बीते हफ्ते अमेरिका ने सीरिया से लगती तुर्की की सीमा से अपने सैनिकों को हटाने का ऐलान कर दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तुर्की से लगी सीरिया के उत्तरी सीमाई क्षेत्र में जो स्थिति बनी हुई है, उससे तुर्की और कुर्दों को खुद निपटना होगा. उनके मुताबिक अब अमेरिका को इस बेतुके अंतहीन युद्ध से बाहर निकलने की जरूरत है.

डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के अगले ही दिन अमेरिका सेनाओं ने यह क्षेत्र खाली कर दिया और इसके तुरंत बाद ही तुर्की ने सीरियाई कुर्दों पर धावा बोल दिया. खबरों के मुताबिक अब तक तुर्की की सेना ने सीरिया की उत्तरी सीमा के नजदीक कुर्दों के नेतृत्व वाले सीरियन डेमोक्रेटिक गठबंधन (एसडीएफ) के एक हजार से ज्यादा लड़ाकों को मार चुकी है. कई देशों द्वारा सैन्य कार्रवाई रोकने की मांग को तुर्की ने सिरे से खारिज कर दिया. तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने कहा, ‘ये कोई मायने नहीं रखता कि लोग क्या कह रहे हैं, अब किसी कीमत पर हम नहीं रुकेंगे.’

तुर्की को सीरियाई कुर्दों से क्या परेशानी है?

तुर्की और कुर्दों की दुश्मनी काफी पुरानी है. तुर्की कुर्दों को आतंकवादी मानता है. उसका कहना है कि सीरिया में आईएस से लड़ रहे एसडीएफ गठबंधन में शामिल सशस्त्र कुर्दिश पीपल्स प्रोटेक्शन यूनिट (वाईपीजी) एक आतंकी संगठन है, जो तुर्की स्थित कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) का अहम सहयोगी है. पीकेके ने 1984 में तुर्की सरकार के खिलाफ बगावत की थी और कुर्दों को अधिकार दिलाने के लिए उससे लड़ाई लड़ी थी जिसमें काफी खून-खराबा हुआ था. पीकेके अभी भी आए दिन तुर्की में हमलों को अंजाम देता है.

बीते कुछ सालों में तुर्की की कुर्दों को लेकर चिंता और बढ़ गयी है. दरअसल, सीरियाई गृह युद्ध के दौरान आईएस से लड़ते हुए कुर्दों ने उत्तरी सीरिया में एक स्वायत्त क्षेत्र की स्थापना की है. इस क्षेत्र में करीब दस लाख कुर्दों के अलावा 15 लाख स्थानीय लोग और करीब दस हजार ईसाई रहते हैं. आईएस के खिलाफ जिस तरह कुर्दों ने लड़ाई लड़ी है, उससे सीरिया में उनका सैन्य और राजनीतिक वर्चस्व काफी तेजी से बढ़ा है. ग्यारह हजार से ज्यादा कुर्द लड़ाकों ने इस जंग में अपनी जान गंवाई है. सीरियाई मामलों के जानकारों के मुताबिक तुर्की को पता है कि गृह युद्ध की समाप्ति के बाद सीरिया में जब राजनीतिक हल निकलेगा तब वहां कुर्दों की स्थिति काफी मजबूत होगी. कुर्द न केवल सीरिया की सरकार में अहम भूमिका निभाएंगे बल्कि कुछ राज्यों में भी उनका दबदबा होगा. फिर तुर्की की सीमा के करीब उत्तरी सीरिया में कुर्दों द्वारा स्थापित किए गए क्षेत्र को भी आधिकारिक मान्यता मिलेगी.

तुर्की की चिंता यह है कि इस सब के बाद तुर्की के आसपास कुर्द मजबूत स्थिति में पहुंच जाएंगे. इससे तुर्की में सरकार के खिलाफ लड़ रहे कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) जैसे कुर्द संगठनों के हौसले बुलंद होंगे. इन्हें सीरियाई कुर्दों से पूरी मदद मिलेगी और फिर वे तुर्की की सरकार के खिलाफ अपनी लड़ाई और तेज कर देंगे.

राजनीतिक वर्चस्व कायम रखने की कोशिश

विदेश मामलों के कुछ जानकार इस समय तुर्की द्वारा कुर्दों को ‘जल्द से जल्द’ अपनी सीमा के करीब से हटाने के पीछे एक और वजह भी बताते हैं. यह वजह इस साल तुर्की में हुए स्थानीय निकाय चुनाव से जुड़ी है. इस चुनाव में राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन की पार्टी को अंकारा और इस्तांबुल जैसे देश के सबसे बड़े शहरों में हार का मुंह देखना पड़ा. यह कोई कम हैरान करने वाली घटना नहीं थी क्योंकि बीते 25 सालों में ऐसा पहली बार हुआ जब देश की सत्ताधारी पार्टी इन शहरों में ये चुनाव हार गयी.

