इस विषय पर कुछ युवा अलंकर्ताओं के बीच बोलने का सुयोग भोपाल में हुआ. कला में होने के दो अर्थ तो स्पष्ट हैं. कलाकार होना और कला का रसिक होना. कोई भी कलाकार कला में अपने आत्म की अभिव्यक्ति चाहे-अनचाहे करता ही है पर आत्मविस्तार भी करता है. संसार में जो लगभग अनिवार्य जैविक और अन्य क़िस्म के दूसरेपन हैं, कला उन्हें अतिक्रमित करती है अगर वह ईमानदार हो. कलाकार दूसरे को आत्मसात करता है, कई बार दूसरा हो जाता है और यही वह पहलू है जो निजी से निजी कला को सामाजिक बनाता है, भले अपने लक्ष्य में नहीं, अपने आशय में. कला सच्चाई का इज़हार तो है ही वह उसमें कुछ जोड़ती भी है- वह सच्चाई का इज़ाफ़ा है. जिसे हम आम तौर पर सच्चाई के नाम से समझते-पहचानते हैं उसमें बहुत कुछ साहित्य और कलाओं द्वारा रची सच्चाई भी शामिल हैं.

पवित्र ग्रंथ, महाकाव्य, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर प्रार्थनाएं आदि कलाकारों द्वार रची गयी चीज़ें हैं जिनके बिना हम सच्चाई के बारे में सोच भी नहीं सकते. कला आपको अधिक देखने, अधिक सुनने, अधिक महसूस करने, दूसरों के प्रति अधिक सजग होने सबक बिना आप पर कोई बोझ डाले सहज भाव से सिखाती है. आप संसार में अपने होने को भी कलाओं की मदद से बेहतर समझ पाते हैं. संसार निरी मूर्त चीज़ों से नहीं बना है. उसमें बहुत सारा ऐसा है जो अमूर्त है. आखि़र विचार, अवधारणाएं, भावनाएं आदि अमूर्तन के ही संस्करण हैं. जैसे संसार किसी के बारे में नहीं है, जैसे हम किसी के बारे में नहीं हैं वैसे ही कलाएं किसी के बारे में अनिवार्यतः नहीं होतीं. वे अपने आप में होती हैं और इसे सच्चा रसिक पहचान पाता है. जैसे हम हम हैं, वैसे ही कला कला है. वह संसार का सत्यापन है.

कला और विचार का संबंध हमेशा ही जटिल रहा है. कला में विचार की भूमिका होती है पर वह ज़रूरी तौर पर अन्यत्र विकसित नहीं होता, न ही कला किसी विचार का सर्जनात्मक संस्करण होती है. कला-विचार भी होता है- कला अपनी शर्तों पर, अपनी सीमाओं में, अनुभव-भाव-वस्तुजगत् आदि के रसायन से सोचती है. इसे अनदेखा करना कला की वैचारिक सत्ता को मानने से इनकार करना है.

कला हमेशा आपको प्रसन्न-विभोर-आह्लाहिदत करे यह ज़रूरी नहीं है. वह आपको बेचैन, नाराज़, उदास, प्रश्नांकित आदि भी कर सकती है. आजकल प्रायः करती ही है. प्रश्नों के घमासान से आपको विरत कर जो बने-बनाये पर अपर्याप्त उत्तरों का स्वर्ग हमें इन दिनों बहुत रिझाने लगा है इसके बरक़्स कला आपको फिर प्रश्नों की रणभूमि में ले जाती है. वह कोई सरल उत्तर नहीं देती पर आपको निहत्था भी नहीं छोड़ती. कला दी हुई सच्चाई से कभी सन्तुष्ट नहीं होती. वह वैकल्पिक सचाई का निरूपण करती है.

आजकल एक तरह की झटपटिया मानसिकता और व्यवहार बहुत फैल गये हैं. कला जैसे झटपटियापन के बरक़्स धीरज-समझ-जतन-संवेदना की मांग करती है. उसका सच पूरी तरह से कला-रचित सच नहीं होता. वह साझा सच है और वह तभी पूरा होता है जब रसिक कुछ सपना सच उसमें मिलाता है. यही वजह है कि एक ही कलाकृति के लिए कई अलग-अलग अर्थ और आशय हो सकते हैं और उनमें से प्रायः हरेक वैध होता है.

