मार्च 1970. मेवात (हरियाणा) के कद्दावर नेता मोहम्मद यासीन खान के इंतकाल के बाद उनके बेटे तैयब हुसैन की पगड़ी बंधाई की रस्म होनी थी. होने को यह एक सामान्य सी परंपरा थी जिसमें पिता के निधन के बाद उसके बेटे को परिवार का औपचारिक मुखिया घोषित किया जाता है. लेकिन हुसैन यहां एक बड़ा राजनैतिक दांव खेल गए. उन्होंने पगड़ी बांधने के लिए इलाके की सभी बिरादरियों के अगुवाओं को खास बुलावा भेजा. मरहूम यासीन खान से जुड़ाव के चलते अधिकतर ने इस न्यौते को स्वीकार किया और अपने-अपने समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हुए हुसैन को पगड़ी पहना दी.

यह घटना कुछ ऐसे प्रचारित हुई मानो छत्तीस समुदायों के मुखियाओं ने हुसैन को अपना रहनुमा स्वीकार कर लिया था. खाप और पंचायतों के प्रभाव वाले हरियाणा में किसी नेता के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. आगे चलकर चौधरी तैयब हुसैन देश के इकलौते ऐसे नेता बने जो तीन राज्यों - संयुक्त पंजाब-हरियाणा, हरियाणा और राजस्थान की सरकार में मंत्री रहे थे. इन्हीं तैयब हुसैन के बेटे चौधरी जाकिर हुसैन के सहारे भारतीय जनता पार्टी मेवात यानी नूंह जिले में इतिहास रचने की उम्मीद पाले हुए है. इतिहास इसलिए क्योंकि सत्तर फीसदी मुस्लिम आबादी वाले मेवात में भाजपा अब तक अपने पैर जमाने में नाकाम रही है.

इस चुनाव में भाजपा ने जाकिर हुसैन को नूंह विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा है. पिछले विधानसभा चुनाव में हुसैन इस सीट पर मेवात की अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज कर चुके हैं. तब जाकिर हुसैन इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के उम्मीदवार थे और उनका मुकाबला कांग्रेस के आफताब अहमद से था. इसी तरह जिले की एक अन्य सीट फिरोजपुर झिरका से भी भारतीय जनता पार्टी ने मेवात के एक और कद्दावर नेता नसीम अहमद को अपना प्रत्याशी चुना है. इस सीट से दो बार विधायक रह चुके नसीम अहमद प्रदेश के पूर्व मंत्री शकरुल्ला खान के बेटे हैं और जाकिर हुसैन की तरह पहले इनेलो से जुड़े थे.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में जाकिर हुसैन और नसीम अहमद के आलोचक भी यह स्वीकार करते हैं कि इन दोनों नेताओं की वजह से बड़ी संख्या में मेवात के मुसलमान भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ झुके हैं. यह बात इसलिए चौंकाती है क्योंकि देश भर की तरह हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी भाजपा तीन तलाक और धारा 370 जैसे मुद्दों को जमकर भुना रही है और सामान्य मुसलमानों को ऐसी बातें कम ही सुहाती हैं. फ़िर पहलू खान मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं में शामिल आरोपितों के प्रति भाजपा के नरम रुख के चलते भी मेवात में पार्टी के ख़िलाफ़ काफी नाराज़गी महसूस की गई थी. इन लोगों के गुस्से को दो साल पहले चलती ट्रेन में हुए जुनैद खान हत्याकांड ने भी बढ़ाने का काम किया.

भारतीय जनता पार्टी के प्रति मेवात के लोगों का आक्रोश बीते लोकसभा चुनाव में साफ महसूस किया गया था. तब भाजपा हरियाणा की सभी दस लोकसभा सीटें जीत पाने में सफल रही. लेकिन इन सीटों का विधानसभावार विश्लेषण बताता है कि नूंह जिले में भाजपा प्रत्याशी अपने प्रतिद्वंदियों से खासे पीछे रहे थे. लेकिन अब छह महीने से भी कम समय में यहां की स्थिति बिल्कुल बदली सी नज़र आती है.

