी चोटियों और गोलमटोल चेहरे वाली छोटी सी ग्रेटा स्टॉकहोम में संसद-भवन के बाहर धरना देने बैठ गई थी. उसके साथ उसका स्कूली बस्ता और हाथ में एक तख्ती थी जिस पर बड़े-बड़े लैटिन अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘स्कोलस्ट्रइक फ़्यौअर क्लीमातेत’ (जलवायु के लिए स्कूल जाने से हड़ताल).

नौवीं कक्षा में पढ़ रही ग्रेटा उस समय 15 साल की थी. तभी से वह हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बदले जलवायु रक्षा की गुहार लगाती वही तख्ती हाथ में लिये संसद भवन के बाहर प्रदर्शन करने लगी. उसकी देखा-देखी, स्वीडन या यूरोप के ही नहीं, भारत सहित पूरी दुनिया के स्कूली बच्चों का ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ (हर शुक्रवार भविष्य बचाने के लिए) नाम का एक विश्व्यापी आंदोलन चल पड़ा.

इसके बाद न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र जलवायु रक्षा शिखर सम्मेलन हो या स्विट्ज़रलैंड में दावोस का ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’, ग्रेटा को भाषण देने के लिए आमंत्रित करने वालों का हर जगह तांता लग गया. मीडिया में उसका इंटरव्यू पाने की होड़ चली और एक से एक नामी पुरस्कारों की उस पर वर्षा भी लगातार होती रही है. जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र जो विश्वव्यापी चेतना अनेक वर्षों से नहीं जगा पाया, उसे ग्रेटा तुन्बर्ग ने युवाओं और छात्रों वाले अपने ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ आन्दोलन के द्वारा एक ही साल में ही कर दिखाया.

जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए ग्रेटा जो कुछ कहती है, पूरी ईमानदारी के साथ उस पर स्वयं भी अमल करती है. वह शुद्ध शाकाहारी बन गयी है. किसी ईंधन से चलने वाली बस, कार, विमान या जहाज़ से यात्रा नहीं करती. केवल साइकल, इलेक्ट्रिक कार, ट्रेन या बिना मोटर वाली नौका से कहीं आती-जाती है. गत सितंबर में न्यूयॉर्क में हुए जलवायु रक्षा शिखर सम्मेलन में विश्व भर के नेताओं को झिड़की देने वाले अपने भाषण के लिए भी ग्रेटा स्वीडन से किसी विमान द्वारा नहीं, ट्रेन और पालदार नौका द्वारा गयी थी.

ग्रेटा तुनबेर्ग की इन्हीं सब बातों से प्रभावित हो कर नॉर्वे के तीन सांसदों और स्वीडन के दो बड़े नेताओं ने नॉर्वे की नोबेल शांति पुरस्कार समिति से ग्रेटा के नाम की सिफ़ारिश की थी. इसका औचित्य बताते हुए उन्होंने लिखा, ‘हम ग्रेटा को नामांकित कर रहे हैं, क्योंकि जलवायुसंकट युद्ध और संघर्ष का बहुत बड़ा कारक बन सकता है...ग्रेटा ने जिस विराट आन्दोलन को खड़ा कर दिया है, वह शांति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान है.’

लेकिन जो लोग, संगठन या व्यावसायिक प्रतिष्ठान ग्रेटा के आन्दोलन की सफलता में अपने हितों के लिए ख़तरा देखते हैं या उसकी प्रसिद्धि से जलते हैं, वे उसे बहुत कम आयु की लड़की, अधकचरी, अनुभवहीन या पर्दे के पीछे छिपे किन्हीं अदृश्य सूत्रधारकों की कठपुतली बताकर उसका विरोध भी करते रहे हैं. कुछ लोग उसे अकेले ही पुरस्कृत करने के बदले उसके आन्दोलन ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ को नोबेल पुरस्कार दिये जाने का समर्थन कर रहे थे.

इसके अलावा मीडिया में कितनी भी चर्चा क्यों न रही हो ऐसे कुछ लोग भी थे जो मानते थे कि ग्रेटा को इस बार का नोबेल पुरस्कार मिलने की संभावना नहीं के बराबर है. ऐसे लोगों में ओस्लो के शांति शोध संस्थान के प्रमुख हेनरिक उर्दाल भी थे जिनका कहना था कि 16 वर्ष की बहुत कम आयु इस मामले में ग्रेटा के आड़े आने वाली है. ऩोबेल शांति पुरस्कार पाने वालों में सबसे कम आयु का अब तक का रिकार्ड पाकिस्तान की मलाला यूसुफ़ज़ई का है. उसे 2014 में जब यह पुरस्कार मिला था, तब उसकी आयु 17 साल की थी.

मलाला को पुरस्कार मिलने का मुख्य कारण यह था कि अताउल्ला ख़ान नाम के एक तालिबान लड़ाके ने, 9 अक्बूर 2012, को स्कूल जाने के दौरान उसकी हत्या करने के लिए उस पर गोली चलाई थी. उसकी हत्या के प्रयास को इस बात से जोड़ा गया कि तालिबान लड़िकियों और महिलाओं को शिक्षा और बराबरी का दर्जा दिये जाने के विरुद्ध है, जबकि मलाला शिक्षा और बराबरी की प्रबल समर्थक है.

स्वस्थ होने के बाद मलाला नारी शिक्षा और समानता के प्रचार से जुड़ी ज़रूर, पर मलाला के बहुत से प्रशंसक अब इस बात से निराश भी हैं कि उसका रहन-सहन कुछ ज्यादा ही इस्लामी है. और उसके पहनावे से नारी समानता का बोध नहीं होता. पाकिस्तान, विशेषकर अपनी मातृभूमि स्वात की परिस्थितियों के बारे में ब्रिटेन में रहने वाली मलाला अब ज्यादा बात नहीं करती है. मलाला को लेकर उसके प्रशंसकों को अब जो मलाल है, कुछ लोगों के मुताबिक वही ग्रेटा तुनबेर्ग को मात्र 16 साल की आयु में नोबेल शांति पुरस्कार देने के भी आड़े आ सकता था.

तब भी, मलाला और ग्रेटा के बीच बहुत बड़ा अंतर है. मलाला का भाग्य अपनी हत्या के एक प्रयास में घायल होने के बाद चमका, न कि अपने किसी चमत्कारिक विचार या मौलिक काम से. ग्रेटा की मौलिकता यह है कि उसने बहुत अल्प आयु में ही जलवायुरक्षा जैसे एक गूढ़ विषय के महत्व को जान लिया और एकनिष्ठ भाव से अपने आप को उसके प्रति समर्पित कर दिया. और इस वजह से उसे यदि नोबेल शांति पुरस्कार मिलता, तो वह पूरी तरह न्यायसंगत होता.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली को इस पुरस्कार के लिए चुना जाना गलत है. ग्रेटा तुनबेर्ग के पास इस पुरस्कार के लिए अभी पूरी उम्र पड़ी है. और अगर नोबेल शांति पुरस्कार ग्रेटा को मिलता तब हम अगर चाहते तो एकदम सीधे और सरल होकर यह कह सकते थे कि अली भी अभी सिर्फ 43 साल के ही हैं.