अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई आज ही पूरी हो जाएगी. पीटीआई के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने आज कहा, ‘हम पांच बजे तक सुनवाई पूरी कर लेंगे. अब बहुत हो गया.’ माना जा रहा है कि 134 साल पुराने इस विवाद पर जस्टिस रंजन गोगोई रिटायर होने से पहले फैसला सुना देंगे. उनका रिटायरमेंट 17 नवंबर को है. पहले उन्होंने कहा था कि किसी भी हाल में इस मुद्दे पर सुनवाई 18 अक्टूबर तक पूरी हो जाएगी.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने छह अगस्त से इस पर सुनवाई शुरू की थी. यानी आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का 40वां दिन है. इससे पहले शीर्ष अदालत ने कोशिश की थी कि मामला बातचीत के जरिए सुलझा लिया जाए. इसके लिए उसने एक मध्यस्थता समिति भी बनाई थी. तीन सदस्यों की इस समिति की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एफएमआई कलीफुल्ला कर रहे थे. इसके बाकी दो सदस्य थे आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू. हालांकि जुलाई में इस समिति ने हाथ खड़े कर दिए थे. लेकिन इस मामले के एक पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड के अनुरोध पर बीते महीने बातचीत से मामला सुलझाने की कोशिश फिर शुरू हुई. आज ही इस समिति ने अपना एक ‘सेटलमेंट डॉक्यूमेंट’ सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है.

उधर, सूत्रों के हवाले से वरिष्ठ पत्रकार और द टाइम्स ऑफ इंडिया के एसोसिएट एडिटर धनंजय महापात्रा ने एक चौंकाने वाला दावा किया है. उनके मुताबिक दो पक्षकारों - राम जन्मस्थान न्यास और राम लला विराजमान ने बातचीत की इस पहल में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था, लेकिन दूसरे पक्षकारों या कहा जाए तो सुन्नी वक्फ बोर्ड में एक मोटी सहमति बन गई है कि विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को दे दी जाए. कानून संबंधी मामलों को नियमित रूप से कवर करने वाले धनंजय महापात्रा के लिए मुताबिक वक्फ बोर्ड की शर्त है कि मुसलमानों को एक नई मस्जिद बनाने के लिए पर्याप्त जमीन दी जाए और इसके निर्माण के लिए भी सरकार पैसा दे.

सूत्रों के मुताबिक मुस्लिम पक्षकारों की यह भी मांग है कि धार्मिक स्थल अधिनियम 1991 को लागू किया जाए. इसमें यह प्रावधान है कि दूसरे धार्मिक स्थलों पर 1947 वाली स्थिति कायम रहे.

संविधान पीठ अयोध्या में विवादित 2.77 एकड़ भूमि को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही है. 2010 में आए इस फैसले में हाई कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच जमीन को बराबर हिस्सों में बांटने को कहा था. लेकिन तीनों पक्ष इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे. कुल मिलाकर इस फैसले के खिलाफ 14 याचिकाएं दायर हुई थीं.