स्थानीय निवासी जमील अहमद इस बारे में कहते हैं, ‘प्रत्येक सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने पड़ते हैं. धारा 35-ए और 370 को हटाकर सरकार ने ठीक ही किया है. इनके हटने से हम पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा. सरकार से हमारी ये मांग ज़रूर है कि वहां हमारे मुसलमान भाइयों पर लगी पाबदियां जल्द से जल्द हटाई जाएं. लेकिन इसे लेकर हमें भाजपा से कोई शिकायत नहीं.’

चर्चा आगे बढ़ाने पर पैंसठ वर्षीय अहमद अपनी ही कौम के नेताओं पर बरस पड़ते हैं, ‘असल में तो 35-ए और 370 उसी दिन हटी मान लेनी चाहिए थीं जब फ़ारुख़ अब्दुल्ला की बेटी सारा अब्दुल्ला ने हिंदू सचिन पायलट से शादी की या जिस दिन महबूबा मुफ्ती ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई. दुर्रु मियां जैसे कद्दावर मुस्लिम नेता अपनी बेटियों के निकाह दूसरे मजहब में करते हैं और हमसे चाहते हैं कि हम भाजपा का विरोध करें. हम अनपढ़ हो सकते हैं, लेकिन इतने बेवकूफ नहीं हैं कि अपना फायदा नुकसान न देख सकें.’

पास ही के रैहना गांव के रहने वाले शाहिद खान भाजपा को समर्थन देने के पीछे स्वभाविक कारणों का हवाला देते हुए कहते हैं कि ‘केंद्र में भाजपा की सरकार है. राज्य में भी भाजपा की सरकार बनने की पूरी संभावना है. अब यदि हमें अपना विकास चाहिए तो विधायक भी भाजपा का ही चुनना होगा. नहीं तो हम सरकार के सामने अपनी मांगें कैसे रख पाएंगे.’

स्थानीय लोगों से हुई बातचीत से पता चलता है कि मेवात में भारतीय जनता पार्टी की मजबूती के पीछे कहीं न कहीं कांग्रेस की भी बड़ी भूमिका रही है. चालीस वर्षीय शाहिद खान कांग्रेस पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘पिछली कांग्रेस सरकार में जिले के कई लोगों पर झूठे मुकदमे दर्ज़ किए गए ताकि कोई वोटर कांग्रेस विधायकों की मुखालफत करने की हिम्मत न जुटा पाए और उन मुकदमों को रफा-दफा करने के बदले रुपए ऐंठे जा सकें.’

नूंह विधानसभा क्षेत्र में आने वाले चंदेड़ी गांव के बुजुर्ग फजरूद्दीन भी कुछ ऐसी ही बात दोहराते हैं. कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए वे कहते हैं, ‘आज तक जितने भी दंगे हुए उनकी शुरुआत कहीं न कहीं कांग्रेस ने ही करवाई है. चाहे भागलपुर हो या मेरठ या फिर गोपालगढ़, हर फसाद के वक़्त कांग्रेस की ही सरकार थी. असल में मुसलमानों को मारा ही कांग्रेस ने है.’

नूंह से फिरोजपुर झिरका की तरफ़ बढ़ने पर कांग्रेस के प्रति लोगों का रोष भी बढ़ता हुआ सा महसूस होता है. सुखपुरी गांव के रहने वाले आमीन खान भी फजरुद्दीन की तरह कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं, ‘बाबरी मस्जिद का ताला कांग्रेस ने खुलवाया, 2002 के गोधरा कांड और 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे में भी कांग्रेस की भूमिका संदिग्ध रही. फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि इन मामलों में भाजपा बदनाम हो गई और कांग्रेस बच निकली. हम किस आधार पर कांग्रेस को दोस्त मानें और बीजेपी को दुश्मन!’

