गुरूवार को सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प हैशटैग ‘नोएडा फिल्मसिटी एक्सकवेशन’ (नोएडा फिल्मसिटी की खुदाई) ट्रेंडिग लिस्ट में टॉप पर रहा. इस मामले में सबसे पहले जानने वाली बात यह है कि फिल्मसिटी, नोएडा शहर का वह इलाका है, जहां देश के ज्यादातर मीडिया हाउस स्थित हैं. फिल्मसिटी में खुदाई की मांग करने वाले इस हैशटैग के शुरू होने के तकरीबन बारह घंटे बाद तक, इस पर 75 हजार से ज्यादा ट्वीट किए जा चुके थे. इस पर टिप्पणी करने वालों में स्वराज अभियान के प्रमुख योगेंद्र यादव, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ध्रुव राठी, फिल्मकार शेखर कपूर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रकार, कॉमेडियन और जानी-मानी हस्तियां शामिल हैं. यहां तक कि राष्ट्रीय जनता दल के ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट से भी इस पर प्रतिक्रिया दी गई है.

ट्रेंड की शुरूआत की बात करें तो यह सोशल मीडिया के एक चर्चित पैरोडी-ह्यूमर अकाउंट रोफल गांधी से शुरू हुआ. रोफल गांधी ने अपने एक ट्वीट थ्रेड में नोएडा में स्थित किसी काल्पनिक हनुमान मंदिर की कहानी लिखी थी. यह कहानी ठीक उसी अंदाज में लिखी गई थी जिसमें राइटविंग प्रोपगैंडा फैलाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कई पोस्ट्स देखने को मिलती हैं. इस ट्वीट थ्रेड में रोफल गांधी ने दावा किया कि हनुमानजी की गदा का कोई मनका नोएडा में गिरा था और उस पर एक भव्य मंदिर बनाया गया था. यह मंदिर अब जमीन से करीब 3000 मीटर नीचे दबा चुका है. ट्वीट के आखिर में मांग की गई कि हनुमान जी के मनका मंदिर को किसी भी कीमत पर बाहर निकाला जाना चाहिए क्योंकि यह लोगों की आस्था का सवाल है.

रोफल गांधी के इस व्यंग्यात्मक ट्वीट का उद्देश्य टीवी मीडिया द्वारा राम मंदिर पर की जा रही बेसिर-पैर की रिपोर्टिंग को निशाना बनाना था. दरअसल दो दिन पहले ही जब अयोध्या मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित रखा तो तमाम न्यूज चैनलों पर मंदिर-मंदिर का शोर मच गया. इसके बाद उन पर बहस के मुद्दे, विशेषज्ञों की बातें, कार्यक्रम में इस्तेमाल किए गए ग्राफिक्स और यहां तक कि दर्शकों को अपनी तरफ खींचने के लिए इस्तेमाल की गईं पंचलाइनें भी सांप्रदायिकता के रंग में रंगी देखी गईं. हिंदी न्यूज चैनल ‘आज तक’ द्वारा किया गया यह ट्वीट (नीचे) इसका सबसे सटीक उदाहरण है. लगातार भड़काऊ लाइन का इस्तेमाल करने के चलते ‘नोएडा फिल्मसिटी एक्सकवेशन’ के जरिये इसी चैनल को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है. यहां तक कि और मज़े-मज़े में मंदिर की सटीक लोकेशन भी इंडिया टुडे मीडियाप्लेक्स (बिल्डिंग) को ही बताया जा रहा है.

बीते कुछ सालों से राम मंदिर और हिंदुत्व का मुद्दा लगभग रोज़ ही न्यूज चैनलों की बहस का विषय बनता दिखा है लेकिन हालिया कुछ दिनों में यह बहस शायद अपने सबसे बुरे स्वरूप में पहुंच गई है. ऐसे में यह सोशल मीडिया ट्रेंड न्यूज चैनलों पर बेहद चतुराई से किया गया एक तंज है. इस ट्विटर ट्रेंड के मामले में दिलचस्प यह भी है कि इसमें उन खासियतों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है जो सोशल मीडिया पर प्रोपगैंडा फैलाने वालों की पहचान कहे जा सकते हैं. फिर चाहे वह ट्वीट्स की भाषा हो, ट्रेंड से जुड़े मीम और तस्वीरें हों या अपनी बात को मजबूती देने के लिए तैयार किए फर्जी स्क्रीन शॉट्स हों. इस ट्रेंड में राम मंदिर वाले अंदाज में ही हनुमान मंदिर बनाने की मांग करने वाले तरह-तरह के ट्विटर अकाउंट शुरू किए गए हैं तो चेंज डॉट ओआरजी पर एक पेटीशन भी डाली गई है. इस तरह के हथकंडे अपनाने के आरोप अब तक भाजपा के आईटी सेल पर ही लगते रहे हैं. इस लिहाज से ‘नोएडा फिल्मसिटी एक्सकवेशन’ समाचार चैनलों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर प्रोपगैंडा फैलाने वालों को भी आड़े हाथों लेने का काम करता है. यह विरोध कई तरह के बेतुकेपन का उन्हीं की भाषा में जवाब देते हुए यह भी दिखाता है कि सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है जो कभी भी किसी को भी उल्टा पड़ सकता है.

लेकिन इस विरोध प्रदर्शन में जितनी बौद्धिकता इस्तेमाल की गई है, उसके चलते यह हो सकता है कि ये बातें सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ लाख लोगों तक ही सीमित रह जाएं. या अगर और लोगों तक पहुंचें भी तो कई लोग इन्हें सही तरीके से समझ ही न सकें. इसका एक उदाहरण हिंदी दैनिक पत्रिका द्वारा की गई, इस रिपोर्ट को भी माना जा सकता है. इसमें रोफल गांधी की सारी बातों को सच मानते हुए हनुमान मनका मंदिर को खोजे जाने की खबर प्रकाशित की गई है. इससे यह अंदेशा होता है कि जिस ह्यूमर को एक पत्रकार नहीं समझ पा रहा है, क्या उसे कोई आम या साधारण समझ वाला पाठक आसानी से समझ सकेगा!

लेकिन जो इसे समझते हैं, वे समझते हैं कि इस विरोध प्रदर्शन में स्पष्ट तरीके से यह कहा जा रहा है कि ज्यादातर समाचार चैनलों का दिमागी दिवालियापन अब वह बीमारी बन चुका है जिसका फिलहाल कोई इलाज नहीं है.