इतिहास के पुनर्लेखन की बात पर जोर देते हुये केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कहा कि हमें अंग्रेज इतिहासकारों और वामपंथियों को दोष देना बंद करना चाहिए और सत्य पर आधारित इतिहास लिखना चाहिए. उन्होंने सावरकर के लेखन का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वीर सावरकर न होते तो 1857 की क्रांति इतिहास न बनती और उसको भी हम अंग्रेजों की दृष्टि से ही देखते. अमित शाह ने यह बात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में आयोजित संगोष्ठी ‘गुप्तवंशक-वीर: स्कंदगुप्त विक्रमादित्य’ में बोलते हुए कही.

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, ‘हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा. मेहनत करने की दिशा को केंद्रित करना होगा. कब तक वामपंथियों को गाली देंगे, कब तक हम अंग्रेज इतिहासकारों की नजर से देश को देखेंगे. उनको गए हुए 70 साल हो गए और अब समय आया है हमारे देश के इतिहासकारों को एक नए दृष्टिकोण के साथ इतिहास को लिखने का.’ उन्होंने कहा, ‘मैं अब भी कहता हूं कि पहले जिसने लिखा है उसके साथ विवाद में न पड़ो, उन्होंने जो लिखा है वह लिखा है. हम सत्य को ढूंढकर सत्य को लिखने का काम करें. मैं मानता हूं कि नया जो लिखा जायेगा वह सत्य होगा और लंबा भी चलेगा. उस दिशा में हमें आगे बढ़ना होगा.’

गोष्ठी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय ने भी संबोधित किया. योगी ने कहा कि कश्मीर में धारा 370 समाप्त होना अपने आप में देश के अंदर आजादी के बाद का सबसे साहसिक एवं ऐतिहासिक निर्णय है. उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और स्कंदगुप्त की परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अमित शाह ने किया है.