यहां पर सबसे ज्यादा यह बात चौंकाती है कि यहां भी हमें कुछ लोग ठीक वैसी ही भाषा बोलते हुए मिलते हैं जैसी कि अब तक कट्टर हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं के मुंह से सुनने को मिलती रही है. पहलू खान वाले मामले पर अपनी राय रखते हुए अड़तीस वर्षीय एजाज खान कहते हैं, ‘गाय का गोश्त खाना हदीस में हराम है. जिस काम के लिए कानून की मनाही है, उसे करेंगे तो लिंचिंग तो होगी ही.’ हमारे यह पूछने पर, ‘कैसे पता कि गायें क़त्ल करने के लिए ही ले जाई जा रही थीं और क्या भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने का हक़ है?’, एजाज खान कहते हैं, ‘भीड़ को हक़ कौन देगा, कानून के ख़िलाफ़ काम करेंगे तो मारे तो जाएंगे ही.’

क्षेत्र में आगे बढ़ने पर हमारी मुलाकात शाकिर हुसैन से होती है. फलों के व्यवसायी हुसैन किसी पार्टी विशेष को अपना समर्थन देने या न देने के सवाल पर कहते हैं, ‘पूरा मेवात मरकज निजामुद्दीन मस्जिद में सिर झुकाता है. लेकिन आज तक वहां से किसी भी पार्टी के पक्ष या विरोध में खड़े होने का हुकुम नहीं हुआ. ये कुछ बिके हुए लोग हैं जो हमें फुसलाकर एक जगह बांधे हुए रखना चाहते हैं.’

मेवात में बदलती राजनीतिक फ़िजा पर सामाजिक कार्यकर्ता डॉ अशफाक़ आलम तफसील से अपनी राय रखते हैं. ‘फ़िरक़ापरस्ती के आरोपों से भाजपा को कतई दोषमुक्त नहीं किया जा सकता. लेकिन हरियाणा की पिछली सरकारों ने मेवात की जो अनदेखी की है उसे भुला पाना भी लोगों के लिए मुश्किल है. हुक्मरानों की बेरूखी का ही नतीजा है कि प्रदेश को कई बड़े नेता देने वाला मेवात (नूंह) आज देश का सबसे पिछड़ा इलाका बन गया.’ डॉ अशफाक बीते साल जारी हुई नीति आयोग की एक रिपोर्ट के आधार पर कहते हैं. इसे विडंबना ही कह सकते हैं कि यह बदहाली उस जिले की है जो राजधानी दिल्ली से दो घंटे और मिलेनियम सिटी के नाम से मशहूर गुरुग्राम से महज एक घंटे की दूरी पर स्थित है.

आलम आगे जोड़ते हैं, ‘अपने पिछले कई कार्यकाल की तरह 2005 से 2014 के दस साल के शासन में भी कांग्रेस ने मेवात की कई बुनियादी ज़रूरतों को नजरअंदाज किया. जैसे, हर साल सैंकड़ों सड़क दुर्घटनाएं होने के बावजूद नूंह से अलवर (राजस्थान) जैसे व्यस्त रास्ते को फोर लेन नहीं किया गया है. जिले में कोई बड़ा शिक्षण संस्थान नहीं है. यहां तक कि जो मेडिकल कॉलेज नूंह में खोला जाना था उसे भी कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा गुड़गांव ले गए. उसे वापिस नूंह लाने के लिए स्थानीय लोगों को बड़ा विरोध करना पड़ा और राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही ऐसा हो सका. इन हालात को देखते हुए स्थानीय लोगों ने इस बार राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय के बजाय स्थानीय मुद्दों पर ही वोट देने का फैसला किया है.’

नूंह जिले के मतदाताओं को लुभाने के लिए मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. खेती-किसानी करने वाले मुवीन खान कहते हैं कि ‘भाजपा के विधायक न होने के बावजूद चौधरी जाकिर हुसैन के कहने पर खट्टर सरकार ने उनके जिले के लिए पानी देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्हीं की बदौलत हमारी फसलें कई सालों बाद लहलहा रही हैं.’ इलाके के कई अन्य किसान भी कुछ ऐसी ही बातें दोहराते हैं.