हमारे आस-पास चीजों का एक भरापूरा संसार है जिसके बिना हम रह नहीं सकते लेकिन जिसके अधिकांश पर हम उसके उपयोग के अलावा किसी और काम के लिए ध्यान नहीं देते. जिन चीज़ों को हम निष्प्राण, नीरस आदि मानते हैं वे किसी कविता या उपन्यास या कलाकृति में आकर जीवंत और सप्राण हो उठती हैं. कला हमारे रोज़मर्रापन में आभा भर देती हैं और कई बार इस तरह हमारा जीना अधिक जीवंत और संवेदनशील हो जाता है. कला की सुन्दरता रूप या अरूप या विरूप किसी से या इनके किसी तालमेल से उभर सकती है. कला संसार को हमारे लिए अधिक सच, अधिक सुन्दर, अधिक सप्राण बनाती है. अंधेरे समय में कला रोशनी होती है और बेहद चकाचौंध समय में अंधेरे की शिनाख़्त.

अपराजेयता

हम थक सकते हैं पर हार नहीं सकते. हमें नष्ट किया जा सकता है पर हराया नहीं जा सकता. ऐसे कई वक्तव्य दिमाग़ में गूंजते हैं जब हम गांधी जी के बारे में सोचते हैं. सही है कि इस समय का भारत अपनी हत्यारी राजनीति और याराना पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में, अपने धार्मिक उन्माद और बहुसंख्यक हेकड़ी में, अपनी अशिष्ट और घमण्डी भाषा में गांधी से जितना दूर हो सकता था उतना हो गया है और गांधी-दृष्टि, शैली और विचार, कर्म आदि सब बेहद अप्रासंगिक लग सकते हैं.

पर दूसरी ओर यह भी सही है कि हम अपनी परंपरा और संस्कृति, अपनी आधुनिकता और गतिशीलता पर, अपने लोकतंत्र और स्वतंत्रता पर, अपने धर्मों और सर्जनात्मकता पर अगर ज़रा भी गंभीरता से विचार करने की कोशिश करें तो गांधी से बचकर निकलना असंभव है. ऐसा समय है जो बहुत तेज़, अधीर और लगभग पागल है. उसमें गांधी अड़ंगा हैं. उनकी ठोकर लगती है और हमारी रफ़्तार कुछ धीमी, कुछ धीर, कुछ विवेकवान हो जाती है. जब अंधेरा इस क़दर गाढ़ा हो रहा है कि हमारी चकाचौंध की भूलभुलैया के बावजूद, तो गांधी एक निष्कम्प दीपशिखा की तरह हमारे हाथ में होते हैं. उसकी रोशनी में हम चोरों, हत्यारों, ब्लात्कारियों आदि को पहचान सकते हैं. हम गांधी की रोशनी में शिनाख़्त कर सकते हैं कि हमारे साथ कौन और क्या छल-कपट कर- हो रहा है. पर उसके बाद प्रतिरोध हमारी कर्मशीलता पर निर्भर करता है.

गांधी एक लाठी तो हैं जिसके सहारे हम चल सकते हैं पर चलना तो हमें ही होगा. गांधी रोशनी, रास्ता और पहचान सब दिखा सकते हैं पर वे हमारे अकर्म या कर्महीनता का औचित्य नहीं दे सकते हैं, न ही उसका स्थानापन्न हो सकते हैं. सब कुछ सब समय काम में नहीं आता. पर गांधी इसका अपवाद हैं- एक बेहद उजला, ज्वलन्त, अदम्य अपवाद. वे हर समय हमारे काम आ सकते हैं, अगर हमें पता हो कि हमारी किसी समय दरकार या स्थिति या द्वन्द्व या दृष्टि क्या-कहां है, कहां अटकी या उलझी हैंं.

