राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर उच्चतम न्यायालय ने शनिवार को अपना फैसला सुनाया. इस मामले का शुरू से आज तक का पूरा घटनाक्रम इस प्रकार है:

1528 : मुगल शासक बाबर के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया.

1885 : महंत रघुबीर दास ने फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दायर कर विवादित ढांचे के बाहर शामियाना तानने की अनुमति मांगी. अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी.

1949 : विवादित ढांचे के बाहर मध्य गुंबद के नीचे रामलला की मूर्ति स्थापित की गई.

1950 : रामलला की मूर्तियों की पूजा का अधिकार हासिल करने के लिए गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दायर की. इसी साल परमहंस रामचंद्र दास ने पूजा जारी रखने और मूर्तियां रखने के लिए याचिका दायर की.

1959 : निर्मोही अखाड़ा ने जमीन पर अधिकार दिए जाने के लिए याचिका दायर की.

1981 : उत्तर प्रदेश सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने स्थल पर अधिकार के लिए याचिका दायर की.

1986 : शाहबानो प्रकरण के बाद राजीव गांधी ने श्रद्धालुओं की पूजा के लिए स्थान खोलने का फैसला किया. इससे पहले तक वहां साल में एक बार ही पूजा की जाती थी.

14 अगस्त 1986 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित ढांचे के लिए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया.

छह दिसम्बर 1992 : बाबरी मस्जिद ढांचे को ढहाया गया.

तीन अप्रैल 1993 : विवादित स्थल में जमीन अधिग्रहण के लिए केंद्र ने ‘अयोध्या में निश्चित क्षेत्र अधिग्रहण कानून’ पारित किया. अधिनियम के विभिन्न पहलुओं को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कई रिट याचिकाएं दायर की गईं. इनमें इस्माइल फारूकी की याचिका भी शामिल थी. उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 139ए के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल कर इन सभी रिट याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर दिया.

24 अक्टूबर 1994 : उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक इस्माइल फारूकी मामले में कहा कि मस्जिद इस्लाम से जुड़ी हुई नहीं है.

अप्रैल 2002 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर सुनवाई शुरू हुई.

13 मार्च 2003 : उच्चतम न्यायालय ने असलम उर्फ भूरे मामले में कहा कि अधिग्रहीत स्थल पर किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि की अनुमति नहीं है.

30 सितम्बर 2010 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक के मुकाबले दो के मत से विवादास्पद जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाडा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया.

नौ मई 2011 : उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या जमीन विवाद में उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाई.

21 मार्च 2017 : मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने संबंधित पक्षों के बीच अदालत के बाहर समाधान का सुझाव दिया.

सात अगस्त 2017 : उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जिसने 1994 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की.

आठ अगस्त 2017 : उत्तरप्रदेश शिया केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनाई जा सकती है.

11 सितम्बर 2017 : उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि दस दिनों के अंदर दो अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करें जो विवादिस्त स्थल की यथास्थिति की निगरानी करें.

20 नवम्बर 2017 : यूपी शिया केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि मंदिर का निर्माण अयोध्या में किया जा सकता है और मस्जिद का लखनऊ में.

छह अप्रैल 2018 : उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर 1994 के फैसले की टिप्पणियों पर पुनर्विचार के मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजने का आग्रह किया गया.

छह जुलाई 2018 : उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि कुछ मुस्लिम समूह 1994 के फैसले की टिप्पणियों पर पुनर्विचार की मांग करने वाली सुनवाई में विलंब करना चाहते हैं.

29 अक्टूबर 2018 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई उचित पीठ के समक्ष जनवरी के पहले हफ्ते में तय की.

चार जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मालिकाना हक मामले में सुनवाई की तारीख तय करने के लिए उसके द्वारा गठित उपयुक्त पीठ दस जनवरी को फैसला सुनाएगी.

आठ जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन किया जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई कर रहे थे. इसमें न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति एन वी रमन्ना, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ शामिल थे.

दस जनवरी 2019 : न्यायमूर्ति यूयू ललित ने मामले से खुद को अलग किया जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई 29 जनवरी को नयी पीठ के समक्ष तय की.

25 जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का पुनर्गठन किया. नयी पीठ में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एसए नजीर शामिल थे.

29 जनवरी 2019 : केंद्र विवादित स्थल के आसपास की 67 एकड़ अधिग्रहीत जमीन मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति मांगते हुए उच्चतम न्यायालय पहुंचा.

26 फरवरी 2019 : उच्चतम न्यायलाय ने मध्यस्थता की वकालत की और यह तय करने के लिए पांच मार्च की तारीख तय की कि इस मामले को शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त मध्यस्थ के पास भेजा जाए या नहीं.

आठ मार्च 2019 : उच्चतम न्यायालय ने इस विवाद को शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश एफएमआई कल्लीफुल्ला की अगुवाई में एक समिति के पास मध्स्थता के लिए भेजा.

नौ अप्रैल 2019: निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या के विवादित स्थल के आसपास की अधिग्रहीत जमीन मालिकों को लौटाने की केंद्र की अर्जी का उच्चतम न्यायालय में विरोध किया.

नौ मई, 2019 : तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति ने उच्चतम न्यायालय में अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी.

10 मई 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता प्रक्रिया को पूरा करने की समय सीमा 15 अगस्त तक के लिए बढ़ायी.

एक अगस्त 2019 : मध्यस्थता की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को दी गई.

दो अगस्त 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता नाकाम होने पर छह अगस्त से रोजाना सुनवाई का फैसला किया.

छह अगस्त 2019 : उच्चतम न्यायालय में रोजाना सुनवाई शुरू हुई.

चार अक्टूबर 2019 : अदालत ने कहा कि 17 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी कर 17 नवंबर तक फैसला सुनाया जाएगा. साथ ही उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष को सुरक्षा देने के लिये भी कहा.

16 अक्टूबर 2019 : उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा.

09 नवंबर 2019 : उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या मामले में अपना फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर राम लला का अधिकार बताया. उसने कहा कि यह जमीन राम जन्मभूमि न्यास को दी जाए. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही किसी दूसरी जगह पर पांच एकड़ जमीन दी जाए.