पांच अगस्त को अनुछेद-370 - जो जम्मू कश्मीर को भारत के संविधान में एक विशेष स्थिति दिया करता था - हटाने से पहले सरकार ने कश्मीर घाटी में दर्जनों आदेश जारी किए थे. इनमें अमरनाथ यात्रा का स्थगित कर देना और कश्मीर से बाहर के लोगों को यहां से जाने को कहना अभूतपूर्व थे.
ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ था. न ही 90 के हिंसक दशक में और न ही 2008, 2010 या 2016 के खराब हालात में.
इन आदेशों ने कश्मीर घाटी में एक भय का माहौल पैदा कर दिया था और इसी माहौल में यहां से बाहर के लाखों लोग यहां से अपने-अपने घरों को लौट गए. इनमें 10 लाख से अधिक ऐसे लोग थे जो देश के अलग-अलग हिस्सों से, रोज़ी-रोटी कमाने हर साल कश्मीर आते हैं.
जो लोग जाने से हिचकिचा भी रहे थे, पुलिस और स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें रुकने के लिए निरुत्साहित किया. अब जबकि डर का माहौल खतम हो गया है और धीरे-धीरे कश्मीर में लोग अपने काम-काज की तरफ भी ध्यान देने लग रहे हैं तो इन्हें देश के अन्य भागों से आए लोगों की कमी काफी खल रही है.
“ज़ाहिर है खलेगी ही कमी. हां, ये लोग अपनी रोज़ी-रोटी कमाने आते थे लेकिन काम तो हमारा करते थे न. इनके जाने से हर तरह का काम मानो ठप्प हो गया है,” पुलवामा में एक हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले, मुहम्मद अलताफ़ वानी, सत्याग्रह को बताते हैं.
90 के दशक के दूसरे हिस्से में उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, राजस्थान, असम और देश के कई अन्य राज्यों से लोग काम की तलाश में कश्मीर आने लगे थे. कश्मीर के लोगों ने भी काम करने की लगन और योग्यता देखकर पूरे दिल से इन लोगों का स्वागत किया था. अगले कई सालों में आने वाले कर्मचारियों की संख्या बढ़ती चली गयी और हर क्षेत्र में काम करके ये लोग यहां से अपने घरों को अच्छा पैसा भेजने लगे.
यहां तक कि कुछ काम ऐसे हैं जिनसे स्थानीय लोगों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं और ज़्यादातर बाहर के लोग ही कश्मीर में इन कामों को करते हैं. मिसाल के तौर पर, अब कश्मीर में नाई का काम लगभग पूरी तरह से उत्तर प्रदेश के बिजनौर से आए लोगों ने संभाल लिया है. हर शहर, हर गांव में ये लोग सालों से अपनी दुकानें चलाते आ रहे हैं.
“चूंकि ये लोग अच्छा काम करते थे इसलिए बावजूद इसके कि ये लोग बाहर के थे, कश्मीर में लोगों ने इन्हे ही अपना लिया था. कश्मीर के नाई या तो अब दुकानों में बैठे रहते थे या फिर उन्होने अपना काम बदल लिया था” अनंतनाग के रहने वाले शफाअत हुसैन बताते हैं. शफाअत ने अपनी एक दुकान बिजनौर के एक नाई को किराये पर दे रखी थी जिससे उसे किराये के रूप में अच्छा खासा पैसा मिल जाता था.
ऐसे ही कश्मीर के कारखानों और ईंट भट्टों में भी सिर्फ बाहर के मजदूर ही काम करते दिखाई देते थे. पुलवामा जिले के पंपोर में रहने वाले यूनिस मीर सत्याग्रह को बताते हैं कि उनकी प्लास्टर ऑफ पेरिस बनाने वाली फैक्ट्री में 50 से ज़्यादा लोग काम करते थे और सबके सब बिहार के थे.
“यहां के लोग ये काम कर ही नहीं पाते. और ऐसा सिर्फ मेरे काम में नहीं हैं, खनमोह (जहां यूनिस की फैक्ट्री है) में और 100 से ज़्यादा फैक्ट्रियां हैं और सभी में सिर्फ बाहर के कर्मचारी ही काम करते हैं” यूनिस बताते हैं.
