स्पेन की 17 ऑटोनोमस कम्यूनिटीज़ (राज्य जैसी एक क्षेत्रीय व्यवस्था जो काफी हद तक स्वायत्त होती है) में से एक कतालोनिया में 14 अक्टूबर से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. राजधानी बार्सेलोना के हवाई अड्डे से विमानों का और मुख्य रेलवे स्टेशन से गाड़ियों का आना-जाना काफ़ी कुछ ठप्प पड़ गया है. प्रमुख सड़कों, मेट्रो के स्टेशनों और रेल की पटरियों पर सैकड़ों-हज़ारों लोग धरना देने बैठ जाते हैं. पुलिस हंटर चलाकर या बलपूर्वक खींचते-घसीटते हुए उन्हें परे हटाती है, पर देखते ही देखते कोई दूसरा प्रदर्शनकारी वहां बैठ जाता है. सैकड़ों उड़ानें और ट्रेनें रद्द कर देनी पड़ी हैं. यात्रियों को भयंकर परेशानियों हो रही हैं. पर वे यदि कतालोनिया की स्वतंत्रता के समर्थक हैं, तो अपनी परेशानियों की शिकायत नहीं करते.

इस दौरान सैकड़ों लोग घायल और गिरफ्तार हुए हैं. जन-असंतोष के इस विस्फोट का कारण है मद्रिद (मैड्रिड) स्थित स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय का 14 अक्टूबर का फ़ैसला. इसमें न्यायालय ने 2017 में स्पेन की केंद्र सरकार द्वारा बर्खास्त की गई कतालोनिया की भूतपूर्व सरकार के नौ मंत्रियों को नौ से 13 वर्ष तक की जेल की सज़ा सुनायी है. उन पर आरोप थे कि उन्होंने 2017 में कतालोनिया की स्पेन से स्वतंत्रता के लिए एक अवैध जनमतसंग्रह आयोजित किया था. इसके आधार पर उन्होंने राज्य-विधानसभा में स्वतंत्रता से जुड़ा एक प्रस्ताव भी पारित करवा लिया था.

कतालोनिया की सरकार इस स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा नहीं कर पायी, क्योंकि स्पेन की केंद्र सरकार ने, 27 अक्टूबर 2017 को, उसे केंद्र-शासित राज्य बनाकर ऐसा होने नहीं दिया. वहां के कई मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष सहित 19 प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. कतालोनिया के राष्ट्रपति (राज्याध्यक्ष) कार्लेस पुज्देमोन अंतिम क्षणों में बेल्जियम पहुंचकर गिरफ्तारी से बच गये.

कतालोनिया के जिन नौ भूतपूर्व मंत्रियों को स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने सज़ा सुनायी हैं, उन्हें राजद्रोह (सेडिशन) और जनमतसंग्रह करवाने के लिए सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का दोषी ठहराया गया है. इनमें राज्य के उपराष्ट्रपति रहे ओरिओल जुंकेरास सहित कई मंत्री पिछले दो वर्षों से न्यायिक हिरासत में ही थे.

सरकारी महाभियोक्ता ने इन सभी लोगों पर बग़ावत का आरोप लगाया था. बग़ावत या विद्रोह के लिए स्पेन में 30 वर्ष तक के कारावास की सज़ा सुनायी जा सकती है. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की नज़र में उनका अपराध ऐसा नहीं था कि उसे बलप्रयोग द्वारा किसी तख्तापलट या सत्ताहरण जैसा माना जाये. न्यायाधीशों ने पिछले दो वर्षों से बेल्जियम में रह रहे, कार्लेस पुज्देमोन की पुनः गिरफ्तारी के लिए एक नया अंतरराष्ट्रीय वारंट जारी करने का आदेश भी दिया है.

दो वर्ष पूर्व जारी इसी प्रकार का एक अखिल यूरोपीय वारंट स्पेन को उस समय वापस लेना पड़ा था, जब मार्च 2018 में, फ़िनलैंड से कार द्वारा बेल्जियम जाते हुए कार्लेस पुज्देमोन जर्मनी में गिरफ्तार कर लिये गये थे. स्पेन द्वारा उनके प्रत्यर्पण की मांग को जर्मनी के एक उच्च न्यायालय ने यह कहकर ठुकरा दिया कि ‘’बग़ावत का आरोप प्रत्यर्पण का औचित्य नहीं बन सकता.’ समझा जाता है कि स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने जर्मन अदालत के इसी निर्णय की वजह से 14 अक्टूबर के अपने फ़ैसले को ‘राजद्रोह’ के आरोप पर आधारित किया है, न कि बग़ावत के आरोप पर. अब देखना है कि क्या बेल्जियम की न्यायप्रणाली नये वारंट को स्वीकार कर लेगी और उसके आधार पर पुज्देमोन का प्रत्यर्पण करने के लिए राज़ी हो जायेगी.