किसानों के अलावा मेवात के उन परिवारों का भी झुकाव भाजपा की ही तरफ़ नज़र आता है जिनके सदस्य ड्राइवरी का काम करते हैं. दरअसल, 2007 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए न्यूनतम आठवीं पास होना अनिवार्य कर दिया गया था. इसके चलते न तो नए लाइसेंस बने और न ही पुरानों को रीन्यू किया गया. इस सख्ती का मेवात मेवात पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा था. एक अनुमान के मुताबिक यहां के चालीस हजार से ज्यादा ड्राइवरों में से कइयों को नए नियमों ने बेरोजगार कर दिया. लेकिन इस साल जून में मोदी सरकार ने यह पाबंदी हटा दी है. कहा जाता है कि केंद्र ने यह फैसला हरियाणा की खट्टर सरकार की खास गुज़ारिश पर ही लिया था.

इस सब के अलावा प्रदेश से लेकर क्षेत्रीय स्तर तक फैली कांग्रेस की अंदरूनी कलह भी मेवात में भाजपा को मजबूती देने में बड़ी भूमिका निभा रही है. फिरोजपुर झिरका में पूर्व मंत्री चौधरी अजमत खान के बेटे और कांग्रेस सरकार में खुद भी मंत्री रह चुके आजाद मोहम्मद ने टिकट न मिलने पर जननायक जनता पार्टी के प्रत्याशी अमन अहमद को समर्थन देने का ऐलान किया है. वहीं जिले की तीसरी और आख़िरी सीट पुन्हाना में कांग्रेस के कद्दावर नेता एजाज खान भी अपना टिकट रद्द होने की वजह से बगावत पर उतर आए हैं. सूत्रों की मानें तो वे अंदरखाने भाजपा की प्रत्याशी नौक्षम चौधरी की मदद कर सकते हैं. हालांकि इस सीट पर भाजपा सरकार में राज्यमंत्री और वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके रहीशा खान ने भी निर्दलीय ताल ठोककर नौक्षम चौधरी की मुश्किल बढ़ा दी है.

नूंह में कई मतदाता ऐसे भी हैं जो चौधरी जाकिर हुसैन और नसीम अहमद के भाजपा से जुड़ जाने से खासे निराश हैं. सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता नूरुद्दीन नूर भी उनमें से एक हैं. वे कहते हैं, ‘जिस विचारधारा विहीन राजनीति के लिए हरियाणा बदनाम है, हमारे विधायक भी उसी लीक पर चल रहे हैं.’ अपनी नाराज़गी को शब्दों में बयां करते हुए नूर आगे जोड़ते हैं, ‘हमारे क्षेत्र की अशिक्षा किसी से नहीं छिपी है. इसलिए हमारे लोग वही भाषा बोलते हैं जो इन नेताओं ने उन्हें सिखाई है. आज ये विधायक अपने नकारापन का ठीकरा विपक्षी राजनैतिक दलों पर फोड़ रहे हैं. लेकिन वे यह क्यों नहीं बताते कि दूसरे संगठनों के नाम पर भी क्षेत्र में राज तो इन्होंने और इनके बाप-दादों ने ही किया है.’

बकौल नूरुद्दीन नूर, ‘एक तरफ़ वे लोग हैं जो भीड़ के हाथों मारे गए लोगों और उनके परिवारों के हक़ के लिए लड़ते-लड़ते अपना सब कुछ दांव पर लगाए बैठे हैं. और दूसरी तरफ़ हमारे रहनुमा हैं जिनकी आंखों का पानी मर चुका है. वे न सिर्फ़ आम मतदाता को बरगला रहे हैं बल्कि ख़ुदगर्जी के चलते मज़लूमों का ख़ून तक भुला चुके हैं और फ़िरकापरस्त ताकतों को मजबूत करने में लगे हैं.’