दूसरों राज्यों से आने वाले ये लोग अब कश्मीर के किसानों के काम भी आने लगे थे. बिहार से आए कई लोग सेब के बागों में या फसल की कटाई में भी अच्छा पैसा कमाने लगे थे. और घरों को बनाने या उनकी मरम्मत का काम भी पूरी तरह से इन्ही लोगों पर निर्भर हो गया था.
और फिर सरकार के चल रहे कामों में भी यही लोग सबसे ज़्यादा संख्या में काम कर रहे थे.
अब जबकि ये 10 लाख से ज़्यादा लोग कश्मीर से फिलहाल चले गए हैं, यहां हर क्षेत्र में लोगों को तमाम दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं. “मेरे सारे 50 कर्मचारी, और उनका ठेकेदार, 5 अगस्त की रात को ही यहां से चले गए थे. अब अगर में किसी तरह फकटरी पहुंच भी जाऊं तो वहां कोई काम नहीं होता” यूनिस मीर कहते हैं कि उनकी फैक्ट्री का काम पिछले दो महीनों से बिलकुल ठप्प पड़ा हुआ है.
यूनिस कहते हैं कि काम न हो पाने की परेशानी अलग है और कर्मचारियों के लिए जो पैसा दे रखा था वह जाता हुआ देखने का दुख अलग. “मेंने इनके ठेकेदार को पांच लाख का एडवांस दे रखा था और अब फोन न चलने के कारण उनसे कोई संपर्क नहीं है. पता नहीं ये लोग अब आएंगे भी या नहीं.”
उधर जिन लोगों के घर बन रहे थे या उनके घरों की मरम्मत हो रही थी, वे लोग भी कम परेशान नहीं हैं. अनंतनाग जिले के अरविनी गांव में रहने वाले, मुहम्मद इकबाल इसी तरह के लोगों में से एक हैं.
इकबाल के घर का काम पिछले दो सालों से बिहार और पंजाब से आए कर्मचारी कर रहे थे और उन्हे इस साल गृह प्रवेश की पूरी उम्मीद थी. “लेकिन अब लग रहा है अगले साल भी नहीं हो पाएगा गृह प्रवेश. मेरे यहां करीब 15 लोग काम कर रहे थे और अब उनमें से एक भी यहां नहीं है.”
ऐसे ही परेशान इस समय सेब के बाग वाले और अन्य किसान हैं, जिनकी फसलें तयार हैं और काम करने वाले लोग बहुत कम.
“हमारे बगीचों में बाहर के लोग सेबों को उतारने से लेके उनको डब्बों में भरने तक का काम पिछले कई सालों से करते आ रहे हैं. पहले से परेशानियां कम नहीं थीं और अब ये नई मुसीबत” शोपियां ज़िले के एक सेब बगीचे के मालिक, सुल्तान अहमद डार, सत्याग्रह को बताते हैं.
सेब के व्यापारियों और किसानों की मुश्किलें पहले ही कम नहीं थीं और अब फसल तैयार होने पर बाहर के कर्मचारियों का यहां न होना एक और मुसीबत के रूप में उभरकर आ रहा है.
कश्मीर में ढेरों लोग ऐसे भी हैं जिनको अपना काम ठप्प हो जाने के साथ-साथ इस बात की भी परेशानी है कि उनके पास इन बाहर से आए कर्मचारियों का पैसा पड़ा हुआ है. “ये लोग मुझसे बिना मिले चले गए थे, शायद डर के मारे. और अब मुझे रात-रात भर नींद नहीं आती, यह सोच के कि उनके पैसे मेरे पास हैं. मेरे घर में लैंड्लाइन फोन चल रहा है लेकिन न उनके पास वो नंबर है और न मेरे पास उनका नंबर” अरविनी के मुहम्मद इकबाल कहते हैं.
वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास ये कर्मचारी अपना पैसा जमा करते थे और घर जाने से पहले ले लेते थे. “लेकिन इस बार काफी लोग मुझसे अपने पैसे लिए बिना ही घरों को चले गए. मुझे ऐसा लग रहा है, मेरे पास सांप पड़े हुए हैं” श्रीनगर के रामबाग में रह रहे, मुहम्मद यूसुफ, सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं . यूसुफ उम्मीद करते हैं कि ये लोग जल्दी ही आयेंगे और उनके पास पड़ा अपना पैसा ले जाएंगे.
