भारत की पवित्र भूमि से सहस्रों फ़ुट ऊपर पुष्पक विमान अबाध गति से उड़ते हुए किष्किंधा से मिथिला जा रहा था. रावण और कुम्भकर्ण सुरक्षा के लिए बंधन कसे हुए आरामदेह कुर्सियों पर बैठे थे. शीघ्र ही वो मिथिला में उतरने वाले थे, इतना समय रहते कि रावण राजकुमारी सीता के स्वयंवर में शामिल हो सके.

मगर इस समय उनका मन मिथिला या सीता में नहीं था.

‘ब्रह्मचर्य कुम्भ?’ रावण ने मुंह बनाया. ‘सच में? स्त्रियों को केवल एक ही उद्देश्य से रचा गया है और ब्रह्मचर्य अपना कर तुम उनके इस उद्देश्य को पूरा नहीं करोगे?’

‘उफ़ दादा, आप स्त्रियों के प्रति इतने असम्मानजनक क्यों हैं?’ कुम्भकर्ण ने पूछा. उसे पता था कि यह कह कर उसने अपने बड़े भाई को रुष्ट कर दिया है कि वो भारत के सुदूर दक्षिण में स्थित भगवान अयप्पा के पवित्र मंदिर की यात्रा पर शबरीमला जाने के लिए इकतालीस दिन की शपथ लेने वाला है. रावण ने इसे इस बात के एक और संकेत के तौर पर देखा था कि उसका भाई उससे दूर हो रहा है और एक कठोर धार्मिक जीवनशैली अपनाने की ओर बढ़ रहा है.

‘क्या तुम चाहोगे कि मैं उनका सम्मान करूं, प्यारे भाई?’ रावण ने हंसते हुए पूछा. ‘विश्वास करो, स्त्रियां आदर-सम्मान नहीं चाहती हैं. वो तो बस यह चाहती हैं कि कोई उनका भरण-पोषण करे और उन्हें सुरक्षा प्रदान करे. बदले में, वो प्रेम, या उसके मिलती-जुलती जो भी वस्तु होती हो उसे, देने के लिए तैयार रहती हैं!’

‘दादा, आप दूसरी बार विवाह करने जा रहे हैं. मुझे सच में लगता है कि आपको स्त्रियों के विषय में अपने विचार बदलने चाहिए.’

‘देखो, कुम्भ, मैं पन्द्रह दिन में इतनी स्त्रियों का उपभोग करता हूं जितना तुमने जीवन भर में नहीं किया होगा. मैं जानता हूं वो कैसे सोचती हैं. वो भले ही यह कहें कि उन्हें अच्छे, संवेदनशील पुरुष पसन्द हैं. मगर याद रखो, स्त्रियां वो कभी नहीं कहतीं जो उनके मन में होता है. वास्तविकता में, वो भले, घरेलू क़िस्म के पुरुषों को अशक्त और अविश्वसनीय मान कर दरकिनार कर देती हैं. उन्हें असली पुरुष चाहिए होते हैं—सबल, कठोर पुरुष.’

‘हमारा धर्म कहता है कि असली पुरुष वो है जो स्त्रियों का सम्मान करता है.’

‘यानी असली पुरुष वो है जो आत्मसमर्पण कर दे और स्त्रियों के पांव की जूती बन जाये?’

‘मैंने ऐसा तो नहीं कहा. असली पुरुष वो है जो अपना सम्मान करता है और दूसरों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार करता है.’

‘बकवास. मैं अपने अनुभव से बता सकता हूं, चार स्त्रियां मिल कर भी एक पुरुष के समान नहीं हो सकतीं. वास्तव में, चार सौ स्त्रियां भी एक पुरुष के समकक्ष नहीं हो सकतीं.’

‘क्या बेकार की बात है! आप अपनी बात सुन भी रहे हैं, दादा?’

‘हमेशा सुनता हूं. और मैं कुछ अनुचित नहीं सुनता!’

कुम्भकर्ण ने अपनी अप्रसन्नता को दबाने के लिए गहरी सांस ली. ‘जाने दीजिए. आपके विचार मेरे विश्वासों या उन वचनों को नहीं डिगा सकते जो मैं भगवान अयप्पा के लिए लूंगा.’

‘तुम्हारा ब्रह्मचारी रहना किसी भगवान को कैसे प्रसन्न कर सकता है?’ रावण ने उपहास किया, वो स्पष्ट रूप से कुम्भकर्ण को क्रोध दिलाने की कोशिश कर रहा था.

‘यह केवल ब्रह्मचर्य की बात नहीं है, दादा’ कुम्भकर्ण ने धैर्य से समझाया. ‘वचन ले कर, मैं पूर्व महादेव भगवान रुद्र और विष्णु देवी मोहिनी के पुत्र भगवान अयप्पा के प्रति अपनी निष्ठा की शपथ ले रहा हूं. यद्यपि देश भर के हज़ारों मन्दिरों में भगवान अयप्पा की पूजा की जाती है मगर यह व्रत केवल शबरीमला के मन्दिर के लिए लिया जाता है. वन की देवी शबरी के नेतृत्व में उस क्षेत्र की एक वन्य जनजाति मन्दिर की देखरेख करती है. और सभी भक्तों के लिए नियम स्पष्ट रूप से बनाये गये हैं.’

