गांधी की अधेड़ या बूढ़ी छवि इस क़दर रूढ़ हो गयी है कि उनके साथ युवा मन या सृजन या चिंतन का कोई जीवंत और प्रासंगिक संबंध या संवाद हो सकता है, यह आसानी से ख़याल में नहीं आता. कृष्णा सोबती शिवनाथ निधि और रज़ा फ़ाउंडेशन का वार्षिक आयोजन ‘युवा’, पिछले तीन वर्षों से, युवा लेखकों को पिछले समय के बड़े लेखकों और कृतियों पर एकाग्र करता रहा है. इस बार का ‘युवा-2019’ साहित्यिक कृतियों या लेखकों पर नहीं महात्मा गांधी पर उनकी तीन बीज-कृतियों ‘हिंद स्वराज’, ‘सत्य के प्रयोग’ और ‘प्रार्थना प्रवचन’ पर केंद्रित किया गया. मेरी अपनी यह धारणा रही है कि इस समय साहित्य में युवा प्रतिभा प्रायः आत्मरति और परस्पर प्रशंसा और संवर्द्धन में इस क़दर रमी हुई है कि उसे याद ही नहीं रहता कि उसकी, युवा की भी एक लंबी परंपरा है, रही है और उसमें दो-चार होना सृजन-विचार-समझ सबके लिए समृद्धिकर और ज़रूरी हो सकता है. जब उन्हें पिछले साहित्य की ओर ले जाना ही कठिन है तो गांधी जैसे ग़ैरसाहित्यिक व्यक्तित्व की ओर ले जाने की हमारी कोशिश शुरू से ही बेहद जोखिम की संभावना से भरी थी. लेकिन 11-12 अक्टूबर को हुए आयोजन में लगभग पचास युवा लेखकों ने जो किया वह सचमुच, अप्रत्याशित रूप से, उत्साहजनक, नया-ताज़ा, विचारोत्तेजक और भावप्रवण था.

गांधी इन दिनों बड़े पैमाने पर दुर्व्याख्या, ग़लतफ़हमी, अपशब्दों आदि के शिकार बनाये जा रहे हैं या कि निरे पाखंडी अनुष्ठानों की गिरफ़्त में उबाऊ ढंग से अप्रासंगिक. यह तब जबकि वर्तमान हिंसक-हत्यारी धर्मोन्मत्त सांप्रदायिक द्वेष और जातिवाद के नृशंस रूपों से मत्त मानसिकता का, जो राजनीति-धर्म-आर्थिकी-मीडिया आदि सबको अपनी चपेट में ले चुकी है. एक मात्र विकल्प गांधी, उनके द्वारा प्रतिपादित और आचरण में अमल की गयी सत्य-अहिंसा-सत्याग्रह की मूल्यत्रयी नये क़िस्म का गहरा प्रतिरोध विकसित करने में सहायक हो सकती है. युवा बंधुओं ने इस संदर्भ और संभावना को गांधी की पुस्तकों को पढ़ते हुए गहराई से समझा-गुना. उन्होंने गांधी और आज के समय दोनों को ही साथ-साथ ध्यान में रखा. गांधी की रोशनी में समय को पढ़ा और समय की रोशनी में गांधी को. अधिकतर उन्हें पहले से निर्धारित पुस्तक ही नहीं, ब़ाकी पुस्तकें भी पढ़कर आये. गांधी के कुछ विचलनों पर भी कुछ ने ध्यान दिया. गांधी के यहां विचार और काम के बीच की दूरी कम से कम करने की जो अथक कोशिश है उस पर भी नज़र गयी.

जैसे कि इस पर भी कि वे हमेशा धीरज से दूसरों की बात सुनने-समझने का यत्न करते रहे. उनका सहज पर सफल-सार्थक संप्रेषण और अज्ञातकुलशील को भी सम्बोधित करने की उनकी क्षमता भी लक्ष्य किये गये. उनके कर्म और विचार में बदलती स्थिति के अनुरूप उनकी परिवर्तनशीलता, पर सत्य-अहिंसा-अन्तःकरण पर उनकी अडिगता, दोनों ही विचार के दायरे में आयीं. गांधी के अकेले पड़ जाने पर भी अपने सत्याग्रह पर अड़े रहने को युवाओं ने हिसाब में लिया. गांधी की परंपरा में रस-बसाहट और आधुनिकता के प्रति खुलापन दोनों ही प्रगट होते रहे. अनेक वरिष्ठ लेखकों जैसे गोपेश्वर सिंह, अरुण कमल, सुधीरचन्द्र, प्रेमपाल शर्मा, अपूर्वानन्द, मंगलेश डबराल आदि ने उत्साहपूर्वक युवाओं के विचार सुने और उन्हें नया-ताज़ा पाया.