लेकिन हर चीज़ के कई पहलू होते हैं. जहां ये दस लाख से अधिक कर्मचारी और उनसे जुड़े लाखों कश्मीरी लोग परेशान हैं, वहीं कश्मीर में कुछ लोगों के लिए दो महीनों से बनी यह स्थिति अवसरों के नए द्वार खोल रही है.
जैसे कि श्रीनगर के नौगम इलाक़े में रहने वाले 55 साल के, मुहम्मद अमीन हजाम. अमीन ने करीब 15 साल पहले, काम न होने के चलते, हालात से मसझौता कर लिया था और नाई का काम छोड़कर ऑटो-रिक्शा ले लिया था. इस समय खराब हालात के चलते उनका ऑटो-रिक्शा तो ठप्प है लेकिन उन्होने अपने घर में ही एक कुर्सी लगाकर फिर से लोगों के बाल काटने शुरू कर दिये है. अमीन कहते हैं कि जब बाहर के नाई यहां से चले गए तो करीब पांच दिन बाद कुछ मोहल्ले के लड़के उनके पास आए और उनसे बाल काटने को कहा.
“मेरे पास उस समय जरूरी सामान भी नहीं था. जैसे-तैसे मैंने उसका इंतजाम किया और अब अपने घर पर ही लोगों की हजामत बना रहा हूं. अगर मैं ऐसा नहीं करता के चलते मेरे घर में फाके की हालत हो जाती शायद” अमीन सत्याग्रह को बताते हैं.
अमीन के जैसे ही सैंकड़ों और लोग जिनमें मजदूर, बढ़ई, नाई और राजमिस्त्री जैसे लोग शामिल हैं इस समय इस अवसर का फाइदा उठाकर ठीक-ठाक कमाई कर रहे हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि काम बहुत ज़्यादा है और लोग बहुत कम. ऐसे में सब यही उम्मीद कर रहे हैं कि बाहर के जो लोग चले गए हैं जल्द से जल्द वापिस आ जाएं.
कुछ लोग आ भी रहे हैं. सत्याग्रह ने वापस आए कुछ लोगों से बात की जो कहते हैं कि उनके लिए आगे कुआं है और पीछे खाई.
“मुझे बिहार में कहीं काम नहीं मिल रहा और यहां में काम छोड़कर गया था. हालत यह हो गयी थी कि घर में खाना तक नहीं था. ऐसे में अगर यहां खतरा भले हो लेकिन काम तो मिल रहा है. मरना होगा तो मर जाएंगे, उसको कौन रोक सकता है” बिहार के सिवान जिले के मिस्त्री, राकेश कुमार, अनंतनाग के बिजबेहरा इलाक़े में बात करते हुए कहते हैं.
राकेश की ही तरह बिहार से आए कई मजदूरों से सत्याग्रह ने पुलवामा जिले के त्राल इलाक़े में बात की. वे कहते हैं कि उन्हें कश्मीर में कभी कोई खतरा महसूस नहीं हुआ है और अभी भी लोगों ने उनका स्वागत ही किया है.
“त्राल मिलिटेंसी के लिए जाना जाता है और बाहर के लोग ये सोचते हैं कि यहां रहने में खतरा है. मैं पिछले 10 सालों से यहां आ रहा हूं, मुझे तो किसी ने कभी कुछ नहीं कहा,” बिहार के चंपारण के रहने वाले बढ़ई, नंद किशोर, सत्याग्रह को बताते हैं.
हालांकि अब चीज़ें शायद वैसी न रहें जैसी पहले थीं. अनुच्छेद 370 हट जाने के बाद से कश्मीर के लोगों को यह खतरा महसूस हो रहा है कि कहीं बाहर से आकर लोग यहां न बस जाएं और फिर आने वाले समय में कश्मीरी ही यहां अल्पसंख्यक बनकर न रह जाएं.
ऐसे हालात में हाल ही में कुछ घटनाएं सामने आयीं हैं जहां सालों से कश्मीर आ रहे बाहर के लोगों को यहां से निकल जाने को कहा गया और धमकियां उनके आसपास के लोगों से ही आयीं थीं.
ऐसे में देखने योग्य यह होगा कि लोगों के काम, उनके कारोबार और उनकी रोज़ी रोटी-या यूं कह लें कि इंसान की जरूरतें आने वाले हालात तय करेगी या कश्मीर के लोगों की उनके भविष्य को लेके चिंताएं.
दोनों चीज़ें वज़न रखती हैं और अब देखना यह है कि पलड़ा किस तरफ भारी होगा.
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