पुज्देमोन ने स्पेनी सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए उसे एक ‘अतिविरूपता’ बताया और कतालोनिया के स्वाधीनता आन्दोलन के समर्थकों से इसके विरोध में प्रबल प्रतिक्रया दिखाने का आग्रह किया. उन्होंने कहा, ‘मैं पहले भी कह चुका हूं और आज भी दृढ़तापूर्वक कह रहा हूं – यह कोई अपराध नहीं है कि लोग अपने भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय करना चाहते हैं.’ न्यायालय का फैसला उनकी दृष्टि में ‘दमन और प्रतिशोध’ की भावना से प्रेरित है.

क़ानून के राज में पृथकतावाद के लिए स्थान नहीं

कतालोनिया की जनता के पास एक स्वतंत्र देश बनने के चाहे जितने उचित कारण हों, लेकिन दुनिया के लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों के समान ही स्पेन का संविधान भी देश की क्षेत्रिय अखंडता को खंडित करने की अनुमति नहीं देता. स्वाभाविक है कि स्पेनी न्यायाधिशों को अपने संविधान की इन्हीं सीमाओं के भीतर रहकर अपना निर्णय सुनाना था.

स्पेन के न्यायाधीशों ने इसकी याद दिलाते हुए लिखा कि किसी जनमतसंग्रह द्वारा ‘ऐसे किसी निर्णय का अधिकार नहीं मिल सकता, जिसका समाज द्वारा परिभाषित सीमाओं के बाहर जाकर इस्तेमाल हो सके... क़ानून के राज वाले किसी राज्य से बाहर कोई लोकतंत्र नहीं हो सकता.’ दूसरे शब्दों में, एक लोकतांत्रिक देश में किसी पृथकतावादी जनमतसंग्रह को न तो वैध माना जा सकता है और न उसकी अनुमति दी जा सकती है.

भारत में और उसके बाहर भी कई लोग लोकतंत्र की दुहाई देते हुए, कश्मीर के भारत में विलय के सात दशक बाद भी, जनमतसंग्रह और आत्मनिर्णय के अधिकार की बात करते हैं. ऐसे लोगों को स्पेनी सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिये. एक लोकतांत्रिक संविधान और क़ानून के राज वाले देश में भी जनता या उसका कोई वर्ग उचित ही असंतुष्ट हो सकता है. आंदोलन भी कर सकता है. लेकिन, वह देश की अखंडता को खंडित करने की बात नहीं कर सकता. ऐसे में असंतुष्ट जनता और राज्य सत्ता को ले-देकर किसी न किसी व्यावहारिक समझौते पर पहुंचना ही होता है.

स्पेन में 28 अप्रैल 2019 को हुए संसदीय चुनावों के बाद कोई नयी सरकार नहीं बन सकी. समाजवादी प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ की कार्यवाहक सरकार ही देश का शासन चला रही है. 10 नवंबर को वहां दुबारा चुनाव होने वाले हैं. चुनावों के बाद यदि कोई टिकाऊ सरकार बनती है, तो उसे कतालोनिया की समस्या का कोई न कोई मध्यमार्गी व्यावहारिक समाधान निकालना होगा. कतालोनिया एक स्वतंत्र देश बन नहीं सकता, पर उसे अनिश्चित काल तक दुखित-दमित भी नहीं रखा जा सकता.

कतालोनिया का एक हज़ार वर्ष का अपना अलग इतिहास है. भारत के कश्मीर की तरह ही वहां भी शेष स्पेन से अलग और विशिष्ट होने का भाव जगाने वाली अपनी भाषा, अपना संविधान, अपना राष्ट्रगान और अपना अलग झंडा भी है. पर कश्मीर से भिन्न, अपनी 75 लाख की जनसंख्या के साथ वह स्पेन का एक सबसे खुशहाल राज्य भी है. स्पेन के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उसका योगदान 21 प्रतिशत के बराबर है. उसे लगता है कि वह शेष स्पेन को जितना देता है, उतना बदले में पाता नहीं. यही सब चीज़ें मिलकर वहां की जनता में पृथकतावादी भावनाएं जगाती हैं.