रज़ा सामग्री

एशिया सोसायटी न्यूयार्क ने दिल्ली में 11-12 अक्टूबर 2019 को ‘कलाएं और संग्रहालय’ पर एक शिखर सम्मेलन आयोजित किया जिसमें एक सत्र कलाकारों की विरासत और अभिलेखागारों पर केंद्रित था जिसमें मैंने भाग लिया. बातचीत तीन संस्थानों के इर्दगिर्द हुई, संगीतकार जान केज, कलाकार यायोई कुसामा और सैयद हैदर रज़ा के अभिलेखागारों के. उस सिलसिले में यह स्पष्ट हुआ कि रज़ा ने विश्व के स्तर पर एक अनूठा फ़ाउंडेशन बनाया है जो उन पर केंद्रित नहीं है बल्कि अधिकांशतः दूसरों के लिए, विशेषतः युवा कलाकारों, लेखकों, संगीतकारों, नर्तकों और विचारकों को लेकर सक्रिय है. जिन दूसरे अभिलेखागारों के विवरण दिये गये संबंधित कलाकारों पर ही एकाग्र हैं.

रज़ा फ़ाउंडेशन में बीस हज़ार से अधिक पत्र- फ्रेंच-अंग्रेज़ी-हिन्दी में हैं जो लगभग बारह सौ व्यक्तियों और संस्थाओं ने रज़ा को लिखे थे. लगभग आठ हज़ार फ़ोटोग्राफ़ हैं जो रज़ा उनके कार्यकलाप, मित्रों, उनके प्रवासों आदि से संबंधित हैं. छह हज़ार से अधिक पुस्तके और कैटलॉग भी हैं. अपने 132 चित्र और उनके द्वारा संग्रहीत किये गये अधिकतर युवा कलाकारों के 64 काम भी इस अभिलेखागार का हिस्सा हैं जो उसे रज़ा की वसीयत से मिले हैं. लगभग सत्तर प्रतिशत सामग्री को डिज़िटल सुरक्षित कर लिया गया है. रज़ा के जब-तब लिखे गये नोट्स, टिप्पणियां, आत्मवृत्त, आत्मवक्तव्य आदि भी हमारे पास हैं. इस सामग्री से कुछ प्रकाशन हुए हैं जिनमें अनेक कलाकारों आदि से रज़ा के पत्राचार की तीन पुस्तकें, रज़ा पर लिखी गयी अंग्रेजी-फ्रेंच-हिंदी में आलोचनात्मक समीक्षाओं और टिप्पणियों का संचयन, रज़ा के लेखन के दो संग्रह आदि शामिल हैं. रज़ा ने अपने जीवनकाल में इन प्रकाशनों पर आने वाला ख़र्च अपनी गैलरी से करवाया, फ़ाउंडेशन को एक धैला भी ख़र्च नहीं करने दिया!

फ़ाउंडेशन का यह प्रयत्न है कि कुछ अन्य बड़े कलाकारों की सामग्री भी उसे मिल जाये. यह प्रयत्न भी है कि कहीं एक रज़ा संग्रहालय स्थापित किया जाये जिसमें यह सामग्री व्यवस्थित और सार्वजनिक रूप से उपलभ्य हो. उनके नज़दीकी मित्र-कलाकारों और उनके प्रिय कलाकारों की कम से कम एक कलाकृति इस संग्रहालय में प्रदर्शित हो इसकी भी कोशिश है.

बहस में यह मुद्दा आया कि सार्वजनिक और राज्यपोषित संग्रहालय पिछड़ रहे हैं. मेरा मत है कि निजी हाल से चलनेवाले कलासंस्थानों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती के अभागे समय में असहमति और सर्जनात्मक-बौद्धिक स्वतंत्रता की मजबूत और सक्रिय जगहें बन सकना चाहिये.

