निर्देशक: नवदीप सिंह
लेखक: दीपक वेंकटेश, नवदीप सिंह
कलाकार: सैफ अली खान, ज़ोया हुसैन, मानव विज, दीपक डोबरियाल, सिमोन सिंह
रेटिंग: 2/5

चिलम फूंककर मस्त रहने वाले गुसाईं यानी ‘लाल कप्तान’ का किस्सा सन 1764 में हुई बक्सर की लड़ाई से शुरू होता है. जी हां, वही बक्सर की लड़ाई जिसका साल और बाकी जानकारियां रटना हमें स्कूल में बिलकुल नहीं भाया था. बुरा यह है कि अब जब इस लड़ाई का जिक्र सिनेमाई परदे पर हुआ है तो भी यह कुछ खास रास नहीं आती है.

बक्सर की लड़ाई को अपना रेफरेंस पॉइंट बनाने वाली ‘लाल कप्तान’ असल में एक काल्पनिक बदला कथा है. यह कथा अठारवीं सदी के आखिरी दौर में बुंदेलखंड के राजनीतिक ताने-बाने की टेक लेकर रची गई है जिसके मुख्य किरदारों में किसी को मारने के मिशन पर निकला एक नागा साधु, एक रहस्यमयी विधवा, एक पागल जासूस और एक दुर्दांत किलेदार शामिल हैं. होना यह चाहिए था कि ये किरदार आपस में जुड़कर कहानी का एक सूत्र तैयार करते और अपने होने का मतलब समझाते. लेकिन इसके उलट ये इतनी विपरीत दिशाओं में आगे बढ़ते हैं कि अंत तक आपको पटकथा का अता-पता ही नहीं मिलता है. यहां पर फिल्म धीमी गति से कई समांतर कहानियां कहने वाला हॉलीवुड का प्रचलित तरीका अपनाती है और इसमें बुरी तरह असफल होती है.

बॉलीवुड की आम एक्शन-थ्रिलर फिल्मों से इतर ‘लाल कप्तान’ में संवादों का किफायत से इस्तेमाल किया जाना अलग लगता है. लेकिन इसके चलते फिल्म को एक बड़ा नुकसान भी होता है. फिल्म के कई किरदार पूरी तरह से खुलकर सामने नहीं आ पाते हैं और अनजाने ही बने रहते हैं. इसके अलावा, फिल्म की पृष्ठभूमि को सही तरह से दिखाने के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए था, वह भी एकाध किरदार को छोड़कर किसी के पास नहीं दिखती है. इन सबके बीच केवल सिरफिरे जासूस और उसके दो कुत्तों – सुखीराम और दुखीराम – की तिकड़ी अपनी अजीबो-गरीब भाषा के कारण हमारा ध्यान खींचती है और गुदगुदाने वाला मनोरंजन भी करती है.

फिल्म के मुख्य किरदार गोसाईं यानी सैफ अली खान को जटा, भभूत और अंग्रेज सेना की लाल जैकेट पहनाकर नागा साधु का रहस्यमयी गेटअप दिया गया है. आम नागाओं से अलग गोसाईं को यह अजीबो-गरीब अवतार क्यों दिया गया है, फिल्म इसकी कोई वाजिब वजह नहीं बता पाती है. अपनी इस वेशभूषा से सैफ अली खान ‘पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन’ के जैक स्पैरो की याद दिलाते हैं. लेकिन बुरा यह है कि उनके किरदार को जैक स्पैरो सरीखा कमाल बना देने वाली एक भी खासियत नहीं दी गई है. और यही कारण है कि सैफ का बढ़िया अभिनय भी गोसाईं के इस किरदार को प्रभावी और यादगार नहीं बना पाता है.

बाकी कलाकारों पर आएं तो मानव विज और ज़ोया हुसैन याद रखने वाला काम करते हैं. मानव अपने गहरे निशानों वाले चेहरे से खूब सारा रोमांच रचते हैं लेकिन उनके हिस्से में न तो जरूरत भर स्क्रीन स्पेस आया है और न ही दमदार संवाद. इसलिए वे विलेन होते हुए भी कई बार विक्टिम नज़र आने लगते हैं. ऐसा ही कुछ ज़ोया हुसैन के साथ भी होता है, फिर भी वे जब-जब स्क्रीन पर आती हैं, नज़रें हटाने का मौका नहीं देती हैं. यहां पर अगर कोई सबसे अधिक मज़े देता है तो वह मसखरे अंदाज में ‘हाउ डूड्डू’ कहकर हाल पूछने वाले दीपक डोबरियाल हैं. वे हमेशा की तरह अपनी भूमिका में इस तरह खोते हैं कि पहचान में ही नहीं आते. उनका चलना, बोलना, यहां तक कि देखना भी उनके कमाल के अभिनेता होने की बानगी पेश करता है.

फिल्म का तकनीकी पक्ष बढ़िया कहा जा सकता है. बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि वाली इस कहानी की ज्यादातर शूटिंग राजस्थान के इलाकों में हुई है और इसके चलते लोकेशन समय और कहानी के हिसाब से एकदम मुफीद साबित होती है. इसके साथ-साथ कमाल की सिनेमैटोग्राफी भी फिल्म में रहस्य के माहौल को बनाए रखने में जरूरी भूमिका निभाती है और आपको इस बात का यकीन दिला देती है कि आप 18वीं सदी में हैं. यहां पर अगर कुछ कमतर रह जाता है तो वह संगीत है जो अपनी मॉर्डननेस के चलते मिसफिट लगता है.

‘लाल कप्तान’ का निर्देशन ‘एनएच-10’ के लिए दर्शकों और समीक्षकों, दोनों से तारीफ बटोरने वाले नवदीप सिंह ने किया है. उनकी इस फिल्म में उन्होंने एक्शन के समांतर काल और कर्म के दर्शन को भी पिरोने की कोशिश की है. फिल्म के ज्यादातर संवाद भी इसी की तरफ इशारा करते हैं लेकिन इस दर्शन को फिल्म केवल शब्दों में ही दोहराती दिखती है. इसे सही तरह से समझाने के लिए फिल्म में जिस तरह के दृश्यों की दरकार थी, वे यहां नहीं हैं. ऊपर से इसका हॉलीवुड मार्का ट्रीटमेंट लाल कप्तान के देसीपन को खत्म कर इसके बेहतर और मनोरंजक सिनेमा बनने की बाकी संभावनाओं को भी खत्म कर देता है.