कुम्भकर्ण ने अपनी उंगलियों पर नियम गिनवाये : ‘इकतालीस दिन के व्रत की अवधि में हम मांस-मदिरा का सेवन नहीं करेंगे. हम भूमि पर सोयेंगे. हम शारीरिक रूप से या अपनी वाणी से किसी को आहत नहीं करेंगे. हम सभी सामाजिक समारोहों से दूर रहेंगे. उद्देश्य सादा जीवन जीने और उत्तम विचारों पर ध्यान केन्द्रित करने का है.’

‘यह सब कुछ बहुत भला सुनाई देता है. मगर मुझे एक बात बताओ, तुम कहते रहते हो कि तुम स्त्रियों का कितना सम्मान करते हो. मगर तुम जानते हो ना कि शबरीमला मन्दिर में स्त्रियों को जाने की अनुमति नहीं है? क्या यह उनके प्रति असम्मानजनक नहीं है?’

‘स्त्रियों को अनुमति है! बिल्कुल है. केवल उन स्त्रियों को इस मन्दिर विशेष में जाने की अनुमति नहीं है जो अपने जीवन के प्रजनन काल में होती हैं. मूल रूप से, रजस्वला होने में सक्षम स्त्रियों के लिए प्रवेश वर्जित है.’

‘अहा! तो तुम्हें लगता है प्रजनन अशुद्ध है? और रजस्वला स्त्रियां मन्दिर को प्रदूषित कर देंगी? तुम जानते हो कि उत्तर-पूर्व भारत के कामाख्या मन्दिर में माहवारी के रक्त को पवित्र माना जाता है और उसकी पूजा होती है?’

‘आप जानबूझ कर मुझे ग़लत समझ रहे हैं, दादा. रजस्वला स्त्रियों पर प्रतिबन्ध का माहवारी के रक्त के अशुद्ध होने से कोई सम्बन्ध नहीं है. कोई भी भारतीय ऐसा कैसे सोच सकता है? इसका कारण तो संन्यास मार्ग है.’

कुम्भकर्ण आगे कहता गया, ‘जैसा आप जानते हैं, भारत के लगभग सभी मन्दिर गृहस्थ मार्ग का पालन करते हैं. इन मन्दिरों के अनुष्ठान सांसारिक जीवन के इर्द-गिर्द निर्मित हैं, वो पति-पत्नी के, माता-पिता और सन्तान के, या किसी स्वामी और उसके सेवकों के बीच सम्बन्धों का अनुष्ठान करते हैं. संन्यासियों के भी मन्दिर होते हैं, उनमें से अधिकांश सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफाएं हैं; इनमें अ-संन्यासियों को जाने की अनुमति नहीं होती. संन्यासियों के मन्दिर में जाने का एकमात्र तरीक़ा सभी लौकिक मोहों को त्यागना, अपने परिवार और भौतिक सम्पत्ति को त्यागना और स्थायी रूप से संन्यासी मत में शामिल होना होता है.’

रावण ने चौंकने का नाटक किया. ‘तुम क्या संन्यासी हो रहे हो? तुम मुझे छोड़ दोगे? क्या है यह!’

कुम्भकर्ण हंस पड़ा. ‘दादा, मेरी बात सुनें. शबरीमला मन्दिर उन लोगों के लिए नहीं है जो स्थायी संन्यास ले चुके हैं. हमें बस इकतालीस दिन संन्यासी रहने का व्रत लेना होता है. यह हमें एक संन्यासी के जीवन का छोटा-सा अनुभव प्रदान करता है. अगर आप यह समझ लें तो पहले मैंने जो भी वचन बताये हैं, उनकी सार्थकता समझ में आती है. इन इकतालीस दिनों के लिए हमें जीवन के सभी आनन्दों और सुविधाओं के साथ ही चरम भावनाओं से दूर रहना होता है. इसीलिए मांस-मदिरा के भक्षण और काम का निषेध है. मन्दिर पुरुष संन्यास मार्ग को समर्पित है, इसलिए प्रजनन चरण में मौजूद स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है, मगर कन्याएं और वृद्ध स्त्रियां यहां जा सकती हैं. इसी प्रकार, स्त्री संन्यास मार्ग को समर्पित मन्दिर भी हैं जहां वयस्क पुरुषों को जाने की अनुमति नहीं होती जैसे कुमारी अम्मन मन्दिर में. किन्नर लोगों के संन्यास के लिए भी मन्दिर हैं. ग़लतफ़हमियां तब पनपती हैं जब आप जैसे सांसारिक लोग हमारे संन्यासी तौर-तरीक़ों को ठीक से नहीं समझते हैं.’

‘ठीक है - ठीक है. मैं हार मानता हूं.’ रावण ने कृत्रिम समर्पण में अपने हाथ उठाते हुए कहा. ‘अपनी तीर्थयात्रा पर जाओ. कब है यह? कुछ माह में?’

‘हां’ कुम्भकर्ण मुस्कुराया और बुदबुदाया, ‘स्वामिये शरणम् अयप्पा.’

हम प्रभु अयप्पा की शरण में जाते हैं.

रावण अपने छोटे भाई का उपहास भले ही उड़ा रहा हो मगर वो भगवान अयप्पा का निरादर नहीं करने वाला था. वन के देवता अन्तत: भगवान रुद्र और देवी मोहिनी के पुत्र थे. उन्हें विश्व के महानतम योद्धाओं में माना जाता था.

उसने भी कुम्भकर्ण के साथ दोहराया, ‘स्वामिये शरणम् अयप्पा.’


‘रावण-आर्यावर्त का शत्रु’ अमीश त्रिपाठी की चर्चित मिथॉलजी सीरीज, रामचंद्र श्रृंखला का तीसरा भाग है जिसका हिंदी अनुवाद शुचिता मीतल ने किया है.