आरम्भिक रेखाएंं

वास्तुकार गौतम भाटिया ने कहा कि ऐसे लोग बिरले होते हैं तो कई तरह के काम करें और हरेक में उत्कृष्टता हासिल करें. ज्यादातर जो कई काम करते हैं कुछ में ही अच्छे होते हैं, बाक़ी में औसत या उससे भी कम. प्रसंग था हमारे समय के श्रेष्ठ रंगकर्मी इब्राहीम अलकाज़ी के उन चित्रों के प्रदर्शनी जो अधिकांशतः पिछली सदी में पचास के दशक में लंदन में रंगमंच की शिक्षा लेते हुए और बाद में साठ के दशक में दिल्ली में बनाये थे. दिल्ली की श्रीधराणी गैलरी में लगी यह प्रदर्शनी कवि-संग्राहक रणजीत होस्कोटे ने आकल्पित और आर्ट हैरिटेज ने आयोजित की है. शीर्षक है ‘आरंभिक रेखाएं. अलकाज़ी की छवि एक महान निर्देशक और रंगशिक्षक के रूप में इतनी रूढ़ हो गयी है कि हममें से अधिकांश को उनके एक सशक्त चित्रकार होने की कोई जानकारी नहीं है हालांकि उनके चित्रों की एक प्रदर्शनी लंदन में, एक जहांगीर आर्ट गैलरी मुंबई में इस गैलरी के पहले ही वर्ष में और एक दिल्ली में आयोजित हुई थीं. बरसों पहले मैंने रंगकर्मी नीलम मानसिंह के पास अलकाज़ी का एक चित्र देखा था. पहली बार उनके पास बचे सभी चित्र एकत्र प्रदर्शित हो रहे हैं. यह जानना भी रोचक है कि वे एक पुलिन्दे में अलकाज़ी की रंगकर्मी बेटी अमाल अल्लाना को एक संदूक में दशकों से बंद अकस्मात मिले. अलकाज़ी अपनी आयु के 94 वर्ष पूरे कर चुके हैं और स्वयं स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण शुभारम्भ पर उपस्थित नहीं थे.

इन बहुत पहले बनाये चित्रों में, जैसा कि गीता कपूर कह रही थीं, अलकाज़ी में विनोद बिहारी मुखर्जी, के जी सुब्रमण्यन का पूर्वाभास हैं. अधिकांश चित्र अलकाज़ी ने लंदन में बनाये थे, जहां वे सूज़ा के साथ रहते थे. सूज़ा का सान्निध्य भी इन चित्रों में दिखायी देता है. जैसे कि अपने रंगकर्म में वैसे ही अपने कलाकर्म में अलकाज़ी के यहां कोई उलझाव नहीं है, सब कुछ सुघरता से किया गया है. कुछ भी अतिरिक्त नहीं. रेखाएं, आकार, बिम्ब आदि सभी अपने लालित्य और ऊर्जा में संयत हैं. वे उमगते हैं पर कलादृष्टि उन्हें संयमित करती चलती है. उन्हें खुला अवकाश दिया गया है पर वे अराजक नहीं हो पाते.

अलकाज़ी का साहित्य से गहरा अनुराग था और वे बोदलेयर, वर्लैं से लेकर जेम्स ज्वाइस, टी एस ईलियट, निस्सीम एज़किएल आदि की रचनाओं से प्रेरित होते रहते हैं. वे स्वतः स्फूर्त उतने नहीं जितने पढ़े-लिखे चित्रकार हैं. उनके यहां रंग भी मंच है पर अधिकांशतः वे सफ़ेद-काले रंगों से ही खेलते हैं. ईसा मसीह उनका एक स्थायी सरोकार हैं और उनकी अनेक छबियां, क्रास आदि उनके चित्रों में हैं. अलकाज़ी ने जो रंगशैली विकसित की थी उसमें मंच पर दृश्य एक सधे पर स्वाभाविक चाक्षुष बिम्ब की तरह होते थे.

कुल 32 वर्षों के दौरान ज़्यादातर चुपचाप किया गया यह काम अप्रत्याशित तो है पर उससे यह भी पता चलता है कि स्वतंत्रता के बाद के दो दशकों में जो भारतीय सर्जनात्मक और बौद्धिक आधुनिकता रूपायित हो रही थी उसमें इब्राहिम अलकाज़ी पूरी शिद्दत, खुली दृष्टि और असाधारण कौशल से शामिल थे. वे जितना उसे बना रहे थे उतना ही वह उन्हें गढ़ रही थी.