मूलरूप से सामाजिक कार्यकर्ता मृणाल गोरे को देश की उन गिनी-चुनी महिलाओं में शुमार किया जाता है जिन्होंने जमीनी स्तर की राजनीति करते हुए राष्ट्रीय स्तर तक एक बड़ी पहचान बनाई. वे 1961 में अचानक सुर्खियों में आई थीं. वामपंथी झुकाव वाली मृणाल गोरे इस साल गोरेगांव से मुंबई महानगर पालिका की सदस्य चुनी गई थीं. उस समय तक गोरेगांव शहर के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता था जहां पानी का संकट बारहों महीने बना रहता था. गोरे इसी मुद्दे पर चुनाव जीतीं और इसके बाद उन्होंने इसके लिए आंदोलन छेड़ दिया.

देखते ही देखते गोरेगांव के हजारों लोग उनके इस आंदोलन में जुड़ गए. मुंबई में यह इतना बड़ा मुद्दा बन गया कि वहां की महानगरपालिका को तुरंत ही इस पर ध्यान देना पड़ा. इसके बाद सालों से चली आ रही इस इलाके की पानी की समस्या कुछ महीनों में ही दूर हो गई. इस आंदोलन ने गोरे को पूरे महाराष्ट्र में चर्चित तो किया ही, लोग उन्हें सम्मान देते हुए ‘पानी वाली बाई’ भी कहने लगे. उस दौर में महिला अधिकारों व श्रमिक कल्याण जैसे मसलों पर काम करते हुए वे मुंबई की सबसे लोकप्रिय नेता बन गईं.

1972 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की टिकट पर वे महाराष्ट्र विधानसभा की सदस्य भी चुन ली गईं. इस समय महंगाई बड़ी तेजी से बढ़ रही थी. गोरे ने जमीनी राजनीति की थी और वे जानती थीं कि इसका गरीब व मध्यम वर्ग के परिवारों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए उन्होंने महंगाई प्रतिकार महिला समिति का गठन किया और बढ़ती महंगाई रोक पाने में सरकार की विफलता पर जगह-जगह विरोध प्रदर्शन करने लगीं. उनके विरोध प्रदर्शन की खास बात थी कि इसमें सिर्फ महिलाएं ही शामिल होती थीं. सड़कों पर मार्च निकालकर ये महिलाएं किसी भी समय मुख्यमंत्री या मंत्रियों का घेराव कर देती थीं. कहा जाता है कि आजादी के बाद शायद इसी समय एक साथ इतनी सारी महिलाएं किसी एक मुद्दे पर आंदोलन के लिए इकट्ठी हुई थीं. पहली बार जुलूसों में थाली पर बेलन पीटकर नारे लगाने का चलन भी इसी आंदोलन से शुरू हुआ.

इंदिरा गांधी की धुर विरोधी गोरे ने 1977 में उत्तर मुंबई से लोकसभा चुनाव भी लड़ा था. इस चुनाव को भारी मतों से जीतने वाली गोरे के पक्ष में तब बहुत ही दिलचस्प नारा लगाया जाता था – पानी वाली बाई जाए दिल्ली में, दिल्ली वाली बाई (इंदिरा गांधी) जाए पानी में. इस समय तक मृणाल गोरे राष्ट्रीय स्तर पर एक जाना-माना नाम बन गई थीं. हालांकि बाद के सालों में मुंबई में शिवसेना के उदय और वामपंथी संगठनों के कमजोर पड़ने के साथ ही गोरे के आंदोलनों में लोगों की सक्रिय भागीदारी कम होने लगी. लेकिन इसके बाद भी वे हमेशा नर्मदा बचाओ जैसे जनांदोलनों में शामिल होती रहीं और आखिरी समय (मृणाल गोरे का निधन जुलाई 2012 में हुआ) तक इन्हें समर्थन देती रहीं.