राजधानी अंकारा और इस्तांबुल के स्थानीय चुनाव में मिली हार, राष्ट्रपति एर्दोआन के लिए इसलिए भी बड़े झटके जैसे थी क्योंकि इस चुनाव में उसी जनता ने उन्हें वोट नहीं दिया था, जो दो साल पहले ही तख्तापलट की कोशिश करने वाली देश की सेना के सामने खड़ी हो गई थी. तुर्की में कहा जाता है कि देश की सत्ता की राह इस्तांबुल और अंकारा के मेयर के चुनाव से होकर जाती है. एर्दोआन खुद इस्तांबुल के मेयर रह चुके हैं. उन्होंने कभी यह भी कहा था, ‘जिस दिन मेरी पार्टी इस्तांबुल हार गई, उस दिन हम तुर्की को भी खो देंगे और यह मेरे अंत की शुरुआत होगी.’

इन चुनावों की गंभीरता को समझते हुए और अपनी साख बचाने के लिए ही एर्दोआन ने विपक्ष पर मेयर चुनाव में धांधली करने का आरोप लगाया और इस्तांबुल में दोबारा मेयर का चुनाव करवाया. लेकिन, दोबारा हुए चुनाव में विपक्षी पार्टी का उम्मीदवार पहले से भी ज्यादा वोटों (सात लाख से भी ज्यादा वोटों) से विजयी रहा.

जानकारों की मानें तो दुनियाभर के मुसलमानों के खलीफा बनने का ख्वाब पाले एर्दोआन को इन दो करारी चुनावी हारों से समझ में आ गया कि उन्हें इस समय खुद के देश में ही अपनी जमीन बचाने की जरूरत है. इन शहरों में सत्ताधारी पार्टी की हार की दो बड़ी वजहें निकल कर सामने आईं. पहली वजह देश के कमजोर आर्थिक हालात और दूसरी सीरिया से आये 35 लाख से ज्यादा शरणार्थी. तुर्की के अधिकांश लोग अपने देश में शरणार्थियों की बड़ी संख्या से खासा परेशान हैं.

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने इसके बाद शरणार्थी संकट से निकलने के लिए अमेरिका पर एक समझौता करने का दबाब बनाया. उन्होंने अमेरिका से कहा कि तुर्की उत्तरी सीरिया में अपनी सीमा के नजदीक एक ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ का निर्माण करना चाहता है और इस काम में अमेरिका को उसकी मदद करनी पड़ेगी. इस बफर क्षेत्र में तुर्की अपने यहां रह रहे लाखों सीरियाई शरणार्थियों के रहने की व्यवस्था करेगा. एर्दोआन की यह योजना एक तीर से दो निशाने साधने जैसी थी. एक तो इससे वे सीरियाई शरणार्थियों को वापस उनके देश भेज देते, दूसरा अपनी सीमा के करीब सीरिया में अपने नियंत्रण वाला कई किलोमीटर का एक क्षेत्र बन जाने से सीरियाई कुर्द भी तुर्की की सीमा से दूर हो जाते.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन | एएफपी (फाइल फोटो)

तुर्की ने अमेरिका से कहा कि या तो वह इस समझौते पर तैयार हो या फिर सीरिया में कुर्दों का साथ छोड़े जिससे कि वह इस क्षेत्र के निर्माण के लिए उत्तरी सीरिया से कुर्दों को हटा सके. सीरियाई कुर्दों को तुर्की के हमले से बचाने के लिए बीते अगस्त में अमेरिका इस समझौते पर तैयार हो गया. लेकिन, इस समझौते में दो बातें ऐसी हैं जिन पर सहमति नहीं बन पा रही है. तुर्की अपनी सीमा से सटाकर 480 किमी लंबे और सीरिया के अंदर 30 किमी तक चौड़े बफर क्षेत्र के निर्माण की बात कह रहा है. साथ ही वह इस क्षेत्र का नियंत्रण लंबे समय तक अपने हाथ में चाहता है. लेकिन, सीरियाई सरकार और कुर्दों के भारी विरोध के चलते इन दो बातों पर अमेरिका और तुर्की के बीच अभी तक कोई सहमति नहीं बन सकी है.

तुर्की लगातार अमेरिका पर समझौते पर तैयार होने या फिर सीरिया से सेना वापस बुलाने का दबाव बना रहा था. माना जा रहा है कि बीते हफ्ते उसका यह दबाब काम कर गया, जब एर्दोआन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बात की. इस बातचीत के बाद ही ट्रंप ने सभी को चौंकाते हुए सीरिया से अमेरिकी सेना की वापसी का आदेश दे दिया. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तुर्की के राष्ट्रपति ने डोनाल्ड ट्रंप से कहा कि तुर्की सीरियाई कुर्दों को उस हिस्से से सैन्य कार्रवाई के जरिये हटाने जा रहा है, जहां वह ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ का निर्माण करेगा. इस बातचीत की जानकारी देते हुए व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता ने भी कहा कि तुर्की जल्द ही सीरिया में लंबे समय से नियोजित अपने सैन्य अभियान को शुरू करेगा. प्रवक्ता के मुताबिक वह उत्तरी सीरिया में ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ का निर्माण करने के लिए यह कदम उठाएगा और अमेरिकी सेना इस मसले से दूर रहेगी.

व्हाइट हाउस के प्रवक्ता का यह भी कहना था कि अगले महीने तुर्की के राष्ट्रपति अमेरिका आएंगे. इस दौरान वे अमेरिकी राष्ट्रपति से कई व्यापारिक और सैन्य समझौतों पर बातचीत के अलावा ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र निर्माण’ को लेकर रुकी हुई बातचीत पर भी चर्चा करेंगे.