गांधी हमेशा एक विकल्प का नाम रहते हैं. सच में बिंधे सपने का. असम्भव की सम्भावना का. दिये हुए से अलग कल्पना की उड़ान का. विचार और कर्म की समरसता का. एक ऐसे समय में जब सब निकष झूठे पड़ गये हैं, एक सच्चे निकष का. अमां निशा में अन्तःकरण की ज्वाला का. जब सब कुछ हारा हुआ लग रहा हो तो अपराजेयता का.

गांधी कर्म और विचार मिलकर हमारे समय की अलिखित गीता है. आज जब हम फिर एक महाभारत में लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ फंसे हैं और हमारे चारों ओर हत्या-अनाचार-अन्याय छाया हुआ है, गांधी किसी दिव्य पुरुष का उपदेश नहीं, मनुष्य का आत्मोपदेश हैं. हाल ही में चित्रकार गुलाम मोहम्मद शेख़ ने गांधी अभिप्रायों के अपने चित्रात्मक उपयोग पर बात करते हुए कहा था कि गांधी को अनुष्ठानों, जयन्तियों, मार्गों के नामों, तमाशों, नोटों पर छपी छबियों से मुक्त करना ज़रूरी था और तब उन्होंने गांधी और कबीर को एक साथ चित्रित किया. कबीर अपने समय के जुलाहे थे और गांधी अपने चरखे के साथ हमारे समय के. दोनों ने सूत काता पर अपने प्रतिरोध, संकल्प और संघर्ष से जो धागे काते उन्होंने एक नयी क्रान्तिकारी एक सूत्रता भारतीय समाज में प्रतिपादित की.

गांधी की चादर बहुत मैली कर दी गयी है. उसपर और उन पर रोज़ कीचड़ फेंका जा रहा है. पर वह फटी या जीर्णशीर्ण नहीं हुई है. स्वयं गांधी अपनी चादर अब लपेटे शायद नहीं है. उनकी चादर अब कोई भी लपेट कर इस समय प्रतिरोध कर सकता है. वह चादर अब सबकी है. जैसे सच अधिकतर ओझल रहता है पर हम उसे महसूस करते हैं, वैसे ही जब हम आज किसी या कुछ को बचाने के लिए कोई ईमानदार कोशिश करते हैं तो हमें लगता है कि हम वही चादर ओढ़े हैं. उसकी खादी ऐसी है कि उस पर हिंसा-हत्या-अन्याय के छींटे तक नहीं पड़ते या ठहरते.

गांधी अब संज्ञा नहीं रूपक हैं. पर ऐसा रूपक जो शायद संज्ञा से अधिक उपस्थित है. या कम से कम हो सकता है. हमारे आस-पास इसी विद्रूपित हो रहे भारतीय समाज में शिक्षा, लोक स्वास्थ्य, जन कल्याण, पर्यावरण, स्वालम्बन, सद्भाव, सृजन, विचार आदि अनेक क्षेत्रों में ऐसे लोग हैं और समूह भी जिनमें गांधी-तत्व अब भी सक्रिय-सप्राण हैं. राजनीति और धर्म उन्हें हिसाब में नहीं लेते और मीडिया उनकी खबर हम तक नहीं पहुंचाता. ऐसे भी ज़रूर होंगे जो हमारे समय के लिए सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, अहिंसा आदि का पुनराविष्कार कर और उन्हें बरत-आज़मा रहे होंगे. वे जीतने के अभियान में शामिल नहीं हैं पर उन्हें हराया भी नहीं जा सकता. हटाया भी नहीं. वे ही हमारे लिए उम्मीद का नया स्थापत्य गढ़-रच रहे हैं.

जो ‘पीर परायी’ जानता है, जो दूसरों की बात सुनता-गुनता है, जो दूसरों के लिए कुछ करता है और निरा आत्मलिप्त या आत्मरत नहीं है, जो अत्याचार और अन्याय को किसी तरह का सीधा या उलटा समर्थन नहीं देता, जिसमें साहस और अन्तःकरण बचे हुए हैं, उसमें कुछ न कुछ गांधी-तत्व सक्रिय है.